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Shashibindu Mishra

Inspirational

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Shashibindu Mishra

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शिक्षक का शाश्वत जीवन

शिक्षक का शाश्वत जीवन

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 लेखक-- शशिबिन्दुनारायण मिश्र (9453609462) शिक्षक की यात्रा कभी न रुकने वाली होती है। शिक्षक अपनी मृत्यु के बाद भी अनन्त काल काल तक जीवित रहता है। डॉ सर्वपल्लि राधाकृष्णन ने 'श्रीमद्भगवद्गीता का आस्तिकवाद' विषयक दार्शनिक आलेख में लिखा है कि -शिक्षक भारत का एक सर्वप्रिय देवता है, जो एक साथ मनुष्य भी है और दैवीय शक्ति भी है। वह सौन्दर्य तथा प्रेम का देवता है जिसको उसके भक्त पक्षियों के पंखों पर आरूढ़ करते हैं, फूलों की पंखुड़ियों में उसे देखते हैं और उसे अपने सर्वप्रिय पदार्थों में और प्राणिमात्र के अन्दर उसे ढूँढ़ते हैं।" इसीलिए भारतीय संस्कृति और परम्परा में उस शिक्षक को गुरु माना गया और उसे ईश्वर के समकक्ष स्थान दे दिया गया है --"गुरु: साक्षात् परंब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।" गुरु अर्थात् जिसने अपने जीवन में कठोर साधना तथा अनुशासन द्वारा हर तरह की श्रेष्ठता अर्जित कर ली है। गुरु का शाब्दिक अर्थ ही है श्रेष्ठ। गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राचीन भारतीय भाषा में कभी श्रेष्ठतम और योग्यतम शिक्षक रहे पं. विद्यानिवास मिश्र कहते थे कि "शिक्षक ऐसे होने चाहिए कि लगे वे पढ़े-लिखे हैं।" साधारण से लगने वाले इस वाक्य की अर्थ-व्यञ्जना कितनी बड़ी है। सबसे कठिन होता है शिक्षक होना। किसी व्यवस्था द्वारा किसी संस्था में कुछ बच्चों को पढ़ाने का अवसर पा जाने से और बदले में केवल पैसे लेकर मौज-मस्ती करना शिक्षक होना नहीं है। यदि आपने ईमानदारी से छात्र जीवन जीया है तो सबसे अधिक भय आपको आमजन-मानस से जुड़े हुए अपने ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक से लगता रहा होगा और सबसे अधिक श्रद्धा भाव भी उन्हीं के प्रति रहता है, दुनिया में किसी से भी अधिक, पर याद रहे आपने ईमानदारी से यदि छात्र जीवन जीया है तो। आज भी बचपन के अथवा छात्र जीवन के अपने शिक्षकों से ही सर्वाधिक भय लगता है, ऐसा भय जो सदैव निर्माणपरक होता है। गुरु वशिष्ठ, संदीपनी, द्रोणाचार्य, प्लेटो, अरस्तू, चाणक्य, चन्दवरदाई, रामानन्द, रामकृष्ण परमहंस, आधुनिक युग में सर्वपल्ली राधाकृष्णन और हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि भी मूलतः शिक्षक ही तो थे, जो कि अपने-अपने महान् शिष्यों की काया में सूक्ष्म रूप में प्रविष्ट होकर आज भी हमारे आसपास हैं और अनन्त काल तक विद्यमान रहेंगे। यह प्राचीन अवधारणा है कि जिन शिक्षकों ने जीवन पर्यन्त सीखते रहने के सिद्धान्त का अनुपालन किया, जो सदा ही संवेदनशील, अहंकार- विहीन और ज्ञानार्जन के प्रति समर्पित रहे, उन अध्यापकों के विचार उनके शिष्यों के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी अनन्त काल समाज में फैलते रहते हैं। देश के जाने-माने साहित्यकार डॉ रामदरश मिश्र मूलतः शिक्षक ही थे, रामदरश जी स्वयं संवेदनशील, समय के पाबंद, दक्ष और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक रहे ही, वे अपने छात्र जीवन के संवेदनशील और कर्त्तव्यनिष्ठ शिक्षकों को जीवनपर्यंत आदरपूर्वक स्मरण करते रहे, जिसका अनेकशः वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है। पं० रामचन्द्र तिवारी गोरखपुर के बिशुनपुरा प्राथमिक विद्यालय में सन् 1930- 1935 के बीच रामदरश मिश्र के शैक्षिक गुरु तो थे ही, उसी विद्यालय में पं. विद्यानिवास मिश्र जी के भी शैक्षिक गुरु रहे, बाद के दिनों में मेरे पिता स्वर्गीय जगदीश नारायण मिश्र के भी वे शैक्षिक गुरु रहे। ये सभी बाद में ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ, समय के पाबन्द और सख्त अनुशासन वाले शिक्षक के रूप में समाज में आदरित हुए। यद्यपि रामचन्द्र तिवारी जी को मैंने कभी देखा नहीं है, पर क्षेत्र के अनेकानेक सम्मानित और प्रबुद्ध जनों से रामचन्द्र तिवारी की छात्रों के प्रति सख़्त अनुशासन, बेहद कठोरता, अध्यापकीय साधना, जनमानस में उत्कृष्ट छवि, दयालुता और उदारता के बारे में खूब सुना है। प्रकृति समाज- हित में ऐसे विलक्षण लोगों को समय-समय पर अवतरित कराती रहती है। रामचन्द्र तिवारी ने अपने विद्यार्थियों पर सख्त अनुशासन, समय की पाबन्दी और कर्त्तव्यनिष्ठा की जो अमिट छाप छोड़ी, उनकी मृत्यु के लगभग 60 वर्षों बाद भी उसकी अनुगूँज उनके सैकड़ों शिष्यों से होते हुए आज भी दूर-दूर तक सुनाई पड़ रही है। कर्त्तव्यनिष्ठ शिक्षक अपने जीवन के बाद भी संदेश देता रहता है। कर्त्तव्य अर्थात् धर्म। धर्म को अगर एक शब्द में परिभाषित करना हो तो कर्त्तव्य कहा जा सकता है। ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ, उदार, सख्त अनुशासन वाला और अपने छात्रों को अतिरिक्त समय देने वाला शिक्षक कभी भी मरता नहीं है, चाहे जितनी भी भ्रष्ट व्यवस्था हो, समाज चाहे जैसा हो। ऐसा हमने देखा है। छात्र से अध्यापक का आत्मीय लगाव, छात्र और उसके अभिभावक पर अध्यापक का व्यापक प्रभाव तभी पड़ता है जब वह अपने छात्रों को अतिरिक्त समय देता है। पं. विद्यानिवास मिश्र बिशुनपुरा प्राथमिक विद्यालय में कक्षा 4 में पढ़ाई के दौरान की एक घटना की अक्सर चर्चा करते थे- रामचन्द्र तिवारी कक्षा में पढ़ा रहे थे। दो-ढाई बजे अपराह्न का समय था। गाँव से कोई कहार हाँफते हुए आया और रामचन्द्र तिवारी के सामने खड़े होते ही घर में किसी की मृत्यु की सूचना देकर तुरन्त घर चलने के लिए आग्रह किया। कहार के एकाधिक बार आग्रह करने पर रामचन्द्र तिवारी ने निरुद्वेग भाव से कहा -"तुम यह नहीं सोचते कि मैं घण्टे भर पहले स्कूल छोड़कर चला जाऊँगा तो ये अबोध बच्चे क्या सोचेंगे, लोग क्या कहेंगे ?" यह नैतिकता की, कर्त्तव्य के प्रति निष्ठा की पराकाष्ठा थी। यह उसकी तपस्या का प्रकट रूप है। छात्र हित में 'लोग क्या कहेंगे' इस भाव को आत्मसात करने वाले रामचन्द्र तिवारी जैसे शिक्षक ही मृत्यु के बाद युगों-युगों की यात्रा करते हैं। 'लोग क्या कहेंगे' उस दौर के समय में और आज के समय में बस इतना ही अंतर है। आज का रोम-रोम में कामचोरी से भरा हुआ सुविधाभोगी और अकर्मण्य व्यक्ति इस प्रसंग को सुनकर अथवा पढ़कर खिल्ली उड़ायेगा, परिहास करेगा। क्योंकि उसमें पेशे के प्रति वफादारी या निष्ठा जैसी चीज़ है ही नहीं। दौर ही ऐसा हो गया है। आप अध्यापक होकर किसी नेता, किसी लेखपाल-कानूनगो या किसी वकील या किसी पुलिस वाले से अपनी तुलना क्यों करते हैं? जब आप सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर अपनी कीमती गाड़ी और मकान की चकाचौंध फेंकते हैं तो आप शिक्षक नहीं होते हैं,तब आप केवल व्यवसायी या धनवान लगने लगते हैं। अपनी साधना और तपश्चर्या को तो आपने वहाँ उड़ेला नहीं। महाकवि कालिदास ऋषि कण्व से कहलवाते हैं --"अस्मान्साधु विचिन्त्य संयमधनान्....।" यह भी कहलवा सकते थे -- "हम बहुत बड़े आश्रम के अधिपति या स्वामी हैं", पर ऐसा नहीं कहा। पूरा तन्त्र, सत्ताएँ अथवा व्यवस्थाएँ भी तो ईमानदार नहीं रह गयी हैं, वह शोषण को ही अपना धर्म समझने लगी हैं। कर्त्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी की कद्र आज कहाँ हैं? ताली एक हाथ से नहीं बजती है। आप याद करें, यदि आपने छात्र जीवन को कायदे से जीया है तो प्राथमिक से लेकर छात्र जीवन के अन्तिम समय तक आपके वे अध्यापक आपको अधिक याद आते होंगे, जो प्रार्थना शुरू होने से पहले विद्यालय पहुँचते थे, समय से कक्षा में आते थे, छात्रों को गृहकार्य देते थे, पुनः अगली कक्षा में गृहकार्य न पूरा होने पर अवसर के अनुरूप यथोचित दण्ड भी देते थे। अध्यापक कितनी ऊँची डिग्री वाला है, कितना ज्ञानी है, प्रायः छात्रों का ध्यान इस ओर कम ही जाता था। मेरे मन-मस्तिष्क में मेरे छात्र जीवन के उन अध्यापकों की छवि आदरपूर्वक ज्यों की त्यों आज भी अंकित है जो हम लोगों के स्कूल पहुँचने से पहले ही स्कूल पहुँचे रहते, समय से कक्षा में आते, गृहकार्य दिया और गृहकार्य न पूरा होने पर अपना कर्त्तव्य समझकर दण्डित किया है।
क्रमशः ...........
--- शशिबिन्दुनारायण मिश्र दूरभाष --9453609462 रानापार, बिशुनपुरा, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश । पिनकोड - 273405


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