शिक्षक का शाश्वत जीवन --शशिबिन्दुनारायण मिश्र
शिक्षक का शाश्वत जीवन --शशिबिन्दुनारायण मिश्र
शिक्षक का शाश्वत जीवन -- शशिबिन्दुनारायण मिश्र (9453609462) शिक्षक अपनी मृत्यु के बाद भी अनन्त काल काल तक जीवित रहता है। गुरु वशिष्ठ, संदीपनी, द्रोणाचार्य, प्लेटो, अरस्तू, चाणक्य, चन्दवरदाई, रामानन्द, रामकृष्ण परमहंस आदि मूलतः शिक्षक ही तो थे, जो कि अपने-अपने शिष्यों की काया में सूक्ष्म रूप में प्रविष्ट होकर आज भी हमारे आसपास विद्यमान हैं। देश के जाने-माने साहित्यकार डॉ रामदरश मिश्र की सुपुत्री, दिल्ली विश्वविद्यालय में सीनियर प्रोफ़ेसर और विदुषी लेखिका डॉ स्मिता मिश्र इस साल होली से दो-तीन दिन पहले ही गोरखपुर आ गयी थीं। आने से हफ्ते भर पहले कॉल की थीं कि- आ रही हूँ, साथ में मझले भइया शशांक जी और भाभी भी हैं, शहर से गाँव तक आपका एक या दो दिन का समय चाहिए, यह अत्यावश्यक है। हालाँकि मुझे एक मार्च को जौनपुर से प्रयागराज एक बारात जाना था, पर स्मिता जी के अनुरोध पर बारात वाली यात्रा स्थगित करनी पड़ी। उनका इधर गाँव पर लगातार आना-जाना हो रहा है। डॉ रामदरश मिश्र अपने समूचे साहित्य में गाँव को अन्त तक सम्भाले रहे। स्मिता जी अपने पिता के विशाल साहित्यिक सरोकारों को देखते हुए गोरखपुर में और गाँव पर कुछ विशेष करना चाह रही हैं। इस बार की गोरखपुर की यात्रा में डॉ स्मिता मिश्र को गाँव पर तो जाना ही था, साथ में अपने पिता डॉ रामदरश मिश्र के बिशुनपुरा प्राथमिक विद्यालय में शैक्षिक गुरु रहे पं. रामचन्द्र तिवारी की जन्मभूमि को प्रणाम भी करना था। डॉ स्मिता जी ने अब तक अपने पिता जी द्वारा पं. रामचन्द्र तिवारी के बारे में लिखा गया जो पढ़ा अथवा उनसे जो सुना था, मुझसे चर्चा होने पर मैंने अपने पिता स्वर्गीय जगदीशनारायण मिश्र, विश्वविश्रुत विद्वान् पकड्डीहा निवासी पं. विद्यानिवास मिश्र, डुमरी के पं. वीरेन्द्र प्रसाद मिश्र तथा पं. प्रसिद्धनाथ मिश्र जी से रामचन्द्र तिवारी जी के बारे में सुनी गयी स्मृतियों को भी स्मिता जी से साझा किया। बिशुनपुरा प्राथमिक विद्यालय में सन् 1930-1932 के आसपास रामदरश मिश्र के रामचन्द्र तिवारी जी शैक्षिक गुरु तो थे ही, उसी विद्यालय में विश्वविख्यात विद्वान् पं. विद्यानिवास मिश्र जी के भी रामचन्द्र तिवारी गुरु थे , बाद के दिनों में पं. वीरेन्द्र मिश्र, पं. प्रसिद्धनाथ मिश्र और मेरे पिता जी के भी वे शैक्षिक गुरु रहे। ये सभी लोग भी बाद में कर्त्तव्यनिष्ठ, समय के पाबन्द और सख्त अनुशासन वाले शिक्षक के रूप में समाज में आदरित हुए। यद्यपि रामचन्द्र तिवारी जी को मैंने कभी देखा नहीं है, पर क्षेत्र के अनेकानेक सम्मानित और प्रबुद्ध जनों से रामचन्द्र तिवारी की छात्रों के प्रति सख़्त अनुशासन, बेहद कठोरता, दयालुता और उदारता के बारे में खूब सुना है। किसी में निर्ममता और दयालुता का एक साथ समान रूप में होना असम्भव है, लेकिन रामचन्द्र तिवारी में यह सम्भव था। प्रकृति कभी-कभी समाज- हित में ऐसे विलक्षण लोगों को समय-समय पर अवतरित करती रहती है। रामचन्द्र तिवारी ने अपने विद्यार्थियों पर सख्त अनुशासन, समय की पाबन्दी और कर्त्तव्यनिष्ठा की जो अमिट छाप छोड़ी थी, तिवारी जी की मृत्यु के लगभग 60 वर्षों बाद भी उसकी अनुगूँज केवल मेरे कानों में ही नहीं, दूर-दूर तक आज भी सुनाई पड़ रही है। शिक्षक की यात्रा अनन्त की यात्रा है। कर्त्तव्यनिष्ठा और समय की पाबन्दी के मूर्तिमान रूप रामचन्द्र तिवारी जैसे अनगिनत अध्यापक पीढ़ी दर पीढ़ी अपने सुयोग्य छात्रों की काया में प्रविष्ट होकर अनन्त काल तक जीवित रहते हैं और कर्त्तव्य का संदेश देते रहते हैं, कर्त्तव्य अर्थात् धर्म। धर्म को अगर एक शब्द में परिभाषित करना हो तो कर्त्तव्य कहा जा सकता है।श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण का धर्म को लेकर ऐसा ही मन्तव्य है। यह बात अनेक स्तरों पर भी प्रमाणित है। ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ और सख्त अनुशासन वाला शिक्षक कभी भी मरता नहीं है, चाहे जितनी भी भ्रष्ट व्यवस्था हो, समाज चाहे जितना बुरा हो। ऐसा हमने देखा है। आप याद करें, यदि आपने छात्र जीवन को कायदे से जीया है तो प्राथमिक से लेकर छात्र जीवन के अन्तिम समय तक आपके वे अध्यापक आपको अधिक याद आते होंगे, जो प्रार्थना शुरू होने से पहले विद्यालय पहुँचते थे, समय से कक्षा में आते थे, गृहकार्य देते थे, पुनः अगली कक्षा में गृहकार्य न पूरा होने पर दण्डित करते थे। अध्यापक कितनी ऊँची डिग्री वाला है, कितना ज्ञानी है, प्रायः छात्रों का ध्यान इस ओर कम ही जाता है। मेरे दिल-दिमाग में मेरे छात्र जीवन के उन अध्यापकों की छवि ज्यों की त्यों आज भी अंकित है जो हम लोगों के स्कूल पहुँचने से पहले ही स्कूल पहुँचे रहते, समय से कक्षा में आते, गृहकार्य दिया और गृहकार्य न पूरा होने पर अपना कर्त्तव्य समझकर मुझे दण्डित किया है। उन्हीं के प्रति आज भी मेरे मन में अधिक आदर है। प्राइमरी स्कूल बिशुनपुरा में पढ़ाई के दौरान कक्षा -दो में रामचन्द्र तिवारी की भयंकर पिटाई से प्रख्यात साहित्यकार डॉ रामदरश मिश्र ने पढ़ाई छोड़ दी थी। रामदरश मिश्र लिखते हैं कि -- रामचन्द्र तिवारी चैले (चइला) से छात्रों की निर्ममता से ऐसी पिटाई करते थे उन्हें देखते ही रोआँ थर्रा उठता था, पर मजाल कोई अभिभावक कभी उलाहना लेकर स्कूल तक पहुँचा हो? कह सकते हैं कि वह समय ही ऐसा था। आज की तरह मनमौजीपन नहीं रहा कि बिना हया-शरम के जब चाहें घण्टे-दो घण्टे बाद स्कूल पहुँचे और नियत समय से घण्टे -दो घण्टे पहले स्कूल से निकल जायें। इसीलिए उस दौर के शैक्षिक जीवन में रस अधिक दिखाई देता है। आज की तरह वह दौर विरस नहीं है। गुरु का पुत्र गुरु-तुल्य श्रद्धा का पात्र हो सकता है क्या ? ऐसा कहीं शास्त्रों में पढ़ा तो नहीं है। वह भी गुरु-पुत्र में गुरु जैसी योग्यता और कर्त्तव्यनिष्ठा प्रमाणित और प्रतिष्ठित न हो। रामचन्द्र तिवारी गोपालापुर गाँव के मूल निवासी थे। डॉ स्मिता मिश्र ने जब मुझसे रामचन्द्र तिवारी की जन्मभूमि चलने के लिए आग्रह किया तो मैंने कहा कि रामचन्द्र तिवारी तो अब नहीं हैं, उनके दिवंगत हुए लगभग 60 वर्ष होने को हैं। रामचन्द्र तिवारी के घर पर उनके पुत्र 76 वर्षीय महातम तिवारी और उनका परिवार भर है, तो डॉ स्मिता मिश्र ने कहा कि क्या हुआ? मेरे पिता रामदरश मिश्र जी की रामचन्द्र तिवारी की भयानक पिटाई से पूरी तरह से छूट गयी पढ़ाई को जिन रामचन्द्र तिवारी ने अपने विशेष कौशल और उदारता से पुनः रास्ते पर ला दिया, आज मैं उनके कुल में उनके जो भी रक्त सम्बन्धी होंगे, मैं उस धरती सहित उन सभी का अपने परिवार सहित प्रणाम करूँगी। जब हम लोग गोपालापुर रामचन्द्र तिवारी की जन्मभूमि पर पहुँचे तो महातम तिवारी जी हम सबकी आतुरता से प्रतीक्षा करते हुए मिले। महातम तिवारी जी ने सत्कार में जो दिव्यता दिखाई, वह अवर्णनीय है। मैंने सुबह-सुबह ही महातम तिवारी जी को पूरी वस्तुस्थिति से अवगत करा दिया था। पुल का काम होता है दो किनारों को जोड़ना। रामचन्द्र तिवारी और रामदरश मिश्र के बीच के गुरु-शिष्य सम्बन्ध को तो अब सभी भूल ही चुके थे, पर उन पावन स्मृतियों को पुनः जीवन्त करना मुझे अपने धर्म पालन जैसा लग रहा था। स्मिता मिश्र और उनके भाई- भौजाई ने महातम तिवारी तथा उनकी धर्मपत्नी का वैसे ही चरणस्पर्श किया और अंगवस्त्र भेंटकर सम्मानित किया, जैसे कोई अपने प्रत्यक्ष श्रद्धेय गुरु का करता है। अंगवस्त्र के अतिरिक्त और क्या-क्या लेकर गयी थी और क्या-क्या पूरे परिवार के लिए किया, सब-कुछ यहाँ लिखना उचित नहीं है। गोपालापुर से लौटते हुए डुमरी में प्रसिद्धनाथ मिश्र और ब्रजेन्द्र मिश्र उर्फ होसिला मिश्र के यहाँ भी रुकना हुआ। शशांक मिश्र जी और स्मिता जी दोनों भाई-बहनों ने अपने से उम्र में काफी बड़े प्रसिद्ध जी और होसिला जी के चरणस्पर्श के लिए हाथ बढ़ाया तो प्रसिद्ध जी और होसिला जी ने अपने-अपने घरों पर उल्टे लपककर शशांक जी और स्मिता जी का चरणस्पर्श करने के लिए हाथ बढ़ा दिया। परस्पर सभी ने एक दूसरे का हाथ थामकर यथोचित अभिवादन स्वीकार किया। रामदरश मिश्र जी के गाँव- पट्टीदारी के रिश्ते में दरअस्ल प्रसिद्ध जी और होसिला जी पौत्र लगते हैं तो शशांक जी और स्मिता जी इनके क्रमशः चाचा और फुआ हुए, जबकि प्रसिद्ध जी और होसिला जी की उम्र इन लोगों से काफी अधिक है। कोई पद में बड़ा तो कोई उम्र में। ऐसी स्थिति में दोनों पक्षों ने एक दूसरे का यथोचित अभिवादन किया और होना भी यही चाहिए, बातचीत और व्यवहार में दोनों तरफ से यह बड़प्पन दिखना चाहिए। प्रसिद्ध जी और होसिला जी दोनों डुमरी के बुद्धिजीवियों में माने जाते हैं। 85 वर्षीय प्रसिद्ध जी स्वावलम्बी इण्टर कॉलेज बिशुनपुरा गोरखपुर से अंग्रेजी विषय में शिक्षक पद से सेवानिवृत्त हैं और ब्रजेन्द्र मिश्र उर्फ होसिला जी अंडमान- निकोबार द्वीपसमूह में एक कॉलेज से गणित विषय में प्रवक्ता पद से सेवानिवृत्त हैं। होली के उपलक्ष्य में खूब बइठकी जमी, ठहाके लगे। रामदरश मिश्र जी के बचपन से लेकर आज तक के समय तक, ख़ासकर होली को लेकर बहुत सारी चर्चाएँ, बीच-बीच में ठहाकों के साथ हम सब अपने- अपने अनुभवों को साझा करते रहे। उस समय रात्रि में सम्मत जलने के बाद होली के दिन अर्थात् अगली सुबह रानापार और डुमरी के बीच ढेलेबाजी होती थी। यह विचित्र खेल था, इसमें बच्चे, जवान, सयाने सभी शामिल होते, अनेक बार विवाद की नौबत आ जाती, लाठियाँ निकलतीं, बन्दूकें निकल जातीं, लेकिन दोनों गाँवों के कुछ समझदार और बुजुर्ग लोगों आपस में सौहार्दपूर्ण तरीके से बातचीत करते, शाम तक सारा गुबार खत्म हो जाता, पुनः प्रेम-भाव लौट आता और एक दूसरे के गाँव जाकर लोग कीर्तन गाने लगते, चौताल-उलारा आदि का दौर देर रात तक चलता रहता। होली की सार्थकता, उल्लास- उमंग से सभी जीवन्त हो उठते थे। कितना रौनक थी। सबके जीवन में अभाव था, लेकिन भाव ऐसा कि जीवन में अभाव का दंश कभी महसूस नहीं होता था। आज से 25-30 साल पहले तक खेली गई होली की जीवन्तता का स्मरण कर हम सभी रस में भीगते रहे। रामदरश मिश्र जी बचपन और जवानी में होली पर्व पर गाँव में गाये जाने फगुआ गीतों में नगाड़ा बड़े शौक और कुशलता से बजाते थे। 1991 की होली में गाँव पर अन्तिम बार नगाड़ा बजाया था। वह स्मृति होसिला जी ने बड़े रोचक ढंग से हम सबके बीच साझा किया। अन्त में हम-सब डुमरी के ब्राह्मणों के कुलदेवता दीक्षित बाबा के थान पर भी गये । गाँव के पूरब स्थित दीक्षित बाबा की पिण्डी आज भी डुमरी-रानापार सहित आसपास के गाँवों के लोगों के बीच जीवित ब्रह्म के रूप में समादृत है। वहाँ पर लोग आज भी मुण्डन संस्कार सहित अनेक धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धापूर्वक सम्पादित करते हैं, मनौती पूरी होने पर खड़ाऊँ -पीली धोती आदि का चढ़ावा करते हैं। दीक्षित बाबा का डॉ रामदरश मिश्र जी के उपन्यासों-संस्मरणों और आत्मकथा में रोचक वर्णन मिलता है। ऐसी किंवदंती है कि दीक्षित बाबा ब्रह्म का इतिहास तीन सौ-साढ़े तीन सौ साल से अधिक पुराना है। अंग्रेजी हुकूमत में अंग्रेजों के अत्याचार से त्रस्त क्रान्तिकारी दीक्षित ब्रह्म के पास आकर शरण लेते और मनौतियाँ मनाते थे। सुनने में आता है कि उन्हें त्राण मिलता था। इस बार होली का अंदाज बड़ा ही साहित्यिक-सांस्कृतिक रहा। होली की यात्रा अनन्त है और शिक्षक की यात्रा भी। होली जीवन में उल्लास-उमंग भरते हुए दूरियाँ पाटने का संदेश देती है। किसी मलाल की वजह से नहीं मिल पा रहे हैं तो होली के गुलाल से मलाल को मिटा दीजिए। होली इसी तरह का लोकतांत्रिक पर्व है। शिक्षक भी कभी किसी जाति का अथवा हिन्दू- मुसलमान- सिक्ख -ईसाई नहीं होता है। शिक्षक न तो कभी कांग्रेसाई, भाजपाई, सपाई, बसपाई अथवा वामपंथी होता है। शिक्षक जब से सपाई बसपाई, कांग्रेसाई, भाजपाई अथवा कम्युनिस्ट होने लगे, तब से वे स्वयं दो कौड़ी के तो हुए ही, साथ में सबका गौरव जाता रहा। गेहूँ के साथ घुन पिसे जाते हैं, यह कहावत पुरानी है। आजादी के बाद हमारा तन्त्र इस रूप में विकसित हुआ कि व्यवस्था शिक्षक को भी एक सामान्य कर्मचारी की तरह व्यवहार करती है, दुनिया के अन्य विकसित देशों अमेरिका, फ्रांस,जापान आदि में ऐसा नहीं है। बेपढ़े-लिखे और आपराधिक प्रवृत्ति के जातीय -साम्प्रदायिक आधार पर वोट की राजनीति कर सत्ता पाने वाले राजनेता और उनके संरक्षण में पलने वाले भ्रष्ट अधिकारी ऐसा व्यवहार करते हैं कि निरीह शिक्षक की उनके सामने औकात क्या है ? देवरिया जिले में एक शिक्षक की आत्महत्या इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। समाज में सर्वाधिक आदर राजनीतिज्ञों को मिलता है क्योंकि उनके पास असीमित सुविधाएँ और अधिकार मिल जाते हैं, इसीलिए शिक्षक भी देखी- देखा राजनीति की ओर बेतहाशा भागता है और चकाचौंध वाली जिंदगी के चक्कर में अपने गौरव की हानि कर लेता है। शिक्षक के सामने किसी विशेष जाति के अथवा हिन्दू- मुसलमान- सिक्ख- ईसाई के छात्र नहीं होते हैं। उसके सामने केवल छात्र होते हैं और शिक्षक कक्षा में केवल शिक्षक होता है। इसीलिए शिक्षक छात्रों का निर्माण कर पाता है। --- शशिबिन्दुनारायण मिश्र लेखक गोरखपुर, उत्तर प्रदेश के निवासी हैं तथा समीक्षक और संस्मरणकार हैं)
