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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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समाधान

समाधान

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"पिच्यासी की तो हूँ अभी, कोई बुड्ढी थोड़े ही हूँ, मेरी हड्डियाँ अभी भी मजबूत हैं, आराम से सीढ़ियां चढ़-उतर सकती हूँ, लिफ्ट की जरूरत नहीं है मुझे।"

 सभी के द्वारा लिफ्ट से जाने के आग्रह पर किसी गाँव से आई माताजी ने जवाब दिया।

"आप हर दो महीने में यहाँ योगपीठ में आकर एक महीना रहती हैं, माताजी आपका घर परिवार नहीं है क्या?"

" है क्यों नहीं, लेकिन वो सब मेरी सेवा तो नहीं करते न, फिर मेरी पेंशन का पैसा भी तो आता है, वह मैं यहाँ दे देती हूँ, जिससे मेरी पूरी सेवा होती है। योगा, मसाज आदि विभिन्न ट्रीटमेंट के कारण और शुद्ध सात्विक आहार के कारण मेरा तन-मन दोनों स्वस्थ रहते हैं, स्वर्ग में ही रह रही हूँ, यहाँ आकर मेरा जीवन सार्थक हो गया है।"

"वाह माताजी आप बहुत समझदार हैं।"

"वह तो मैं हूँ ही।" 

"जी! (मुस्कुराकर), कौन कहता है कि वृद्धावस्था में वृद्धाश्रम में दुखी रहकर बचा जीवन काटने की आवश्यकता है, बल्कि योगपीठों में रहकर खुशी-खुशी सहज जीवन जिया जा सकता है, आप इसका बहुत ही सुंदर उदाहरण है माताजी।" 

माताजी की आँखें अब खुशी से चमक रही थी।


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