'कबीर का अनभै-साँच' : शशिबिन्दुनारायण मिश्र
'कबीर का अनभै-साँच' : शशिबिन्दुनारायण मिश्र
स्मृतियों के वातायन से --- 'कबीर का अनभै-साँच' के बहाने : डॉ नामवर सिंह और आचार्य रामचन्द्र तिवारी' ले.---शशिबिन्दुनारायण मिश्र 'कबीर का अनभै-साँच' विषय पर मई 1997 में (जैसा कि उस वर्ष की मेरी डायरी में जिक्र है) दी. द. उ. गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के प्रेक्षागृह में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई थी , मंच पर हिन्दी के मूर्धन्य समालोचक आचार्य रामचन्द्र तिवारी, मार्क्सवादी हिन्दी आलोचना के शिखर-पुरुष डॉ नामवर सिंह और मार्क्सवादी कवि-आलोचक प्रोफ़ेसर परमानंद श्रीवास्तव प्रभृति हिन्दी के श्रेष्ठतम विद्वान् -साहित्यकार विराजमान थे। कार्यक्रम में डॉ नामवर सिंह मुख्य अतिथि थे और आचार्य रामचन्द्र तिवारी कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे । चूँकि आचार्य रामचन्द्र तिवारी को उस समय सुनाई कम पड़ रहा था, इसलिए उन्होंने डॉ परमानंद श्रीवास्तव से डॉ. नामवर सिंह के वक्तव्य की जरूरी चीजें नोट कर उन्हें उपलब्ध कराने के लिए संकेत किया था। डॉ नामवर सिंह के उद्बोधन के तुरन्त बाद डॉ परमानन्द श्रीवास्तव ने अपने द्वारा नोट किये गये डॉ नामवर जी के वक्तव्य के कुछ आवश्यक 'प्वाइंट्स' आचार्य तिवारी को उपलब्ध कराया, उसी 'प्वाइंट्स' पर केन्द्रित होकर आचार्य तिवारी धारा-प्रवाह बोले थे। डॉ नामवर सिंह ने अपने अतिथि उद्बोधन में 'अनभै-साँच' को कबीर के 'अनुभवात्मक स्वसंवेद्य ज्ञान' से जोड़ कर व्याख्यान दिया था और कहा था कि जहाँ तक मुझे जानकारी है, कबीर की साखियों में 'अनभै-साँच' दोनों पद एक साथ पढ़ने को नहीं मिला है। आचार्य तिवारी जी ने बाद में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में नामवर सिंह जी की मान्यताओं को एक सिरे से अमान्य कर दिया और अनेक साखियों को उद्धृत करते हुए 'कबीर का अनभै-साँच' पर व्यापक प्रकाश डाला और उसे कबीर के जीवन में निर्भय / अभय होकर साँच कहने से जोड़कर देखा। आचार्य तिवारी जब बोल रहे थे तो 'कबीर का अनभै -साँच' तिवारी जी में स्वत: साकार हो रहा था। तिवारी जी ने कुछ ऐसी साखियों को भी उद्धृत किया था, जिनमें 'अनभै-साँच' दोनों पद साथ- साथ मौजूद थे। मैं एक श्रोता के रूप में पहली बार आचार्य रामचन्द्र तिवारी और डॉ नामवर सिंह को एक कार्यक्रम में एक साथ एक मंच पर सुन रहा था। वह बड़ा ही रोमाञ्चकारी अनुभव था। वैसे उससे पहले अलग-अलग तो डॉ तिवारी और डॉ नामवर सिंह को बहुत बार सुन चुका था, लेकिन उस दिन दोनों लोगों को एक मंच पर एक साथ पहली बार सुना। कार्यक्रम में मैं शुरू से लेकर अन्त तक रहा। मैं सुनने का शुरू से ही बहुत शौकीन रहा हूँ, बशर्ते जो चीजें मेरी पसंद की रहती हैं। आचार्य तिवारी को कबीर पर केन्द्रित व्याख्यान सुनकर वाकई में बड़ा अच्छा अनुभव हो रहा था। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाद हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र तिवारी को कबीर साहित्य का विशेषज्ञ विद्वान् माना जाता है। डॉ नामवर सिंह जी ने अपने उद्बोधन में बड़ी साफ़गोई से इस बात को कहा भी था कि -"आचार्य तिवारी कबीर साहित्य के विशेषज्ञ विद्वान् हैं, वे इस पर मुझसे बेहतर प्रकाश डालेंगे।" आचार्य तिवारी ने अपने उद्बोधन में कहा -'कबीर पूरी तरह से सत्ता विहीन थे, संत थे, फक्कड़ थे, अन्याय-अन्धविश्वास व रूढ़ियों के विरोधी थे, समाज सुधारक थे, क्रान्तिकारी -कवि थे, जो भी थे पर उनमें 'अनभै-साँच' मनसा-वाचा-कर्मणा मौजूद था, रोम-रोम में विद्यमान था। कबीर अपनी 'अनभै-साँच' प्रवृत्ति के कारण ही अपनी अटपटी वाणी में रस पैदा कर पाते हैं,कबीर के 'अनभै-साँच' वाणी में रस न देख पाना अपनी ही दृष्टि-दोष का परिचय देना है।" हिन्दी के प्रतिष्ठित समालोचक एवं कवि डॉ कृष्णचन्द लाल से वर्षों बाद एक मुलाकात में मैंने उपर्युक्त कार्यक्रम की प्रसंगवश चर्चा की थी तो डॉ कृष्णचंद लाल ने आचार्य रामचन्द्र तिवारी की आलोचना दृष्टि पर जो बातें कही थीं, उसे भी मैं हू-ब-हू यहाँ देना चाह रहा हूँ । डॉ कृष्णचंद लाल कहते हैं ---"पाठनिष्ठ और तर्कसम्मत मूल्यांकन आचार्य रामचन्द्र तिवारी की आलोचना की मुख्य विशेषता है। उनकी 'कबीर- मीमांसा' पुस्तक कबीर सम्बन्धी समीक्षाओं को एक जगह आलोचनात्मक विवेक के साथ पढ़ने का तो अवसर देती है, कबीर के सभी पक्षों को संतुलित ढंग से समझने में मदद भी करती है। यह कबीर का आग्रह-मुक्त मूल्यांकन है। कबीर की 'अटपटी वाणी में रस' पर विचार करते हुए तिवारी जी ने लिखा है कि -"उनकी रसात्मक भूमि तक पहुँचने के लिए अपनी भाव-परिधि का विस्तार करना होगा।" डॉ कृष्णचन्द लाल इस बात पर जोर देकर कहते हैं कि --"आचार्य रामचन्द्र तिवारी की आलोचना की बड़ी विशेषता यह है कि वे विरोधी विचारों के बीच से रास्ता निकालते हैं , विरोधी विचारों के बीच सारतत्त्व निकालते हैं और कहते हैं कि सत्य यह है। तिवारी जी की आलोचना दृष्टि बहुत संतुलित है। संतुलित इस मामले में कि वे एक पक्ष होकर कभी बात नहीं करते हैं। उनका ये उद्देश्य कत्तई नहीं होता है कि किसी ख़ास विचारधारा के वशीभूत होकर किसी को गलत ठहरायें। तिवारी जी तोड़-फोड़ अथवा उठा-पटक वाले आलोचक नहीं रहे हैं, इसलिए तिवारी जी की चर्चा उस तरह के आलोचकों में नहीं होती है, जिस तरह से तोड़-फोड़ वाले आलोचकों की होती है। यह आप जान लीजिए कि जो व्यक्ति रचनात्मक होता है उसकी चर्चा कम होती है,आज के युग का यह मुहावरा है कि जो ध्वंसात्मक होता है उसकी चर्चा अधिक होती है। किसी की बे-सिर-पैर की आलोचना कर दीजिए,उस आलोचना को जगह-जगह पढ़ा-पढ़ाया जायेगा। किसी की गम्भीर और तथ्यपरक आलोचना कीजिए,उस पर लोगों का ध्यान कम जाता है। तिवारी जी की आलोचना आपको विचार देती है, उद्वेग थोड़ा कम पैदा करती है। तिवारी जी उठा-पटक और विवादास्पद बातें नहीं करते हैं। हिन्दी में उठा-पटक वाली आलोचना नामवर सिंह और अशोक बाजपेयी आदि ने चलाई। तिवारी जी विवादों में भी संवाद पैदा करते हैं।" निस्संदेह, हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र तिवारी संतुलित दृष्टि के तर्कशील समालोचक हैं। स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी समालोचना में डॉ नामवर सिंह का नाम देश के वरिष्ठतम समालोचकों व वक्ताओं में सर्वाधिक प्रतिष्ठा से लिया जाता रहा है, बहुतेरे उन्हें मार्क्सवादी आलोचना का शिखर पुरुष भी मानते हैं, नामवर सिंह की आलोचनात्मक पुस्तकों में मार्क्सवाद का सर्वत्र प्रभाव है, लेकिन उनकी आलोचनाओं और निबन्धों दोनों में वैचारिक असंगति ज्यादा दिखती है। नामवर सिंह जी ने प्रयोगवाद और उसके बाद के सभी महत्वपूर्ण कवियों पर विचार करते हुए शमशेर बहादुर सिंह को अपना पसन्दीदा कवि बताया था, लेकिन शमशेर बहादुर सिंह पर बहुत लिखा नहीं । इस तरह की विसंगतियों को लेकर नामवर सिंह जी कीआलोचना भी हुई पर उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की। नामवर सिंह के लिए कम्युनिस्ट / मार्क्सवादी होना महत्त्वपूर्ण है। नामवर सिंह जी स्वयं अपने लेखन और चिन्तन को राजनीतिक विचारधारा से अन्त तक प्रभावित मानते रहे। नामवर सिंह का मानना है कि राजनीति साहित्य के लिए बाधक नहीं होती बल्कि लेखक की कलम को धार देती है। इससे यह स्पष्ट है कि जो उनकी विचारधारा का नहीं रहा, वह उनकी आलोचना के लिए फिट नहीं बैठा, चाहे वह जितना बड़ा क्रिएटिव रचनाकार रहा हो। नामवर सिंह धर्म और परम्परा की खिंचाई बड़े भाव और चाव से करते हैं और पाश्चात्य या भारतीय धर्म / परम्परा विरोधी विचारकों के विचारों को उद्धृत करते हुए गौरवान्वित महसूस करते हैं। धर्म और परम्परा को भारतीय परिप्रेक्ष्य में नामवर सिंह ने क्या उचित दृष्टि से समझा था? यह विमर्श का विषय है। अपनी समालोचना में नामवर सिंह ने अपनी विचारधारा और अपनी पसन्द के रचनाकारों को अधिक तरजीह दी, उनके लिए तटस्थता और निष्पक्षता कभी महत्त्वपूर्ण नहीं रही। इसलिए वे अपने समय के अज्ञेय प्रभृति देश के बड़े रचनाकारों के साथ आलोचना में न्याय नहीं कर सके,इसका दर्द अज्ञेय ही नहीं, उनके बाद के देश के जाने-माने साहित्यकार डॉ निर्मल वर्मा एवं डॉ रामदरश मिश्र जैसे देश के अनेक बड़े रचनाकारों को रहा है। नामवर सिंह जी का विवादों से शुरू से ही नाता रहा। उन्होंने कभी 'वाद-विवाद' में 'संवाद' नहीं पैदा किया , बल्कि 'संवाद' में भी 'वाद-विवाद' पैदा किया। डॉ नामवर सिंह ने 'वाद-विवाद संवाद' नामक अपनी महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक पुस्तक में 'अनभै साँचा' शीर्षक भूमिका में स्वयं लिखते हैं -"वह संवाद क्या जिसमें कुछ वाद-विवाद न हो। लेकिन हिन्दी संस्कृति में वाद-विवाद को अच्छा नहीं समझा जाता। कबीर तक से कुछ लोग इसीलिए बिदकते हैं कि उनमें खण्डन-मण्डन है।" स्पष्ट है कि नामवर जी 'वाद-विवाद' को अधिक महत्त्व देते हैं, 'संवाद' को नहीं। यह उनके साहित्यिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। 'वाद विवाद संवाद', के अतिरिक्त 'हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग', 'इतिहास और आलोचना', 'कहानी : नयी कहानी', 'कविता के नये प्रतिमान', 'आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ', दूसरी परम्परा की खोज' और 'छायावाद' आदि डॉ नामवर सिंह की महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक कृतियाँ हैं। उन्हें पढ़ने से लगता है कि उन्होंने पाश्चात्य समीक्षा साहित्य गहराई से पढ़ा और आत्मसात किया है। जॉर्ज लूकाच के मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र से तथा लूसिए गोल्डमान, प्लेखानोव, मिखाईल लिफशित्स आदि पाश्चात्य मार्क्सवादी विचारकों से नामवर सिंह बेहद प्रभावित लगते हैं। नामवर सिंह जी आलोचना में मार्क्सवादी तत्त्व जरूर ढूँढ़ते हैं। अपनी विचारधारा से इतर पूर्ववर्ती और समकालीन उत्कृष्ट रचनाओं में भी कमजोरियाँ / कमियाँ वे खोज लेते हैं। इसीलिए आचार्य रामचन्द्र तिवारी उन्हें बड़ी शालीनता से 'दूसरी परम्परा का अन्वेषक' कहा हैं, तिवारी जी के ऐसा कहने का ढंग था। तिवारी जी अपनी सज्जनता और निर्मत्सर स्वभाव के लिए भी ख्यात रहे हैं। आगे तिवारी जी कहते हैं -"उन्होंने आचार्य शुक्ल के इतिहास की कमजोरियों को लक्षित करते हुए कहा है कि इसमें हिन्दी-साहित्य को पूर्ववर्ती साहित्य और अन्य भारतीय भाषाओं के सम-सामयिक साहित्य से विच्छिन्न करके देखा गया है और वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं एवं विचारों में असंगति अथवा अन्तर्विरोध को नहीं पहचाना गया है।" (हिन्दी आलोचना : डॉ रामचन्द्र तिवारी, पृष्ठ -135) त्रिलोचन का 'हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल' शीर्षक का एक निबन्ध मैंने कहीं पढ़ा था, जिसमें वे लिखते हैं -- "एक बंगाली मित्र से बातचीत के सिलसिले में मैंने पूछा कि कवीन्द्र रवीन्द्र के बाद बंगला में कोई बड़ा कवि क्यों नहीं हुआ? चट प्रश्नात्मक उत्तर मिला, 'और पं रामचन्द्र शुक्ल के बाद हिन्दी में कोई बड़ा समीक्षक क्यों नहीं हुआ? .... .... ... .. .... .... .... आचार्य की उपेक्षा करके नया कदम उठाना सम्भव तो है, परन्तु अपूर्ण। प्रत्येक साहित्य की अपनी एक परम्परा होती है और प्रत्येक शिष्ट, सभ्य तथा संस्कृत जाति उस परम्परा का ध्यान रखते हुए उसमें नयी कड़ी जोड़ती है। नवीनता दृष्टिकोण की है, समीक्षा के उपादान तो वही रहेंगे। मार्क्सवादी समीक्षा एक दृष्टिकोण मात्र है, वर्तमान युग की पूर्ण समीक्षा पद्धति नहीं।" त्रिलोचन की यह बात आज भी शत-प्रतिशत उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी 1950 में थी। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी समीक्षा में रस की या भाव की सत्ता को खुले मन से स्वीकार किया है, वे भारतीय रस-परम्परा के अन्तिम आचार्य थे। ऊपर कहा गया है कि नामवर सिंह पाठ निष्ठ आलोचना से हटकर अपनी विचारधारा अथवा व्यक्तिगत रुचियों को अधिक महत्त्व देते हैं । वे आलोचना में तटस्थता के सिद्धान्त का समर्थन कत्तई नहीं करते हैं। नामवर सिंह इसीलिए बहुतों के साथ उचित न्याय नहीं कर सके। अज्ञेय और मुक्तिबोध दोनों अपने समय के हिन्दी के महानतम रचनाकार हैं। दोनों को आमने-सामने रखकर तुलना करने की बात ही बेमानी लगती है। दोनों की अलग-अलग छवियाँ हैं और अलग-अलग दृष्टियाँ भी। आचार्य रामचन्द्र तिवारी कहते हैं -- "मुक्तिबोध' की 'एक साहित्यिक की डायरी' में उभरने वाले विलक्षण कवि- व्यक्तित्व की बगल में 'अज्ञेय' के 'आत्मनेपद' से उभरने वाले कवि-व्यक्तित्व को रखकर नामवर सिंह ने मुक्तिबोध के काव्य वैशिष्ट्य को उजागर किया है। नामवर सिंह कहते हैं --'अज्ञेय' के 'आत्मनेपद' से बहुत कुछ एक शब्द-साधक एस्थीट अथवा सौन्दर्य-जीवी का रूप सामने आता है, जो एक दायरे में जीवन से पूरी तरह संसक्त होते हुए भी अपने रचना- जगत् में सर्वथा नि:संग है : अमानुषिकता की हद को छूने वाली कलात्मक नि:संगता। इसके विपरीत मुक्तिबोध के व्यक्तित्व से उभरने वाला कवि-व्यक्तित्व .... ..... .... जितना कष्टप्रद इसका अस्तित्व संघर्ष है उतना ही कष्टप्रद सर्जन-संघर्ष और जो अपनी निजी पीड़ा को व्यापक मानवीय पीड़ा से अर्थपूर्ण बनाता चलता है।" (विवेचना संकलन, पृष्ठ -118) इस तरह से नामवर सिंह छोटा-बड़ा करने के विचित्र तरीके ढूँढ़ लेते हैं। 'जनतन्त्र और आलोचना' नामक कृति में अशोक बाजपेयी कहते हैं कि -"विकल्पों की सम्भावना जनतंत्र का मूल आधार है।" इसके उत्तर में नामवर सिंह 'वाद-विवाद- संवाद' में कहते हैं --"विकल्पों की सम्भावना अराजकता है।" (हिन्दी आलोचना, पृष्ठ -142) अशोक बाजपेयी ने आठवें दशक में 'पूर्वग्रह' में उस दौर के बड़े युवा कवियों (बिना नाम लिए) को लक्षित करते हुए कहा था -- "अगर पिछले कुछ वर्षों की युवा कीर्तियों का जायजा लिया जाए तो यह दिलचस्प तथ्य सामने आता है कि उनमें से ज्यादातर की प्रतिष्ठा उनके कृतित्व के आलोचनात्मक विश्लेषण और मूल्यांकन से नहीं उपजी है बल्कि उनकी कविताओं पर पर किसी गैर-साहित्यिक एजेंसी द्वारा की गई अपढ़ कल्पनाहीन और लगभग मूर्ख प्रतिक्रियाओं का परिणाम है।" दूसरी ओर नामवर सिंह ने 'वाद -विवाद- संवाद' में युवा लेखन पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा -- "युवा-लेखन कविता और कथा दोनों विधाओं में व्यक्त होने वाला एक समेकित आन्दोलन है, पिछले युग के नवलेखन के समान 'नयी कविता' में कुछ और तथा 'नयी कहानी' में कुछ और जैसा विभक्त और खण्डित युग बोध नहीं।" इस पर आप गौर करें। इन आलोचकों में इस तरह का तोड़-फोड़ प्रायः देखने को मिलता है। ये लोग ख़ास विचारधारा के वशीभूत होकर दूसरे को ग़लत ठहराते हैं । इस तरह का उठाने-गिराने वाला असंतुलन इन लोगों के यहाँ बहुत है और यही इनकी विशेषता भी है। ऐसे ही संदर्भों को डॉ कृष्णचंद लाल उठा-पटक से जोड़ कर देखते हैं। जबकि रामचन्द्र तिवारी की आलोचना सर्वत्र संतुलित है। पद्मश्री सम्मान और भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रोफ़ेसर विश्वनाथप्रसाद तिवारी कहते हैं कि --"आचार्य रामचन्द्र तिवारी की आलोचना में कहीं भी मत्सर भाव नहीं दिखाई पड़ता है। वे तत्त्वाभिनिवेषी समालोचक थे।" साहित्य अकादमी एवं हिन्दी विभाग गोरखपुर विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में विश्वविद्यालय के संवाद भवन में 04 अक्टूबर 2024 को आचार्य रामचन्द्र तिवारी स्मृति शताब्दी समारोह की राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई थी। उसमें मार्क्सवादी समीक्षक डॉ अनिल कुमार राय ने आचार्य रामचन्द्र तिवारी की समीक्षात्मक पुस्तक : 'हिन्दी आलोचना : शिखरों का साक्षात्कार' से संदर्भ ग्रहण करते हुए कहा था -- प्रो. रामचन्द्र तिवारी की आचार्य शुक्ल के साथ कहीं-कहीं असहमति भी है, शुक्ल जी से तिवारी जी टकराते भी हैं, जबकि शुक्ल जी, तिवारी जी के आदर्श हैं। उक्त निबन्ध में आचार्य शुक्ल की लोकमंगल सम्बन्धी प्रसिद्ध अवधारणा का मूल्यांकन करते हुए आचार्य तिवारी ने कहा है कि "शुक्ल जी समाज की एक अत्यन्त जटिल समस्या 'वर्ग - असंतुलन' का समाधान परस्पर सामाजिक सामंजस्य में देख रहे थे , यह भला कैसे सम्भव है ? तिवारी जी प्रश्न करते हैं कि यदि 'राज - सत्ता' समाज के प्रभुत्वकारी शक्तियों के हाथ में हो , तो दमित - शोषित समुदायों की मुक्ति कैसे हो पाएगी ? वे खुद इसका उत्तर देते हुए व्यंग्य करते हैं कि शुक्ल जी इस प्रश्न पर शायद यह कहेंगे कि ब्रह्म की आनंद कला नर के बीच नारायण का रूप धारण कर अवतरित होगी और फिर लोगों की पीड़ा का अंत हो जाएगा।" डॉ नामवर सिंह ने निर्मल वर्मा की कृतियों की समीक्षा करते हुए 'एक सौन्दर्योपासक सन्त की षष्टिपूर्ति पर संवाद' शीर्षक निबन्ध में एक जगह लिखा है --"इसे समझाने के लिए निर्मल जी ने सिर्फ रिल्के का नाम टपका देना काफी समझा, जैसा कि वह अक्सर करते हैं --युक्ति पर वजन रखने के लिए एक बड़ा-सा नाम अनायास प्रसंगवश टपका देना।" डॉ नामवर सिंह जी के कहने के टोन पर ज़रा गौर करें। यह केवल मत्सरी समीक्षा ही नहीं है,यह विचारधारा का संघर्ष है, कह लीजिए 'भारतीयता और मार्क्सवाद' के बीच। जबकि यह काम नामवर जी स्वयं भी करते रहे हैं। वे भी जॉर्ज लूकाच, लूसिए गोल्डमान, अडोर्नो, नीत्शे, प्लेखानोव, मिखाईल लिफशित्स, ऑर्किवाल्ड मैक्लीश , रिल्के जैसे पाश्चात्य नामों का उल्लेख करते हैं। खैर यह कार्य अपनी बातों की पुष्टि के लिए बुरा तो नहीं है, बशर्ते वह आलेख में केन्द्रीय भाव से असम्बन्ध न हो अथवा अप्रासंगिक न हो। आजकल तो आलोचना का जो दौर दौरा है, वह लगातार प्रश्नों और संदेहों के घेरे में है। उसमें यह बात सामान्य- सी हो गयी है,आजकल के जो नये आलोचक तैयार हुए हैं वे प्रायः अपनी बात पश्चिम के किसी बड़े विचारक / आलोचक / रचनाकार से ही शुरू करते हैं,भले ही केन्द्रीय भाव से उसका सीधा सम्बन्ध न हो, भले ही वह नाम लेख में प्रासंगिक न हो। यह फैशन जैसा हो गया है, एकदम अशोभन। प्रसंगवश एक और घटना का स्मरण हो आया है। पं. विद्यानिवास मिश्र का 'रीतिविज्ञान' शीर्षक से कुछ आलोचनात्मक निबंधों का एक संकलन 1974 में प्रकाशित हुआ था, इस पुस्तक में पंडित विद्यानिवास मिश्र ने जीवन के विविध पक्षों को रीति के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है, जिसमें जीवन का रस, आनन्द, प्रेम और प्रकृति का चित्रण भी शामिल है। 'रीतिविज्ञान' में शैलीगत प्रयोग भी विवेचित है, जिसे पंडित जी संस्कृत के अभिजात प्रभाव और लोकभाषा के गँवई गंध को मिलाकर भाषा का प्रयोग करते हैं। साथ ही इसमें भारतीय साहित्य और संस्कृति के गहरे पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया है। डॉ बच्चन सिंह ने उक्त 'रीतिविज्ञान' पुस्तक के प्रकाशन के एकाध साल बाद उसकी तल्ख़ समीक्षा की थी (वही डॉ बच्चन सिंह जो 'हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास', 'आलोचक और आलोचना', 'क्रान्तिकारी कवि निराला', और 'हिन्दी आलोचना के बीज शब्द' प्रभृति दर्जनों श्रेष्ठ आलोचनात्मक कृतियों के गहरी अन्तर्दृष्टि के समालोचक रचनाकार हैं) । बच्चन सिंह की वह समीक्षा अभी प्रकाशित नहीं हुई थी। डॉ नामवर सिंह को जैसे ही पता चला कि बच्चन सिंह ने विद्यानिवास मिश्र की 'रीतिविज्ञान' पुस्तक की तल्ख़ समीक्षा की है,जो अप्रकाशित है, डॉ बच्चन सिंह के यहाँ पहुँचे और माँगकर पढ़ने के लिए ले गये। तुरन्त ही 'आलोचना' के अगले अंक में प्रथम लेख के रूप में छाप दिया बिना पूछे। नामवर जी का यह काम सुशोभन तो नहीं ही कहा जायेगा। हो सकता है कि बच्चन सिंह उस समीक्षा को समय मिलने पर प्रकाशन से पहले दुबारा संशोधित करते। कई बार अपने लेख पर कुछ समय बाद तटस्थ भाव से विचार करने पर रचनाकार द्वारा उसमें आमूल-चूल परिवर्तन करने का मन करता है और रचना यदि प्रकाशित नहीं हुई है तो रचनाकार अपनी ही रचना में आवश्यक बदलाव भी कर देता है, हर बड़े रचनाकार के साथ ऐसा होता है। डॉ बच्चन सिंह को अपनी समीक्षा जब 'आलोचना' में प्रकाशित होने की खबर मिली और उसे पढ़ी तो बच्चन सिंह ने उस पर निम्न शब्दों में प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, हू-ब-हू उन्हीं के शब्दों में ---"नामवर जी स्वयं अपने को विवादास्पद बनाये रखते हैं और अगर कोई दूसरा मिल जाय, तो उसे भी अपनी श्रेणी में घसीट लाते हैं। फिर उन्होंने वागीश शुक्ल से एक लेख मेरे विरुद्ध लिखवाया -असंसदीय शब्दों से भरा हुआ।" नामवर सिंह इतना ही नहीं करते हैं, उनके लिए वागीश शुक्ल से असंसदीय शब्दों का प्रयोग कराके उस आलेख को प्रकाशित कर उसकी एक प्रति डॉ बच्चन सिंह के पास शिमला भेज दी, उस समय डॉ बच्चन सिंह हिमाचल विश्वविद्यालय शिमला में कुलपति थे। डॉ नामवर सिंह के लेखकीय स्वभाव का एक ऐसा पक्ष भी रहा है। बच्चन सिंह आगे लिखते हैं --"पंडित जी ने कभी उसका जिक्र मुझसे नहीं किया। अब तो यदि किसी की किताब की प्रतिकूल समीक्षा छप गयी तो वह जन्म भर वैरी बन जाता है। उसके भाई-भतीजे समीक्षक के विरुद्ध पत्रिकाओं में गालियाँ उगलते हैं। राजनीतिक-दलों की तरह भाई-बिरादरीवाद विष की तरह फैलता जा रहा है। पंडित जी से तुलना करने पर -मनुष्य के रूप में तुलना करने पर -यही कहना पड़ता है कि कहाँ राजा भोज, कहाँ गँगुआ तेली।" (डॉ बच्चन सिंह ने 'लीला का संवरण-समय' शीर्षक अपने एक संस्मरणात्मक आलेख में इस प्रसंग का उल्लेख किया है) यहाँ पर कोई तर्क कर सकता है कि 'कबीर का अनभै-साँच' पर केंद्रित विचार-प्रसंग में कुछ इधर- उधर की बातें आ गयीं हैं। चूँकि बात आलोचना पर चल रही है और डॉ नामवर सिंह तथा आचार्य रामचन्द्र तिवारी आलोचना के केन्द्र में रहे हैं तो आलोचनात्मक धरातल पर उनसे जुड़ी हुई कुछ नितान्त वास्तविक और जरूरी तथ्यों को सामने लाना जरूरी लगता है। संस्मरणों में सत्यानुभूति गैर -जरूरी तो नहीं है। हिन्दी के सम्मानित साहित्यकार ओमनिश्चल कहते हैं कि "नामवर सिंह बहुत बड़े अध्यवसायी आलोचक हैं। उनको पढ़ने से आलोचना पटल पर अच्छा ज्ञान मिलता है। 'कविता के प्रतिमान', 'छायावाद' , 'इतिहास और आलोचना' व 'दूसरी परम्परा की खोज' उनके दुर्लभ समीक्षात्मक ग्रन्थ हैं, पर हिन्दी आलोचना में उन्होंने वाद चलाया, यह हिन्दी आलोचना का दुःखद पहलू है।" तटस्थ , संतुलित और निष्पक्ष आलोचना मुझे भाती है, खोज-खोज कर ऐसी समीक्षाएँ पढ़ता हूँ और अवसर मिलने पर ऐसे समीक्षकों को आवश्यकतानुसार उद्धृत करता हूँ। आचार्य रामचन्द्र तिवारी की परम्परा के डॉ कृष्णचंद लाल जैसे विद्वान् आलोचक ने इसीलिए मेरे पोस्ट को पढ़कर अपना विचार दिया है, जिसे यथास्थिति यहाँ पर मैंने प्रस्तुत किया है। प्रतिष्ठित समीक्षक और व्याख्याता डॉ चित्तरंजन मिश्र ने 'आँखिन देखी आलोचना का विवेक' शीर्षक अपने समीक्षात्मक-संस्मरणात्मक आलेख में उल्लिखित किया है कि 16 फरवरी 2005 को गोरखपुर में डॉ नामवर सिंह का सम्मान समारोह आयोजित हुआ था। उसमें नामवर जी ने बोलते हुए कहा था --"गोरखपुर के लिए यह गर्व की बात है कि यहाँ डॉ रामचन्द्र तिवारी जैसा समर्थ आलोचक है और मेरे लिए गर्व की बात है कि वे मेरा लिखा एक-एक वाक्य ध्यान से पढ़ते हैं, पर यही सोचकर अब कलम उठाते हुए डर भी लगता है कि जो भी लिखूँगा उसे डॉ रामचन्द्र तिवारी ध्यान से पढ़ेंगे । ऐसे विलक्षण अध्येता हैं आचार्य तिवारी जिनसे सम्मानित होने वाले शिखर भी थर्राते हैं। हिन्दी की समूची भाषा -परम्परा को चाहे वह चिंतन की हो या सृजन की, वह चाहे भारतीय परम्परा पर आधारित हो चाहे पाश्चात्य विचारधारा से अनुप्राणित, बेबाक और तटस्थ ढंग से विश्लेषित करने वाले, उसकी सीमाएँ और सम्भावनाएँ बताने वाले, अप्रतिम आचार्य हैं आचार्य रामचन्द्र तिवारी।" वैसे तो आचार्य रामचन्द्र तिवारी की तीन दर्जन से अधिक हिन्दी में श्रेष्ठतम आलोचनात्मक कृतियाँ प्रकाशित हैं, पर उनमें जो समीक्षात्मक कृतियाँ हिन्दी के जागरूक पाठकों द्वारा बार-बार पढ़ी-सराही जाती हैं और जो उनकी अक्षय कीर्ति का आधार हैं - उनमें सर्वप्रमुख हैं -'हिन्दी का गद्य साहित्य' , 'कबीर-मीमांसा', 'मध्य युगीन काव्य साधना' , 'हिन्दी आलोचना : शिखरों का साक्षात्कार', 'कबीर और भारतीय संत साहित्य' , 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल' और 'कथा राम कै गूढ़' आदि। निश्चित रूप से आचार्य रामचन्द्र तिवारी की आलोचना साहित्य-अध्येता में विवेक पैदा करती है। प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ वेदप्रकाश पाण्डेय के निम्न दोहों में तिवारी जी का विराट व्यक्तित्व द्रष्टव्य है -- "रामचन्द्र जी शुक्ल थे,गुरुवर के आदर्श। रखकर उनको सामने, स्वयं बने प्रतिदर्श।। कबिरा-सा जीवन जिए,वाणी वही कबीर। करनी थी आचार्य की,रहनी मस्त फकीर।।" निस्संदेह, आचार्य रामचन्द्र तिवारी श्रेष्ठ समीक्षक, श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हैं और श्रेष्ठ मनुष्य के रूप में भी जीवनभर समादृत रहे। वह समीक्षकों और शिक्षकों दोनों के लिए आदर्श हैं। -- शशिबिन्दुनारायण मिश्र (9453609462) गोरक्षनगर, सिंघड़िया, पोस्ट-कूड़ाघाट, गोरखपुर , उत्तर प्रदेश पिनकोड --273008
