रिपोर्ताज --शशिबिन्दुनारायण मिश्र
रिपोर्ताज --शशिबिन्दुनारायण मिश्र
रिपोर्ताज --शशिबिन्दुनारायण मिश्र 9453609462 19 जुलाई 2026 दिन रविवार को अपराह्न, एक ही समय पर गोरखपुर नगर में दो अतिविशिष्ट साहित्यिक आयोजन थे। दोनों कार्यक्रमों में थोड़ी- थोड़ी देर के लिए जाना हुआ। न जाने क्यों उनका संवेदनशीलता सहित तथ्यात्मक वर्णन करना जरूरी लग रहा है। 19 या 20 जुलाई को ही उसका वर्णन करने का मन था लेकिन तीन-चार दिनों तक लगातार सर्दी-जुकाम और बुखार से पीड़ित रहा। स्वस्थ होने पर उसे बगैर लिखे चैन नहीं मिल रहा था। 19 जुलाई को पहले प्रेसक्लब में आयोजित सत्तन मिसिर स्मृति सम्मान समारोह में जाना हुआ, उस कार्यक्रम में भाषाविद प्रो० रामदरश राय का सम्मान होना था, जिसमें मुख्य वक्ता मार्क्सवादी समीक्षक डॉ० अनिल कुमार राय थे। बाद में दैनिक जागरण प्रेस के निकट गोकुल अतिथि भवन में आयोजित नेहा साहित्य वार्षिकी (पत्रिका) के लोकार्पण कार्यक्रम में जाना हुआ। नेहा साहित्य वार्षिकी हाथ में आते ही मैंने विहंगम दृष्टि डालते ही उसकी स्तरीयता का पता चला। प्रकाशकीय और सम्पादकीय दोनों निष्ठाएँ धन्यवाद के काबिल हैं। इस बार की नेहा साहित्य वार्षिकी में निम्नलिखित रचनाएँ वास्तव में पठनीय हैं, बार-बार पढ़े जाने योग्य हैं-- १-- अद्भुत अंधकार (आलेख)- डॉ० विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, २-- राष्ट्रभाषा चिंतन और डॉ राजेन्द्र प्रसाद (आलेख)- प्रो० सदानन्द प्रसाद गुप्त, ३--प्रेमचंद : फिराक के हवाले से (आलेख) --प्रो० चित्तरंजन मिश्र, ४-- काश् परमानन्द जी थोड़े दुश्मन भी पैदा कर सके होते (आलेख)-- प्रो० अनिल कुमार राय, ५-- नागरी प्रचारिणी सभा देवरिया : सौ साल का सफर (विरासत)- इन्द्र कुमार दीक्षित। इसके अलावा प्रो० दिनेश कुशवाह और डॉ० गुरविंदर बांगा की कविताएँ और नवनीत मिश्र की कहानी व्यक्तिगत डायरी : कृपया इसे न पढ़ें तथा साथ ही दयानन्द पाण्डेय की कहानी- सपनों का सिनेमा भी अच्छी लगी। गोकुल अतिथि भवन के हॉल में जैसे ही पहुँचा तो देखा पूर्व राज्यसभा सदस्य एवं चिंतक प्रोफ़ेसर राकेश सिन्हा जी बोल रहे थे। लोगों ने बताया कि सिन्हा जी ने अभी- अभी बोलना शुरू किया है। सिन्हा जी अच्छे वक्ता हैं। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक समूची भारतीय सांस्कृतिक चेतना को समेटते हुए बड़ा अच्छा उद्बोधन देते हैं। सुनने का मन करता है। सिन्हा जी लगभग एक घंटे तक धाराप्रवाह बोले थे। भारतीयता, भारतीय संस्कृति और भारतीय वाङ्मय को केन्द्र में रखकर जब कोई बोलता है या लिखता है तो मैं उसे बहुत रुचि से सुनता और पढ़ता हूँ। सिन्हा जी बोलकर जैसे ही अपनी जगह पर बैठे और प्रोफ़ेसर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी जैसे ही बोलने के लिए खड़े हुए तो तिवारी जी के उद्बोधन का पहला वाक्य था -- सिन्हा जी ने मेरे सामने मुश्किल खड़ी कर दी है। हो सकता है यह तिवारी जी का ढंग हो। लेकिन तिवारी जी जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे, उसमें आकर्षण बढ़ता जा रहा था। तिवारी जी ने भी समूचे भारतीय वाङ्मय को केन्द्र में रखकर अपना उद्बोधन दिया और कहा कि बड़े कार्य तप के द्वारा ही होते हैं। उन्होंने अपने उद्बोधन में उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता और रामचरितमानस से बहुत सारे दृष्टांत दिये। सिन्हा जी से आगे बढ़कर तिवारी जी ने समूचे भारतीय वाङ्मय को अपने उद्बोधन में संस्पर्शित किया। तिवारी जी ने एक नयी बात कही, वह बिल्कुल नयी लगी और तिवारी जी की वह बात मेरे मन-मस्तिष्क से नहीं उतर रही है, वह यह कि रामायण की रचना करने वाले जो वाल्मीकि हैं और वन में राहजनी करने वाले जो वाल्मीकि हैं, दोनों में अंतर है। राहजनी करने वाले वाल्मीकि ने रामायण की रचना नहीं की। रामायण की रचना करने वाले वाल्मीकि दूसरे वाल्मीकि हैं। तिवारी जी ने यह भी कहा कि आजकल जिस वाल्मीकि को एक वर्ग अपना आइकॉन मानता है, वह भी रामायण के रचयिता नहीं हैं। जिस वाल्मीकि ने रामायण रचा है, वे वाल्मीकि इन दोनों से इतर हैं। तिवारी जी ने अपने तर्क के पीछे प्रमाणस्वरूप रामायण- उत्तरकाण्ड से कुछ श्लोकों को उद्धृत भी किया। तिवारी जी ने सप्रमाण तर्क दिया है वह अत्यन्त विचारणीय है। आश्चर्य है कि अगले दिन अख़बारों में जो रिपोर्टिंग छपी थी, इस चीज पर फोकस नहीं किया गया था। फोकस इस चीज पर जरूर होना चाहिए था। महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि तिवारी जी की बातों पर ध्यान देते हुए यदि उसे आत्मसात किया जाए, तो संस्कृत पाठ्यक्रमों में रामायण के रचयिता वाल्मीकि के बारे में अब तक जो जानकारियाँ मेरे पास हैं, वे सब की सब कपोल- कल्पित होंगी। पिछले २५-२६ वर्षों से मैं अपने छात्रों को अब तक जो जानकारियाँ वाल्मीकि के बारे में देते आया हूँ.....। ऐसी स्थिति में उत्तरप्रदेश शासन को यू० पी० बोर्ड संस्कृत पाठ्यक्रम निर्धारण के समय आदि कवि वाल्मीकि का जीवन परिचय तैयार कराने के क्रम में पुनर्विचार अवश्य करना चाहिए। तब गूगल को भी इससे अवगत कराया जाना चाहिए। -शशिबिन्दुनारायण मिश्र गोरखपुर, उत्तरप्रदेश
