Ashish Kumar Trivedi

Romance Others


2.9  

Ashish Kumar Trivedi

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सफलता का नशा

सफलता का नशा

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आसमान के रंग बदल रहे थे। धीरे धीरे लालिमा पर सुरमई रंग चढ़ रहा था। राजीव आसमान की तरफ ताक रहा था। उसके जीवन के आसमान पर भी तो अब रंग बदल चुके थे। प्रेम के चटकीले रंगों पर अब अहम की काली चादर छा गई थी।


आसमान पूरी तरह से सुरमई हो गया था। अंधेरे ने बाहर की हर एक चीज़ को अपनी आगोश में लेना ‌शुरू कर दिया था। लेकिन उसके दिल में तो पहले से ही घना अंधेरा था। सुनंदा ने उसके साथ जो किया था उसने उसे खोखला कर छोड़ दिया था।

"राजू ऐसे अंधेरे में क्यों बैठे हो ? चलो नीचे चल कर सबके साथ बैठो। तुम्हारे भइया बुला रहे हैं।"

राजीव के सामने उसकी भाभी ममता खड़ी थी। राजीव बोला,

"भाभी अब तो जीवन में ही अंधेरा है। अंदर बाहर सब एक जैसा है।"

ममता को उसकी हालत पर तरस आया। उसने ही तो उसका रिश्ता सुनंदा से कराया था। वह बोली,

"क्या जानते थे हम कि वह ऐसी निकलेगी।"

"अपने आप को क्यों दोष दे रही हो भाभी। सब नसीब का खेल है। आप चलो मैं थोड़ी देर में आ जाऊँगा।"

ममता चली गई। राजीव अतीत के बारे में सोचने लगा।

आठ साल पहले इसी छत पर बैठा वह आने वाले जीवन के रंगीन सपने सजा रहा था। दोपहर में ही तो वह अपनी दुल्हन सुनंदा को विदा करा कर लाया था। नीचे घर की और मोहल्ले की औरतें रस्में निभाने में व्यस्त थीं। बाहर बैठक और दालान में मर्द राजनीति और समाज के बारे में बातचीत कर रहे थे। चारों तरफ हलचल थी। उसके बीच राजीव कुछ शांत पलों की तलाश में छत पर जा कर बैठ गया था। 

शादी की रस्मों के लिए वह रात भर जागा था। वह चाहता था कुछ आराम कर ले। आज की रात तो उसके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण रात थी। वह चारपाई पर लेटा था। ‌तभी उसे सुनंदा का खयाल आया। वह भी तो रात भर की जागी है। नीचे औरतें उससे ना जाने क्या क्या करवा रही हैं। उसे आराम कहाँ मिलेगा। वह खुद भी उठकर बैठ गया।


जब वह उसे देखने के लिए उसके घर गया था तो उसने सुनंदा की एक झलक भर ही देखी थी। सुनंदा अपनी माँ के साथ आकर वहाँ बैठ गई थी। उसने सर उठा कर उसकी ओर देखा। सकुचाई सी वह नज़रें नीचे किए बैठी थी। बस उसके बाद उसकी माँ उसे वापस भीतर ले गई थी। लेकिन उस छोटी सी झलक में ही सुनंदा के रूप का जादू उस पर चल गया था।


राजीव के समाज में औरतों को अधिक पढ़ाने का रिवाज़ नहीं था। लड़कियों को पढ़ाने का मतलब ‌उन्हें चिठ्ठी पढ़ने और लिखने लायक तालीम देना ही था। पर सुनंदा जो शहर में अपने मामा के घर रहती थी बारहवीं तक पढ़ी थी। राजीव के लिए भी उसकी बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई बहुत थी। वह खुश था कि उसे पढ़ी लिखी पत्नी मिली है।


राजीव के बड़े भाई सुरेश छत पर आए। राजीव मुंडेर पर बैठा बीते दिनों को याद कर रहा था। सुरेश ने कहा,

"ममता आई थी तुम्हें बुलाने। आए क्यों नहीं नीचे। चलो आलू, प्याज और बैंगन की पकौड़ियां बन रही हैं।"

पकौड़ियां राजीव को बहुत पसंद थीं। पर राजीव ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। वह बोला,

"मन नहीं है। आप लोग खाइए। मैं कुछ देर यहीं बैठूँगा।"

सुरेश को उसकी बात अच्छी नहीं लगी। उसके पास बैठ कर बोले,

"क्यों इस तरह देवदास बने अपना जीवन बर्बाद कर रहे हो। उसे तो तुम्हारी परवाह थी नहीं। पर हमें है। तुम्हारी ऐसी हालत से कितनी तकलीफ़ होती है मालूम है।"

राजीव अपने घरवालों को अपने दुख में नहीं डुबोना चाहता था। पर वह करता क्या। ना चाह कर भी सुनंदा के धोखे को भुला नहीं पा रहा था। अपने भाई का मन रखने के लिए वह नीचे चला गया।


रात को खाने के बाद वह खुले में सोने की बात कहकर छत पर आ गया। अपना बिस्तर लगाया और लेट गया। लेटे हुए वह फिर बीते जीवन के बारे में सोचने लगा।


राजीव एक स्कूल में टीचर था। वह सुनंदा को अपने साथ शहर ले आया था। वह हर पल सुनंदा को खुश रखने का प्रयास करता था। वैसे तो सुनंदा भी खुश थी पर राजीव को लगता था कि उसके मन में कोई बात है। जिसके चलते वह कुछ उदास सी रहती थी। पहले उसे लगता था कि ब्याह के बाद नए माहौल में आने के कारण ही वह उदास रहती थी। पर अब तो ब्याह को तीन महीने बीत चुके थे। फिर भी उसे लगता था कि सुनंदा पूरी तरह से खुली नहीं है। अतः उसने उससे इस बारे में बात की। सुनंदा ने अपने मन की बात बता दी। वह बारहवीं के बाद भी पढ़ना चाहती थी। लेकिन माँ ने उसकी शादी करवा दी। इसलिए कभी कभी वह उदास हो जाती है। उसने राजीव से विनती की कि वह उसकी आगे पढ़ने की इच्छा को पूरा करने में मदद करे।


सुनंदा के मन की बात जान लेने के बाद राजीव अजीब सी उलझन में फंस गया। सुनंदा चाहती थी उसे पूरा करना बहुत कठिन था। वह जानता था कि उसके घरवाले कभी इस बात के लिए तैयार नहीं होंगे कि घर की बहू पढ़े लिखे। वह तो बस अब उससे पोते पोतियों की उम्मीद लगा कर बैठे होंगे। उसका समाज भी उसके खिलाफ हो जाएगा। राजीव समाज और घरवालों का विरोध लेने की स्थिति में नहीं था। उसने अपना ध्यान उस तरफ से हटा लिया।


पर सुनंदा की आगे पढ़ाई करने की इच्छा तीव्र होती जा रही थी। वह अक्सर राजीव से इस विषय में बात करती थी। एक दिन राजीव ने उसे सारी बात खुल कर बता दी। उसने कहा कि घरवालों को यह बात मंज़ूर नहीं होगी। मैं भी उनका विरोध करने की स्थिति में नहीं हूँ। इ‌सलिए वह अपनी इच्छा को भूल जाए।


पर सुनंदा का कहना था कि यदि वह आगे पढ़ना चाहती है तो इसमें गलत क्या है। उसने राजीव से कहा कि वह तो एक टीचर है। उसके स्कूल में भी तो लड़कियां पढ़ती हैं। महिला टीचर भी हैं। फिर भी वह शिक्षा का महत्व क्यों नहीं समझ पा रहा है।


सुनंदा ने कहा कि उसके जैसा पढ़ा लिखा पति पाकर वह खुश थी कि राजीव उसकी बात समझेगा। पर यदि उसके जैसे लोग भी नहीं बदलेंगे तो समाज कैसे तरक्की करेगा।


अगले कई दिनों तक सुनंदा की कही बात राजीव के मन में हलचल मचाती रही। ऐसा नहीं था कि वह अपनी पत्नी को शिक्षित होते नहीं देखना चाहता था। लेकिन वह घरवालों और समाज के विरोध का सामना करने से डरता था। 


करीब एक महीने तक वह अपने दिल को मज़बूत करता रहा। अंततः उसने सुनंदा की आगे पढ़ाई करने की इच्छा को पूरा करने का निश्चय किया। सुनंदा को हिंदी साहित्य में रुचि थी। उसने इसी विषय को लेकर बी.ए. में प्रवेश लिया।


सुनंदा की शिक्षा का सफर शुरू हुआ तो साथ ही साथ राजीव का भी इम्तिहान आरंभ हो गया। परिवार के लोगों को उसका यह फैसला सख्त नापसंद आया। घर की बहू का चौखट लांघ कर कॉलेज में पढ़ने जाना उनके लिए एक अपमान जनक बात थी। गांववाले भी राजीव के विरोध में आ गए। उसका गांव जाना कठिन हो गया। किंतु इन सबसे घबरा कर पीछे हटने की बजाय राजीव का निश्चय और दृढ़ हो गया।


राजीव का सहयोग पाकर सुनंदा ने अच्छे अंकों के साथ बी.ए. के तीन साल पूरे कर लिए। उसके बाद उसने एम.ए. में दाखिला ले लिया। राजीव की आर्थिक रूप से सहायता करने के लिए उसने घर पर छोटे बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया।


भले ही अपनी पत्नी को शिक्षित करने के उसके फैसले को उसके घरवालों ने स्वीकार ना किया हो। पर कुछ लोग ऐसे भी थे जो उसके इस कदम की तारीफ करते थे। उसके स्कूल के प्रधानाचार्य ऐसे ही लोगों में थे। उन्हें सुनंदा का अपनी पढ़ाई जारी करने के लिए उठाया गया कदम बहुत पसंद आया था। वह चाहते थे पंद्रह अगस्त के जलसे में सुनंदा को इस बात के लिए सम्मानित करें। उन्होंने ने राजीव से इस बारे में बात की। 

जलसे में सुनंदा को माला पहना कर सम्मानित किया गया। पर जब इस बात की घोषणा हुई कि सुनंदा स्वरचित एक कविता का पाठ करने वाली है तो राजीव के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। सुनंदा ने देशभक्ति से भरी एक सुंदर कविता सुना कर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। सभी तरफ से वाह वाह की आवाज़ आ रही थी। अपनी पत्नी के इस नए गुण के बारे में जान कर राजीव भी बहुत खुश हुआ। घर लौट कर सुनंदा ने बताया कि कविताएं तो वह बहुत पहले से लिख रही है। पर जब राजीव ने उसे पंद्रह अगस्त के जलसे के बारे में बताया तो उसने कल रात ही यह नई कविता लिखी थी।


राजीव अब अपनी पत्नी की इस रचनात्मकता को प्रोत्साहन देने लगा। सुनंदा अब और मन लगा कर कविताएं लिखने लगी। वह अपने सोशल एकाउंट के माध्यम से उन्हें लोगों तक पहुँचाने लगी। उसकी कविताओं में विचारों की गहराई होती थी। भाषा का सुंदर प्रयोग देखने को मिलता था। लोग उन्हें खूब पसंद करने लगे। उसकी कविताएं साहित्यिक पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होने लगीं।


इससे प्रोत्साहित होकर उसने अपनी कविताओं का एक संकलन तैयार कर ई पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। इस संकलन को लोगों ने खूब सराहा। धीरे धीरे एक अच्छी कवियत्री के रूप में सुनंदा की ख्याति बढ़ने लगी। अब उसे कवि सम्मेलनों से भी बुलावा आने लगा। इन कवि सम्मेलनों में वह अपनी कविताओं एवं उन्हें पढ़ने के अपने विशेष अंदाज़ के कारण सुर्खियां बटोरने लगी। 


सुनंदा की इस सफलता से राजीव बहुत खुश था। उसकी पत्नी ने अपनी काबिलियत के दम पर समाज में अपनी एक पहचान बनाई थी। सुनंदा की सफलता के सफर में राजीव हर पल उसके साथ था। जब कभी उसे कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिए शहर के बाहर जाना होता तो वह उसके साथ जाता ताकि उसे कोई तकलीफ ना हो। संकीर्ण सोंच रखने वाले उसे ताना मारते कि बीवी का गुलाम है। उसकी छाया में पल रहा है। ऐसी बातें उसके दिल को ठेस पहुँचाती थीं। किंतु वह उन्हें सुनंदा तक नहीं पहुँचने देता था। वह नहीं चाहता था कि कुछ भी उसका ध्यान भटकाए।


कविता लेखन के क्षेत्र में सुनंदा का नाम अब वर्तमान समय के उच्च कवियित्रियों में लिया जाता था। देश ही नहीं विदेशों से भी उसे कवि सम्मेलनों के लिए बुलाया जाने लगा था। इसके लिए उसे मुंह मांगे पैसे मिलते थे। राजीव भी अब अपनी नौकरी छोड़ कर सुनंदा का काम देखने लगा था। सुनंदा के दो और कविता संग्रह आए जिन्हें ना सिर्फ पाठकों का प्यार मिला बल्कि एक के लिए उसे सम्मानित भी किया गया। इसी बीच उसे एक प्रसिद्ध टीवी चैनल के कार्यक्रम कविता पाठ का संचालन करने का अवसर मिला। यह कार्यक्रम कुछ ही दिनों में लोकप्रिय हो गया। इसका श्रेय भी सुनंदा को मिला।


छत पर लेटे हुए आसमान में चमकते तारों में राजीव को सुनंदा की चमक दिखाई पड़ी। वह सोच रहा था कि आखिर गलती कहाँ हो गई। क्यों सुनंदा की निगाहों में उसकी कद्र नहीं रही। उसने दूध में मक्खी की तरह उसे निकाल कर फेंक दिया। एक बार फिर वह बीते दिनों में इस सवाल का जवाब तलाशने लगा।


सुनंदा पर हर तरफ से ख्याति व धन की बारिश हो रही थी। वह भी पूरे उत्साह के साथ उसमें भींग रही थी। सफलता पाने से अधिक कठिन उसके शिखर पर पहुँच कर संतुलन बनाए रखना होता है। अक्सर ख्याति मन में अहंकार का बीज रोपित कर देती है। जिसे अंकुरित होने से रोक सकने की क्षमता बिरलों में ही होती है।


सुनंदा के मन में भी अहंकार का बीज रोपित हुआ था वह दिन पर दिन बढ़ती ख्याति से अंकुरित होकर पेड़ बनने की दिशा में अग्रसरित था। सुनंदा अब आयोजकों से बहुत ही ऊँची फीस मांगने लगी थी। इसके कारण छोटे छोटे शहरों के आयोजक पीछे हटने लगे थे। सुनंदा अपने प्रसंशकों के एक बड़े वर्ग से दूर चली गई। यही नहीं जब वह कवि सम्मेलन में भाग लेने जाती तो अपने लिए कुछ विशेष सुविधाओं की मांग करती। यह बात साथी कविओं को अच्छी नहीं लहती थी। उसके बढ़ते नखरों से आयोजक तंग आने लगे थे।


बढ़ते अहंकार की यह आँच केवल उसके व्यवसायिक जीवन को ही नहीं बल्कि व्यक्तिगत जीवन को भी झुलसा रही थी। उसका शुभ चिंतक होने के नाते राजीव उसे उसके बदलते व्यवहार के प्रति सचेत करता था। वह उसे समझाता था कि इस तरह का व्यवहार उसका नाम खराब करेगा। लेकिन सुनंदा उसकी इस सलाह को बेवजह उसके काम में दखल मानती थी। उसका कहना था कि यह स्थान उसने अपनी मेहनत व काबिलियत की वजह से प्राप्त किया है। उसे सलाह की ज़रूरत नहीं है। वह भलीभांति जानती है कि क्या करना है। 

राजीव के लिए उसका नज़रिया बदल गया था। पहले वह अपनी इस सफलता में उसके सहयोग के लिए उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखती थी। किंतु अब सफलता की उस ऊँचाई से उसे राजीव का कद बहुत छोटा मालूम पड़ता था। उसे भी लगने लगा था कि राजीव उसकी सफलता के साए में आरामदायक जीवन बिता रहा है। अतः उसका सलाह देना सुनंदा को अच्छा नहीं लगता था।


सुनंदा के द्वारा मिले तिरिस्कार के कारण राजीव बहुत दुखी था। अपने अहंकार में आज सुनंदा यह भूल गई थी कि सफलता से पहले संघर्ष के दिनों में वही उसका सच्चा साथी था। उसके लिए उसने अपने परिवार को भी नाराज़ किया था। पर आज हालत यह थी कि उसका सुनंदा को सही सलाह देना भी उसे गंवारा नहीं था। सूरज उससे दूर होने लगा था। पर उसके मन में सदा एक टीस सी रहती थी।

सफलता के आसमान पर तो समय समय पर नए सितारों का उदय होता रहता है। कविता लेखन में भी इन दिनों दिनेश भास्कर नाम का नया सितारा तेजी से अपनी चमक फैला रहा था। उसे चाहने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी। जो आयोजक सुनंदा से दूर हो गए थे वह अब उसके पास जाने लगे थे। वह सुनंदा के लिए एक चुनौती बनता जा रहा था।

सुनंदा के शहर में हर साल एक संस्कृतिक मेला लगता था। इस मेले में अलग अलग क्षेत्रों के कलाकार आकर अपनी प्रतिभा दिखाते थे। लेकिन लोगों को हर साल आयोजित होने वाला कवि सम्मेलन सबसे अधिक पसंद आता था। सुनंदा हर साल इस कवि सम्मेलन का मुख्य आकर्षण होती थी। इस बार भी लोग उसे सुनने की प्रतीक्षा कर रहे थे। लेकिन जिस समय मेले में कवि सम्मेलन होना था उसी समय सुनंदा को दुबई में कविता पाठ का अवसर मिला। वहाँ मिलने वाली फीस शहर के कवि सम्मेलन से बहुत अधिक थी। सुनंदा ने फौरन हाँ कर दी।

वैसे तो इधर कई दिनों से राजीव ने उसे सलाह देना छोड़ दिया था। किंतु उसका यह निर्णय उसे अनुचित लगा। वह जानता था कि इस तरह वह अपने प्रशंसकों को नाराज़ कर देगी। जो सही नहीं है। अतः हिम्मत कर उसने उसे समझाया कि पैसों से अधिक लोगों से मिलने वाला प्यार है। वह अपने प्रशंसकों का मान रखे। दुबई जाने की बजाय शहर के लोगों के बीच कविता पाठ करे। सुनंदा को उसका बोलना खराब लगा। उसे सुनाते हुए बोली।

"जिनके पास खुद को हुनर नहीं होता है वह दूसरों का मुंह देखते हैं। मेरे प्रशंसक मेरी कला के कद्रदान हैं। अगर यहाँ लोग नाराज़ हो गए तो अपनी कला से मैं वहाँ लोगों का दिल जीत लूँगी। तुम मेरे सलाहकार ना बनो। जो तुम्हारा काम है वह करो। वैसे वह भी मेरी मेहरबानी के कारण ही हैं।"

राजीव बेगैरत इंसान नहीं था जो आत्मसम्मान पर लगी इस करारी चोट के बाद भी वहाँ रहता। उसने सुनंदा का काम और घर दोनों छोड़ दिए।

दुबई का कार्यक्रम कुछ कारणों से रद्द हो गया। शहर के प्रतिष्ठित कवि सम्मेलन में हिस्सा लेने का अवसर भी निकल गया।


कवि सम्मेलन के बाद शहर में जहाँ सुनंदा के अपने प्रशंसकों को धोखा देने की चर्चा थी तो वहीं दिनेश भास्कर ने अपने काव्य पाठ से सबका दिल जीत लिया था।

सुनंदा बुरे दौर से गुजर रही थी। राजीव उसे ऐसे में अकेला नहीं छोड़ना चाहता था। वह अपने अपमान को भुला कर उसके पास पहुँचा। 

लेकिन सुनंदा को उसकी आवश्यकता नहीं रह गई थी। उसकी नज़दीकियां एक साथी कवि के साथ हो गई थीं। उसने राजीव से कहा कि वह उ‌से तलाक दे दे। इसके एवज में वह एक बड़ी रकम देने को तैयार है।

राजीव अपने घर आ गया था। वह तय नहीं कर पा रहा था कि क्या करे। सुनंदा को उसके धोखे के बावजूद तलाक देकर आज़ाद कर दे। या उसे अनचाहे रिश्ते में बाँधे रख कर तड़पाए।


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