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Shashibindu Mishra

Abstract

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Shashibindu Mishra

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सनातन

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'सनातन' : मेरी दृष्टि में' -- शशिबिन्दुनारायण मिश्र (मो०-9453609462) सनातन शब्द का प्रयोग बहुधा मैं भी विश्वासपूर्वक कर देता हूँ; प्रसंगवश अध्यापन के समय में और पारस्परिक वार्ता में भी (यथा-सनातन धर्म, सनातन संस्कृति, सनातन विचारधारा व सनातन संविधान आदि) अतः कुछ लोग मुझे सनातनी / अतीतजीवी की संज्ञा देते हैं। वर्तमान में सनातन शब्द का राजनीतीकरण होना चिन्ता का विषय है। वर्ष 2018 शायद अप्रैल महीने की बात है, डी० जी० पी० उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सी० ए० (गोपनीय सहायक) और मेरे मित्र शर्मा जी ने बातचीत के दौरान सनातन शब्द का व्युत्पत्तिपरक अर्थ पूछा था, उन्हें जो जवाब भेजा था, वह मेरे एण्ड्रायड स्मार्टफोन में ज्यों का त्यों पड़ा था। उसे गत 31 मई 2026 को फेसबुक पर पोस्ट कर आगे भविष्य में विस्तार देने की बात नीचे लिख दी थी, तो पूर्वोत्तर रेलवे में कार्यरत मेरे एक परिचित पाण्डेय जी ने टिप्पणी में लिखा था कि मैं उत्सुकता से सम्पूर्ण आलेख की प्रतीक्षा करूँगा। वरिष्ठ कवि दीक्षित जी की भी सनातन के बारे में एक दिन गहरी रुचि देखी। जब मनःस्थिति बन गयी कि उसका विस्तार करना है तो उस पोस्ट को फेसबुक से डिलीट कर दिया था। समय की माँग है कि सनातन शब्द पर अब सार्थक चर्चा की जाये। सनातन (वि० / सं० पुं०) - 'सना' (सना इत्यव्ययं नैरन्तर्ये तच्च देशतः कालतो वस्तुतश्च परिच्छेद- राहित्यम् ) शब्द से बना है। (सदा+ट्युल, तुट्, नि, दस्य न:) अर्थ है ;- हमेशा, सदातन, नित्य, शाश्वत, पुराण, संतत, चिरन्तन, अनादि काल से चला आ रहा, (Always, Continual) = सनात्, सनत्। सनातनी (वि.) = जो परम्परानुसार आचार- विचार आदि में निष्ठा रखता हो; परम्परानिष्ठ। ऐसा व्याकरण- शास्त्र में बताया गया है। सनातन शब्द, सनातन धर्म या सनातनी शब्द पर इस सोशल मीडिया के युग में जिस तरह से विरोध और समर्थन में उन शब्दों के गूढ़ार्थ को जाने बगैर लोग इधर-उधर की बकवास करते हैं, हँसी आती है। सनातन शब्द आध्यात्मिक शब्द है। अध्यात्म, धर्म और संस्कृति से अलग हटकर सनातन का राजनीतिक संदर्भ ग्रहण किया जाना मानसिक दिवालियापन ही है। सनातन का आजकल की राजनीति से भला क्या वास्ता? राजनीतिक विचारधारा के लोग यदि सनातन के महत्त्व को समझते, हृदयंगम करते और उसके बीज तत्त्व को आचरण में उतारकर आमजनमानस को अकुण्ठ भाव से नेतृत्व देते तो बात और होती। सनातन शब्द तब से है जब से दाशरथि राम और वासुदेव श्रीकृष्ण हैं। राम और कृष्ण जैसे हमारे जीवन के अंग हैं वैसे ही सनातन भी। सनातन शब्द को लेकर इस समय न जाने क्यों राजनीति कूद पड़ी है। वासुदेव श्रीकृष्ण ने 'सनातन' शब्द का प्रयोग अर्जुन के लिए प्रेरणास्वरूप कुरुक्षेत्र युद्धभूमि पर किया, जहाँ धर्म-अधर्म के बीच निर्णय होना है। पृथापुत्र अर्जुन से वासुदेव श्रीकृष्ण ने कहा--- बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनाम्।। हे पार्थ ! सम्पूर्ण प्राणियों का सनातन (अविनाशी) बीज मै हूँ। अर्थात् सबका कारण मैं ही हूँ। मेरे बिना प्राणी की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। यहाँ जिस बीज का वर्णन है, वह बीज सनातन है, अर्थात् अनादि एवं अनन्त है। यह सनातन ही चेतन तत्त्व अव्यय अर्थात् अविनाशी है। -- प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजव्ययम्। अर्थात् संसार का मैं ही निमित्तकारण और उपादनकारण हूँ। मैं अव्यय बीज हूँ, अर्थात् सनातन हूँ, कभी नष्ट होने वाला नहीं हूँ। सांसारिक बीज तो वृक्ष से पैदा होता है और वृक्ष को पैदा करके स्वयं नष्ट हो जाता है। परन्तु ये दोनों ही दोष मुझ में नहीं हैं। -"न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय:। अजो नित्य: शाश्वतोsयं पुराणो न हन्यते न हन्यमाने शरीरे।।" यहाँ भी वासुदेव श्रीकृष्ण कहते हैं -मेरा जन्म-मृत्यु से सम्बन्ध नहीं है, मैं शाश्वत और पुराण हूँ। शाश्वत अर्थात् सनातन हूँ (ऊपर सनातन के शाब्दिक अर्थ में शाश्वत शब्द आया है) सनातन मतलब नित्य-तत्त्व निरन्तर एक रूप हूँ। पुराण: अर्थात् अविनाशी तत्त्व अनादि हूँ। - अच्छेद्योsयमदाह्योsयमक्लेद्योsशोष्य एव च। नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोsयं सनातन:। शस्त्र शरीर का छेदन तो कर सकता है पर शरीरी का नहीं। यह शरीरी किसी भी शस्त्र से छेदन योग्य नहीं है। इस शरीरी (आत्मतत्त्व) का शस्त्र के सिवाय मन्त्र / शाप आदि से भी अनिष्ट नहीं हो सकता है , क्योंकि यह सनातन है, अचल है, स्थाणु है, अनादि है, सदा से है। यह शरीरी-देही-आत्मतत्त्व किसी समय नहीं था, ऐसा सम्भव ही नहीं है। यह नित्य-निरंतर ज्यों का त्यों रहने वाला है, क्योंकि यह सनातन है। सनातन के निहितार्थ को जानने वाला हर आस्तिक और धार्मिक व्यक्ति सनातन शब्द को सिर- आँखों पर रखता है, श्रद्धा का भाव रखता है, भले ही वह जिस भी मत का अनुयायी हो। हमारे विष्णु भगवान इस जगत् के पालनहार और नियन्ता हैं। यह चीज अन्यत्र भी है। एकेश्वरवादी धर्म ईसाई हो, इस्लाम धर्म हो, यहूदी धर्म हो, सबमें वह सनातनता / सनातन बीज तत्त्व स्पष्ट रूप में मौजूद है। ईसाई धर्म भी मानता है कि ईश्वर त्रिमूर्ति (याहवे-उनके आदिदेव) के रूप में सबमें विद्यमान हैं। उनका पवित्र आत्म तत्त्व सबके हृदय में वास करता है। यहूदी धर्म भी स्वीकारता है कि उनके ईश्वर यहोवा सर्वशक्तिमान और अद्भुत हैं, वह सर्वत्र हैं। इस्लाम धर्म के अनुसार भी अल्लाह सृष्टि का पालनहार है, केवल वही पूजनीय है, वह सबमें और सर्वत्र है। यही तो है सनातन होना। वासुदेव श्रीकृष्ण इसी 'सनातन' के बारे में तो बार-बार अर्जुन से कहते हुए समूची दुनिया को संदेश दे रहे हैं और यह सनातनता का संदेश किसी न किसी रूप में, बौद्ध, जैन, ईसाई, इस्लाम और यहूदी आदि सब जगह है। काश् ! जाति और सम्प्रदाय आधारित वोट की राजनीति करने वाले संकीर्ण मानसिकता के नेता सनातन और सनातनता का वास्तविक संदेश आमजनमानस तक जाने देते। वैसे भी श्रीमद्भगवद्गीता किसी एक धर्म का ग्रन्थ नहीं है, वह सकल मानवता का ग्रन्थ है। सनातनता में कभी मतान्धता नहीं होती। मनीषी साहित्यकार डॉ विद्यानिवास मिश्र ने अपने एक निबन्ध में प्रसंगवश लिखा है --सनातनता में व्यक्ति राममय / कृष्णमय हो जाता है। राम में उसका मन रमता है। जब रमता है तो आदमी न हिन्दू रहता है, न ईसाई, न मुसलमान, न विदेशी रहता है,न स्वदेशी। वह एक सच्चाई का हो जाता है,जो कभी अप्रासंगिक नहीं होती। फादर कामिल बुल्के बेल्जियम में जन्मे एक समर्पित ईसाई पादरी थे। वे खाँटी कैथोलिक थे। वे रामकथा का उद्भव और विकास पर इलाहाबाद में डॉ धीरेन्द्र वर्मा के निर्देशन में रिसर्च कर रहे थे। उन्होंने रामचरितमानस और अन्य ग्रन्थों को डूबकर पढ़ा था, वे तुलसीदास के राम के प्रति समर्पित होकर बाद के दिनों में राम के ही हो गये और भारत में बस गये थे। कामिल बुल्के ने अपने जीवन से प्रमाणित किया कि राम का होने के लिए हिन्दू होना अनिवार्य नहीं है। यही तो सनातन होना है। तुलसीदास ने रामचरितमानस में कहीं भी हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं किया है। साधू बन जाना, सरकारी बाबा बन जाना, बड़े-बड़े नेताओं / अधिकारियों और धनवानों का बाबा बन जाने से कोई सनातनी बन जाता। पं० विद्यानिवास मिश्र अपने एक अन्य निबन्ध में कहते हैं,उनकी इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि --सनातन धर्म जब शास्त्र को प्रमाण मानता है तो वह किसी बँधे-बँधाए सत्य को ही प्रमाण नहीं मानता, बल्कि उस सत्य को जीने के साकार प्रयत्नों की शृंखला को प्रमाण मानता है। इसीलिए उसका एक नाम है --सनातन धर्म। इस सनातनता में रूढ़ता नहीं है, सतत प्रवाहमयता है। सच है जहाँ प्रवाहमयता रहेगी, वहाँ जड़ता / रूढ़िवादिता आ ही नहीं सकती है। इस संसार में जब से सभ्यता और संस्कृति का जन्म हुआ है,जब से हम सब सभ्य और सुसंस्कृत कहलाने लगे हैं सनातन तब से है। मनुस्मृति के अध्याय चार में महाराज मनु सनातन धर्म के बारे में कहते हैं --सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्म: सनातन:।। आप ही सब बताएँ कि समाज में शान्ति और सुव्यवस्था के लिए क्या यह सनातन धर्म आवश्यक नहीं है। हर कोई जब सच और झूठ को लेकर आदर्श की बात करता है तो वह जरूर कहता है,(चाहे वह मनुस्मृति पढ़ा हो या न पढ़ा हो) कि सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए लेकिन अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए,यही सनातन धर्म है। महर्षि वेदव्यास जीवन में शान्ति और सुव्यवस्था के लिए शाश्वत सनातन धर्म को इस ढंग से व्यक्त करते हैं -- न हि वैरेण वैराणि शाम्यन्तीह कदाचन्। अवैरेण हि शाम्यन्ति एष धर्म: सनातन:।। अर्थात् वैर से वैर शान्त नहीं होता। वैर का अन्त सद्भावना से सम्भव है,यही सनातन धर्म है। वेदव्यास ने महाभारत में आपसी-वैर में प्रतिशोध की भावना को लक्षित कर सकल मानवता को यह संदेश दिया है। इस सनातन धर्म का हू-ब-हू अनुकरण महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयायियों के लिए भी किया है। जो तथाकथित बुद्धिस्ट कहते हैं कि महात्मा बुद्ध ने भारतीय सनातनता का अनुकरण नहीं किया है, वे देख लें। पालि भाषा में धम्मपद के प्रथम अध्याय में एक यमक है -- न हि वेरेण वेराणि सम्मन्तीध कुदाचनम्। अवेरेण च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो।। यह महात्मा बुद्ध के सबसे प्राचीन और मूल उपदेशों में से एक है। यही उपदेश थोड़े-से भिन्न रूप में जैन धर्म के उदान वर्ग में भी मिलता है। हू-ब-हू वही भाव महात्मा बुद्ध के उपदेश में है जो महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के शान्तिपर्व में शान्ति-सद्भाव के लिए दिया है। आजकल के कुछ तथाकथित बुद्धिस्ट जो सनातन धर्म पर विरुद्ध टिप्पणी करते हैं, वे इस पर क्या कहेंगे? अरे भाई ! सनातन के बारे में पहले ठीक से जान लेना चाहिए,पढ़ लेना चाहिए, गहराई से विचार कर लेना चाहिए। सनातन और सनातनता भारत और भारतीयता से विच्छिन्न नहीं है। भारत और भारतीयता से जैसे राम और कृष्ण अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं वैसे ही सनातन और सनातनता भी। देश-प्रेम और मानव-सौन्दर्य के उपासक कवि बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' भारतीय सनातनता के बारे में लिखते हैं -- जिस दिन सबसे पहले जागे, नवल सृजन के स्वप्न घने, जिस दिन देश-काल के दो-दो विस्तृत विमल वितान तने, जिस क्षण नभ के तारे छिटके, जिस दिन सूरज-चाँद बने, तब से है यह देश हमारा, यह अभिमान हमारा है। भारतवर्ष हमारा है, यह हिन्दुस्तान हमारा है। भारतवर्ष ऐसा देश है जहाँ पर सर्वप्रथम सभ्यता और संस्कृति का विकास हुआ है। भारत के संदर्भ में यही तो है सनातन होना। जो शाश्वत है, जो हमेशा से है वही सनातन है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' कहते हैं कि भारत केवल कोई भौगोलिक स्थान या नक्शा भर नहीं है। दुनिया में जहाँ भी शील और मानवीय मूल्यों की स्थापना है, वहाँ पर भारत मौजूद है-- "भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है। एक देश का नहीं शील, यह भूमण्डल भर का है।" --शशिबिन्दुनारायण मिश्र (लेखक चिंतनशील रचनाकार हैं और गोरखपुर, उत्तरप्रदेश के निवासी हैं)


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