संस्मरण
संस्मरण
रेडियो के दुर्लभ प्रस्तोता
'अमीन सयानी साहिब' :
पिछले दिनों 'सयानी साहिब' का निधन हो गया । दिलकश आवाज के साथ रेडियो में अनेक कार्यक्रमो के सुविख्यात प्रस्तोता, आवाज़ के महान् जादूगर, 'बिनाका-गीतमाला' के शानदार प्रस्तोता; "बहनों और भाइयों!'' को ख़ूबसूरत अन्दाज़ में सम्बोधित करनेवाले , अपने समय में रेडियो की दुनिया में सबसे बड़ा नाम , कभी समूचे हिन्दुस्तान की आवाज़ बन चुके 'अमीन सयानी' साहिब का 21 फ़रवरी को 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया । हम उस महान् साहित्यिक -सांस्कृतिक पुरुष को अपनी श्रद्धाञ्जलि निवेदित करते हैं। लेखिका शाम्भवी अपने एक संस्मरण में लिखती हैं -"अमीन सयानी को जो बात अन्य रेडियो प्रस्तोताओं से अलग करती थी, वह थी उनकी अद्वितीय आवाज़, स्वरों में उतार-चढ़ाव , स्वर सामंजस्य और त्रुटिहीन उच्चारण। उनकी अनोखी अभिव्यक्ति श्रोताओं पर मंत्र-मुग्ध कर देने वाला प्रभाव डालती थी। जब वे कहते -"बहनों -भाइयों ! नमस्कार! " उनके कहने का यह टोन श्रोताओं के मन पर अमिट छाप छोड़ गया। उनकी यह अद्भुत अदा उनकी आवाज़ को कालजयी बना गयी।" बड़े-बड़े विद्वानों, कवियों और आचार्य कहे जाने वाले लोग भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में शत-प्रतिशत त्रुटिहीन उच्चारण नहीं कर पाते हैं, यह उनकी जानकारी का भी अभाव हो सकता है या तो अभ्यास का अभाव हो सकता है, जो भी हो। मैं विद्वान् शिक्षकों को भी तालव्य श, मूर्द्धन्य ष और दन्त्य स के उच्चारण में त्रुटियाँ देखता रहा हूँ। इनका वे बहुधा एक जैसे उच्चारण करते हुए देखे जाते हैं। उन्हें सटीक जानकारी तो है, पर बचपन से अभ्यास का अभाव है। इनके उच्चारण में कैसा अंतर है ? इसकी ठीक-ठीक जानकारी मुझे भी स्नातक में पढ़ाई के दौरान हो पायी।
'सयानी साहिब' में शुरू से ही दिलकश अंदाज में सुंदर और स्पष्ट उच्चारण का जुनून था, जिससे वे रेडियो की दुनिया में सबसे बड़े नाम हो गये। बहुतों ने उनके उच्चारण के लहजे की हू-ब-हू नकल करने की कोशिश की, लेकिन किसी की भी लिखने और बोलने की हू-ब-हू नकल कभी नहीं की जा सकती है, कभी नहीं, यह सर्वथा असम्भव है । एक इंटरव्यू में आवाज़ में जादू की बात पर अमीन सयानी साहिब' ने कहा था कि -"लोग मेरी आवाज़ में जादू की बात करते हैं, पर मेरी आवाज़ बहुत अच्छी तो नहीं है, मेरी कोशिश केवल यह रहती है कि मेरे दिल की आवाज़ दिल से निकलकर लोगों के दिलों तक ठीक-ठीक पहुँच जाये।"
सयानी साहिब इस छोटे से वाक्य में कितनी बड़ी बात कह गये हैं, लेकिन वह भी तब सम्भव है, जब व्यक्ति अपने बाह्याभ्यन्तर व्यक्तित्व में शत-प्रतिशत सहज और भाषा के प्रति सचेत हो।
मौलिक रूप में लिखने -बोलने से बहुत सारी बाह्याभ्यन्तर जानकारी सामने वाले को अपने आप मिल जाती है। कहा जाता है कि आप अपने जैसा सोचिए, अपने जैसा बोलिए और अपने जैसा लिखिए, अन्यथा आपकी सारी पहचान मिट जायेगी। मौलिक चिंतन व्यक्ति की सबसे बड़ी सम्पदा है। उपनिषदों में शब्द को ब्रह्म वैसे ही तो नहीं कह दिया गया है।
शताब्दिसाहित्यकार डॉ रामदरश मिश्र का गोरखपुर में एक कार्यक्रम में यह कहना -"अनुभव कभी उधार नहीं लिया जाता है।" इसी ओर इशारा करता है।
प्रसंगवश एक वाकया याद आ रहा है, सम्भवतः 1996 या 1997 की बात है, कथाकार गिरिराज किशोर गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित एक पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के सिलसिले में आये थे। वे कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे। उन्होंने कहा था कि -"जब वे अपनी पहली कहानी लिखकर प्रयोगवाद के सूत्रधार युग प्रवर्तक रचनाकार अज्ञेय को दिखाने और उसपर प्रतिक्रिया लेने उनके घर गये थे, तो अज्ञेय जी ने उनसे कुछ देर तक बात ही नहीं की थी, चुपचाप खड़े मुझे देखते रहे, कुछ देर बाद कहा था -"तुम अपने जैसा क्यों नहीं लिखते, इस कहानी में भाव और भाषा दोनों तुम्हारे अपने नहीं हैं?"
गिरिराज किशोर में भी नैतिकता थी, उन्होंने बड़ी ईमानदारी से कह दिया कि -हाँ , मैंने आपकी नकल की है, भाव और शिल्प दोनों मेरे नहीं हैं।" उसके बाद से गिरिराज किशोर ने अपने चिंतन और लेखन दोनों में मौलिकता पर ध्यान केंद्रित किया और बाद में वे हिन्दी के बड़े कथाकार / समालोचक के रूप में जाने गये।
