STORYMIRROR

Shashibindu Mishra

Classics

4  

Shashibindu Mishra

Classics

रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा - शशिबिन्दुनारायण मिश्र

रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा - शशिबिन्दुनारायण मिश्र

4 mins
1

'अयोध्या में रामलला-प्राण-प्रतिष्ठा' -- शशिबिन्दुनारायण मिश्र "रुचिर चौतनीं सुभग सिर, मेचक कुंचित केश।" तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड का यह दोहा हाईस्कूल हिन्दी पाठ्यक्रम में पढ़ाई के दौरान अपने हिंदी शिक्षक से पढ़ा था और जब अध्यापक हुआ तो लगभग 20 वर्षों तक अपने छात्रों को इस प्रसंग को बहुत रुचिपूर्वक पढ़ाया भी। उस समय यू पी बोर्ड हाईस्कूल हिन्दी पाठ्यक्रम में रामचरितमानस बालकाण्ड का जनकपुर में राम-लक्ष्मण प्रसंग सम्मिलित था। किशोर राम के अपूर्व रूप का वर्णन करते हुए तुलसीदास ने ये पंक्तियाँ लिखी हैं। अयोध्या में रामलला के 'नीलाम्बुज श्यामलकोमलाङ्गम्' रूप की प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर राम के अलौकिक सौन्दर्य प्रसंग में उक्त दोहा बरबस याद आ रहा है। "ॐ रामाय रामचन्द्राय रामभद्राय मानसे। रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नमः।।" साथ ही साथ रामलला के इस साकार विग्रह के शिल्पी मैसूर निवासी अरुण योगिराज की भी वंदना की जानी चाहिए। प्लेटो का यह कहना कि -"कला सत्य की अनुकृति की अनुकृति है।" प्लेटो का यह कथन कलाकार के अपूर्व मेधा और कला द्वारा रचित रामलला के इस अलौकिक रूप पर सटीक बैठता है। गर्भगृह में ड्यूटी दे रहे प्रियवर सब इंस्पेक्टर महेश यादव जी ने प्राण-प्रतिष्ठा से सम्बन्धित सैकड़ों चित्र उपलब्ध कराया। विलक्षण प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम को जानकर पूरे दिन चिंतन में रहा । गर्भगृह के तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक एस० पी० तिवारी जी से भी देर तक बात हुई। लगा कि यदि प्रभु के चरणों में साहित्य-साधना के दो शब्द अर्पित न हो तो संतोष नहीं मिलेगा। कल पहली बार जब सोशल मीडिया पर ही इस भगवद्विग्रह को देखा तो मन-मयूर नाच उठा। कलाकार ने छेनी-हथौड़ी से रामलला के विग्रह को कैसा जीवन्त रूप दिया है। सचमुच में प्राणवन्त कर दिया है। सर्वोत्तम कला तो वही है कि वह कला न लगे,वह सच लगे। कलाकार की कला प्रणम्य है। प्रभु के इस साकार विग्रह के शिल्पी मैसूर निवासी अरुण योगिराज का भी जोरदार नागरिक अभिनन्दन होना चाहिए। ऐसी कला ही मन को उदात्त बनाती है। व्यक्ति को 'स्व' से निकालकर 'वसुधैव- कुटुम्बकम्' से जोड़ती है। राम को हमने इन भौतिक चक्षुओं से कभी देखा तो नहीं है। धर्म-ग्रंथों में उनके अलौकिक रूप के बारे में पढ़ा अवश्य है। अनेक श्रेष्ठ लोगों से बचपन से लेकर अब-तक सुनते रहने के कारण राम के लोकोत्तर कल्याणकारी रूप से अन्तर्मन जुड़ता है। कला तो होती है सबके पास, पर हर किसी को इसका एहसास नहीं होता है। जिस कलाकार ने यह सलोना रूप गढ़ा, वह कितना ऊर्जावान होगा और उसका मन सत्य के कितना निकट होगा। किसी विद्वान् ने कहा है कि यह जीवन, ऊर्जा का महासागर है, जब अन्तश्चेतना जागृत होती है तो ऊर्जा जीवन को कला के रूप में उभारती है और कला जीवन को 'सत्यम्- शिवम्- सुंदरम्' से समन्वित करती है। हमारे ऋषियों-मुनियों ने राम में अनन्त रूप में सत्यं-शिवं-सुंदरम् की अवतारणा की है, उनका यही समन्वित रूप उन्हें ईश्वरत्व प्रदान करता है। महात्मा गाँधी ने सत्य को ही ईश्वर माना और विश्व पटल पर स्थापित हुए । रवीन्द्र नाथ टैगोर का यह कहना कि "कला में मनुष्य अपने सुन्दर भावों को अभिव्यक्त करता है।" अब समझ में आ रहा है। मैसूर के शिल्पी कलाकार अरुण योगिराज द्वारा सत्य के निकट अपने मानसिक राममय मनोहर कल्पना को साकार विग्रह किया गया है , जो देखते ही बन रहा है। हमारे ऋषि-मुनियों के पास छेनी हथौड़ी भले ही न रही हो,पर उन्होंने सच्चिदानन्द रूप के लिए जो कल्पना तैयार की और उससे जो शब्द चित्र बनाया। उसे पढ़ -सुनकर अपार सन्तोष और सुकून मिलता है। उस पर कुतर्क नहीं किया सकता है । कला उस क्षितिज की तरह है,जिसका कोई छोर नहीं है। तभी तो महाराज भतृहरि का कवि-मन कह उठता है -- "साहित्य संगीत-कला विहीन:। साक्षात् पशु: पुच्छविषाणहीन:।" प्रोफ़ेसर सत्य नारायण त्रिपाठी का एक दोहे के माध्यम से यह कहना युक्तियुक्त ही है कि -- "राम हुए राजा नहीं ,विधि ने कर दी घात। कहा राम ने लखन से,समय-समय की बात।। यह समय ही है कि 500 वर्षों के बाद चिर प्रतीक्षा का समय, जब राम को सत्य-स्वरूप, ईश्वर रूप मानने वाला हर जन अपार सुख , संतोष और शान्ति का अनुभव कर रहा है। जीवन में साहित्यिक - सांस्कृतिक और धार्मिक अभ्युदय भौतिक उन्नति से श्रेयस्कर होता है। उस अभ्युदय के हम सब साक्षी बने हैं। यह हमारा सौभाग्य है। तुलसीदास की निम्न चौपाई से प्रभु को शीश नवाता हूँ। "सिया राममय सब जग जानी। करहु प्रणाम जोरि जुग पानी।।" मेरे प्रपितामह पं. गणेश दत्त मिश्र 'मदनेश' का रामकथा के प्रति अटूट विश्वास और प्रेम था,वह वाल्मीकि, कालिदास, भवभूति, तुलसीदास, केशवदास और मैथिलीशरण गुप्त आदि द्वारा रचित रामकथाओं में हमेशा डूबे रहते थे। रामायणम्, रघुवंशम् , उत्तररामचरितम्, रामचरितमानस, रामचन्द्रिका या साकेत में से कोई न कोई पुस्तक उनके पास हमेशा अवश्य होती थी, यात्राओं में भी, पैदल रास्ते चलते हुए भी और खेत -खलिहान में भी। वे हमेशा कहते थे --"एकमेव रामभजे कल्याण।।" रामकथा पढ़ना और सुनना मुझे भी बहुत अच्छा लगता है। --- शशिबिन्दु नारायण मिश्र (दूरभाष -9453609462) 22.01.2024 सोमवार


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Classics