साधारणता में सुख, लेखक-शशिबिन्दु नारायण मिश्र
साधारणता में सुख, लेखक-शशिबिन्दु नारायण मिश्र
साधारणता में सुख (पीरितिया क रीतियो न जनलीं) --- शशिबिन्दुनारायण मिश्र (9453609462) दुनिया के हर प्राणी में अपने ढंग की विचित्रता होती है, आपमें , हममें और सबमें। यही विचित्रताएँ संसार में हर व्यक्ति के भीतर आकर्षण के लिए कुछ मौलिक आधार पैदा करती हैं। यह वाक्य कभी पढ़ा था। ऐसे ही आधार वाले एक शख्सीयत से पिछले सप्ताह बोर्ड परीक्षा मूल्यांकन की समाप्ति पर भेंट हुई, पेशे से मोची, उम्र 67-68 वर्ष के लगभग, नाम जीतनराम। यात्राक्रम में मुझे अपने उपानह में मरम्मत और पालिश की जरूरत थी, समय सायं 5 बजे का रहा होगा। उस वक्त इस मोची को थोड़े फुर्सत में पर धीमे स्वर में तन्मय होकर कुछ गुनगुनाते हुए देखा-सुना। शब्द जो मेरे कानों में पड़े -- "पीरितिया कs रीतियो न जनलीं, पिया से मिलान हो गइल।।" सुंदर और सुरीली आवाज। मैं चकित रह गया। इस मोची का बावरा मन ऐसा गीत क्यों गा रहा था? क्या उसके प्यार का स्वप्न टूटा था अथवा इसकी जवानी के किसी असीम पवित्र प्यार का दर्द उभर गया है अथवा इसकी माशूका ने विश्वासघात किया है? मैंने कुरेदा कि -का हो जीतन, जवानी के कवनो प्यार के दर्द उभरि गइल बा का ? जीतन लजा गये। इस मोची को अद्भुत मस्ती में देखकर धनपशुओं पर विचार किया, जिनके पास सबकुछ होता है, पर न सुकून होता है, न सद्विवेक और न मस्ती, न विचारशीलता। उन्नत व्यक्तित्व के लिए अगाध विद्वता, अपरिमित धन, लोकप्रियता, सफलता और राजनीतिक या प्रशासनिक या किसी भी तरह का बड़ा पद, ऊँची पहुँच कभी मानक नहीं हो सकती है। लक्ष्य के प्रति समर्पण और अपने छोटे-बड़े कार्य/ पेशे के प्रति तत्पर निमग्नता से प्राप्त सुखी लोग, सम्बन्धों का लिहाज़ और परवाह करने वाले लोग मेरे लिए श्रद्धेय हो जाते हैं और मेरी लेखनी स्वत: स्फूर्त होकर उन पर चलने लगती है। चूँकि मैं स्वयं बहुत ही साधारण व्यक्ति हूँ, न किसी उच्च पद पर हूँ, न तो बलवान ही हूँ, यह जीवन का यथार्थ है अर्थात् किसी भी तरह का आधुनिक वी० आई० पी० नहीं हूँ। उस पर करैला नीम चढ़ा, अपना काम सिद्ध करने के लिए चाटुकारिता की तमीज भी नहीं है, तो स्वाभाविक है जीवन कठिन होगा, विरोधी और निंदक भी अधिक होंगे। हाँ यह सही है कि विद्यार्थिभाव आज भी बना हुआ है, पढ़ने- लिखने का शौक ज्यों का त्यों बरकरार है। छोटा और साधारण होने के कारण मुझे छोटे और साधारण लोग ही पसंद आते हैं। कभी-कभार ही अच्छे पदों पर सहज और साधारण लोग मिलते हैं, तो प्रसन्नता से जुड़ना हो पाता है। जबरदस्ती अपने आप को वी० आई० पी० और काबिल मानने वाले मुझे पसंद नहीं आते हैं और ऐसे लोगों तक पहुँच की पात्रता न होने से केवल साधारण लोगों से ही मिलना-जुलना हो पाता है और बातचीत हो पाती है। कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नही होता है, कार्य के प्रति छोटी या बड़ी नीयत होती है। कर्त्तव्य कैसा भी हो, जरूरी तो है उसके प्रति निष्ठा और समर्पण। निष्ठा ही किसी को महत्त्वपूर्ण और बड़ा बनाती है। कर्त्तव्य के प्रति समर्पण और जागरूकता ने ही छोटे और साधारण लोगों को दुनिया में असाधारण, सुखी और महान् बनाया है। रैदास जैसे मोची भी उन्हीं में से एक थे जो सैकड़ों वर्षों बाद आज भी हमारे धार्मिक और सभ्य समाज के लिए वरेण्य सन्त बने हुए हैं। 1970 के आसपास बनारस में एक कवि सम्मेलन आयोजित था, जिसमें उस समय के हिन्दी के बड़े कवि धूमिल भी आमंत्रित थे। धूमिल के साथ दो अन्य हिन्दी के महत्त्वपूर्ण कवि मंच पर पहुँचने से पहले सायं एक मोची की दुकान पर जूते में पालिश कराने के लिए रुके। धूमिल की प्रसिद्ध कविता 'मोचीराम' उसी घटना पर आधारित है। इस घटना के बारे में प्रसिद्ध साहित्यकार अरुणेश 'नीरन' जी अक्सर चर्चा करते थे। कवि धूमिल की कविता 'मोचीराम' में जूते में पालिश कराने के लिए सामने खड़े तीन प्रसिद्ध कवियों से उन्हें देखे बगैर मोची दृढ़ता और परम स्वाभिमान से कह उठता है---- "राँपी से उठी हुई आँखों ने मुझे/ क्षण भर टटोला और फिर/ जैसे पतियाये हुए स्वर में वह हँसते हुए बोला-- / बाबू जी ! सच कहूँ मेरी निगाह में, न कोई छोटा है न कोई बड़ा है/ मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है, जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है ..... ..... ...... सबको जलाती है सच्चाई/ सबसे होकर गुजरती है/ कुछ हैं जिन्हें शब्द मिल चुके हैं/ कुछ हैं जो अक्षरों के आगे अन्धे हैं/ वे हर अन्याय को चुपचाप सहते हैं/ और पेट की आग से डरते हैं/ जबकि मैं जानता हूँ कि 'इंकार से भरी हुई चीख'/ और एक समझदार चुप/ दोनों का मतलब एक है-/ भविष्य गढ़ने में, चुप और चीख/ अपनी-अपनी जगह एक ही किस्म से/ अपना-अपना फ़र्ज़ अदा करते हैं।" यह कविता बहुत बड़ी है। कवि धूमिल ने सामाजिक वास्तविकता का उद्घाटन करते हुए व्यंग्य के बहाने मोची के दर्द को वाणी दी है और कहना चाहा है कि हर व्यक्ति को चाहे वह बड़ा हो या छोटा, उसे अपनी सीमा और दायरा मालूम होना चाहिए। यह कवियों को चुभने वाली बात रही होगी, लेकिन उक्त मोची की अपने कर्त्तव्य के प्रति वफादारी ने बेहद संवेदनशील कवि धूमिल से उच्च कोटि की कविता लिखवा ली और वह कविता आज हिन्दी की अमर कविता है। कई बार मैंने देखा है कि बहुत ऊँचे लोग जिनके पास ऊँचा पद या अधिक विद्वता या किसी प्रकार की अन्य जुगाड़ू लोकप्रियता या सफलता है और आप उनसे किसी मामले में कमतर हैं तो ऐसे बड़े लोग चाहते हैं कि कमतर लोग उनके लिए सदैव सुलभ रहें, उनके आगे-पीछे दुम हिलायें, उनकी तारीफ़ में बोलें- लिखें, लेकिन ऐसे बड़े लोग कमतर लोगों के लिए अपना समय देना या तदनुरूप आचरण प्रस्तुत करना अपना अपमान, अपनी हेठी समझते हैं। इस मामले में मेरा बड़ा ही कटु अनुभव है। कमतर लोगों के लिए ऐसे तथाकथित बड़े लोगों के समय की या उनकी उपस्थिति की जरूरत पड़ी तो उनकी तबियत खराब होने का बहाना होता है अथवा उनके उत्तरों से लगता है कि उनके सिर पर पूरे हिन्दुस्तान की व्यस्तता का भार है। जहाँ आत्मीय सम्बन्धों के लिए परवाह न हो, जहाँ आत्मीय सम्बन्धों में भी जरूरत पड़ने पर बड़े-छोटे या अधिक प्रसिद्धि या कम प्रसिद्धि जैसे भाव आड़े आ रहे हों तो ऐसे सम्बन्धों से अलग हो जाना ही श्रेयस्कर होता है। मैं चाहता हूँ कि सहज भाव से सम्बन्ध बने, बड़े-छोटे के धरातल पर नहीं। जहाँ बड़े-छोटे के आधार पर सम्बन्ध बन रहा हो, वहाँ से खिसक जाना उचित है। जो लोग भी बड़े-छोटे के भाव से मुक्त होकर पारस्परिक आत्मीय सम्बन्धों के औचित्य को शिरोधार्य करते हैं, सम्बन्धों के धरातल पर वे ही बड़े और आदरणीय लोग हैं। मेरे गाँव में एक बेहद सज्जन व्यक्ति थे बटोही हरिजन (1926- 2007) बेहद निर्धन लेकिन परम स्वाभिमानी, व्यक्तित्व में नैतिकता, सद्विवेक और ईमानदारी की पराकाष्ठा, कह सकते हैं समग्रता में एक उदारमना सर्वथा निष्कपट व्यक्तित्व। बटोही मेरे प्रपितामह के लिए गाँव में सर्वाधिक विश्वसनीय थे, पितामह रामानुज मिश्र से बटोही 5-6 वर्ष छोटे थे। अनपढ़ बटोही के पास एक पाई भी भूमि जीवन भर नहीं रही, पर वैसी नैतिकता और स्वाभिमान वाला व्यक्ति मेरे गाँव और गाँव के आसपास के गाँवों में देखने को नहीं मिलता है। वैचारिक और नैतिक श्रेष्ठता के मानदण्ड अनपढ़ बटोही मेरे पिता जी को भी आवश्यकता पड़ने पर डाँट लेते थे। अनीति को कभी स्वीकार न करने वाले बटोही अपने जीवन में दो समर्थ लोगों से टकराये भी थे। सन् 1975 में परिवार में अलग- विलग होने की बात पर प्रपितामह कवि 'मदनेश' की अगाध विद्वता, बड़प्पन, प्रतिष्ठा और सामाजिक प्रभाव का हवाला देते हुए बटोही ने परिवार में अलगाव के जिम्मेदार लोगों को बहुत धिक्कारा था और परिवार को त्यागने की धमकी दी थी और कुछ दिनों के लिए छोड़ भी दिया था। हू-ब-हू इसी स्वभाव और विराट व्यक्तित्व के गाँव में अवधेश उपाध्याय, स्वयंवीर यादव उर्फ सुअम्मर और तेतरी देवी पत्नी मातादीहल अहीर भी थे, जो सच्चे अर्थों में मनुष्य थे और जीवन पर्यन्त कृतज्ञ भावना से ओत-प्रोत रहे। ऐसे लोग कहाँ मिलेंगे, जो बगैर किसी लाभ अथवा स्वार्थ के दूसरों का सदैव बनना देखना चाहते हों। मेरे प्रपितामह मदनेश जी ने पूरे गाँव में ऐसा कोई माई का लाल नहीं होगा जिसके लिए जी-जान से त्याग और सहयोग न किया हो, संकट में उबारा न हो, लेकिन मदनेश जी को आजादी के बाद एक बार सबसे सहयोग की जरूरत पड़ने पर केवल दो-चार लोग दृढ़ता और श्रद्धापूर्वक साथ खड़े हुए थे, जो उनके अपरिमित उपकारों को अपनी यादों में सँजोये हुए थे। मदनेश जी की विशाल हृदयता, उदारता, क्षमाशीलता और दानशीलता की आज भी लोग चर्चा करते हैं। उनके विशद स्वाध्याय और शास्त्रज्ञता का कहना ही क्या। मेरे पिता जी ने 10-12 वर्ष की आयु में यह सब प्रत्यक्ष देखा था। कृतज्ञ लोग हमेशा उँगली पर गिनने भर के लिए बचते हैं। मेरे पिता जी इन सभी के प्रति सदैव श्रद्धावनत रहे। इतने मर्यादित और इतने कृतज्ञ लोग शायद खोजने पर भी न मिलें। कृतज्ञ होना जीवन का महान् गुण है और कृतघ्नता जीवन का सर्वाधिक बुरा पक्ष है। कृतघ्न भाव जीवन की समस्त अच्छाइयों पर पानी फेर देता है। अब तो ऐसा युग आया है कि हर गाँव में 10-20 ऐसे शातिर दिमाग के होते हैं कि उनका लाख उपकार किया जाये पर अगले ही दिन सारा एहसान भूलकर सामने तन कर खड़े हो जाते हैं, पेट्रोल और माचिस की तीली लेकर तैयार रहते हैं कि कब आग लगा दी जाय। आप अपने- अपने गाँवों अथवा आसपास ऐसे लोगों को चिह्नित कर सावधान रह सकते हैं। व्यक्ति अपनी मृत्यु के वर्षों बाद भी यदि आदर से याद किया जा रहा है तो सोचिए कि वह कितना जीवन्त रहा है, कितनी बड़ी कमाई किया है। करोड़ों -अरबों की सम्पत्ति वाले कितने लोग अपनी मृत्यु के वर्षों बाद याद किये जाते हैं। संस्मरणों की शृंखला में बटोही पर सबसे पहले मैंने संस्मरण लिखा है, पूरी ईमानदारी और समग्र ऊर्जा के साथ। वह संस्मरण भी मेरी प्रकाश्य पुस्तक का हिस्सा है। मेरे लिए आदर्श व्यक्तित्व, मेरे प्रपितामह मनीषी रचनाकार पं. गणेश दत्त मिश्र मदनेश के लेखन का स्रोत यही भाव था। निराला और प्रेमचंद जैसे हिन्दी के महान् रचनाकारों की रचनाओं की भी यही भाव भूमि थी। यदि कोई धनवान हो/ किसी महत्त्वपूर्ण पद पर हो/ माना कि बहुत सफल हो/ बड़ा कवि- लेखक हो और वह धन- पद- लोकप्रियता के आधार पर भी बहुत बड़ा हो और उस अहं में अहर्निश जी रहा हो और उसमें किसी प्रकार का किसी के लिए त्याग भी न हो तो ऐसे बड़े लोगों से कोसों दूर रहना उचित है, फ़रमाइशी लेखन या किसी को खुश करने के लिए कभी कुछ लिखता नहीं। इस मोची की दुकान तक ले जाने वाले मेरे आत्मीय एल० आई० सी० के सेवानिवृत्त डिवीजनल मैनेजर ए० के० पाण्डेय जी हैं, पाण्डेय जी स्वभावत: भले आदमी हैं, मेरे लिए आदरणीय हैं, सहयोगी, विश्वस्त मित्र और बड़े भाई सदृश हैं। पाण्डेय जी की हार्दिक इच्छा थी कि मैं इस जीतन नाम के मोची पर कुछ लिखूँ। पाण्डेय जी ने नवम्बर वर्ष 2021 में लिखित और 2022 में प्रकाशित मेरे एक संस्मरणात्मक आलेख --साधारणता में सुख : कहारों के बहाने - पर बड़ी सारगर्भित और प्रशंसात्मक टिप्पणी की थी और आज भी उसकी याद करते हैं। आज के समय में अपने से कमतर लोगों से एक रस होकर सहजतापूर्वक सम्बन्ध निबाहना बहुत बड़ी बात होती है, समाज में ऐसे लोग विरले ही होते हैं। आदर्श ऐसे ही लोग बनते हैं और किसी के हृदय में ऐसे लोग ही दीर्घ काल तक विराजमान रहते हैं। जीविकोपार्जन का छोटा-बड़ा जो भी उचित साधन हो, (वह साधन यदि दूसरों को कदापि कष्ट न देने वाला हो) उसमें यदि व्यक्ति की निष्ठा हो, कह लीजिए व्यक्ति का जीविकोपार्जन के लिए जो भी औचित्यपूर्ण पेशा हो और उस पेशे के प्रति व्यक्ति में वफादारी हो, तो वह व्यक्ति चाहे जिस कुल का हो, चाहे जितना विपन्न हो, चाहे जैसा भी हो श्रद्धेय हो ही जाता है। हालाँकि इस भौतिक जीवन में जीवन यात्रा निर्विघ्न निर्वाह के लिए सबको यदा-कदा ऐसे लोगों के सामने भी झुकना पड़ता है, जो सचमुच में उसके हकदार नहीं होते पर वे साहित्य की किसी विधा में उत्कृष्ट व्यक्तित्व के रूप में गढ़े तो नहीं जा सकते हैं। कवि धूमिल जैसा हिन्दी का बड़ा कवि यदि 'मोचीराम' पर उच्च कोटि की कविता लिखता है तो यह कितनी बड़ी बात है। कवि धूमिल को तो उस मोची में केवल काम के प्रति निष्ठा दिखी थी। निष्ठा किसी भी सत्ता से बड़ी चीज होती है। आज इस जीतन मोची से मिलना महज़ संयोग ही रहा, अपने काम में पूरी तरह तल्लीन और प्रसन्नता से भरा हुआ। अच्छा गाने और नगाड़ा बजाने का बेहतरीन हुनर भी इनके पास है। अपना काम करते जा रहे थे, भोजपुरी गीत गुनगुनाते जा रहे थे, मेरा कार्य सम्पन्न होते ही इनकी दुकान पर 4-5 ग्राहक और आये, जिनमें दो लड़कियाँ थीं। हर ग्राहक को संतुष्ट करना , पैसे के लिए किसी भी ग्राहक से झिकझिक / तू-तू मैं-मैं न करना, काम करते हुए गुनगुनाते रहना और बातचीत करते हुए चेहरे पर हँसी या मुस्कराहट लिये हुए यह मोची मेरे लिए प्रिय हो गया। छोटे-छोटे दुकानदारों पर धौंस जमाते हुए, डाँटते हुए, लात-मुक्का तानते हुए तथाकथित बलवान पर स्वभावत: उद्दण्ड लोग देखे जाते हैं। मेरा अनुभव कहता है कि कमजोर की आह हमेशा लगती है। महाभारत के उद्योग पर्व में एक श्लोक आता है। शरशैय्या पर पड़े हुए अपने जीवन के अन्तिम दिनों में भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा था---- "आक्रुश्यमानो नाक्रुश्येन्मन्युरेनं तितिक्षत:। आक्रोष्टारं च निर्दहति सुकृतं च तितिक्षत:।।" यह है तो युधिष्ठिर के लिए उपदेश पर पूरे महाभारत का यह निष्कर्ष भी है। सहज- सरल- कमजोर की आह एक न एक दिन सताने वाले को दग्ध कर देती है, क्षमाशीलता का सबसे बड़ा परिणाम यही होता है, बशर्ते आप प्रतिक्रियावादी न हों। दिन डूबने वाला था, जब मैंने फोटो के लिए आग्रह किया,तो उक्त मोची ने चेहरा उठाया और फिर सकुचाते हुए तुरन्त नीचे कर लिया। आज कुछ फुर्सत में था। बोर्ड परीक्षा में मूल्यांकन समाप्ति पर घर आ रहा था। इसलिए सोचा समय का सदुपयोग हो और सार्थक लेखनी चले। आप लोग भी अपने आसपास ऐसे लोगों की तलाश कर सकते हैं, ऐसे लोग जरूर होंगे आपके आसपास, जो बड़े तो नहीं पर मनुष्य जरूर हैं, आप और कुछ उन्हें नहीं दे सकते, पर हृदय से महत्त्व के दो शब्दों का दान तो कर ही सकते हैं। किसी भी भौतिक प्रत्यक्ष लाभ की अपेक्षा शब्द अधिक कारगर होते हैं, उपनिषदों के अनुसार शब्द ही तो वास्तव में ब्रह्म हैं, ईश्वर हैं। कुछ भी न हो तो तत्काल आत्मिक परम शान्ति और सुख मिलता है। यह आलेख भी मैंने केवल अपने अन्त:करण के सुख के लिए लिखा है, किसी दूसरे के लिए नहीं और न तो किसी को प्रभावित करने के लिए। यह अलग बात है कि यदि आप रुचि पढ़कर सन्तुष्ट हो लेते हैं तो मैं आपका हृदय से आभारी हूँ। गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामचरितमानस -- "स्वान्त: सुखाय रघुनाथ गाथा- भाषानिबद्ध मतिमञ्जुलमातनोति।।" लिखा है। कोई श्रद्धापूर्वक पढ़कर लाभ उठाये अथवा न पढ़े अथवा पगला-पगला कर गरियाये अथवा चाहे तो वह भी जवाब में महाकाव्य लिख डाले। इससे तुलसी बाबा पर क्या प्रभाव पड़ता है। --शशिबिन्दुनारायण मिश्र (9453609462) लेखक रानापार, बिशुनपुरा, गोरखपुर के निवासी हैं।
