डॉ. रंजना वर्मा

Horror


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डॉ. रंजना वर्मा

Horror


सिंधु -सुता

सिंधु -सुता

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प्रमोद ने भरपूर अंगड़ाई ली । सुबह के छह बज रहे थे । सदा की भांति वह उठ गया था । इस समय बालकनी से दिखाई देने वाले सागर की तरंगे उसे बहुत लुभाती थीं । वह उठ कर बालकनी में आ गया । आकाश को भोर की लालिमा रक्तिम बना रही थी । बहुत सुंदर दृश्य था । आकाश से दृष्टि हटा कर उसने सागर तट की ओर देखा ।

अगले ही क्षण वह जैसे सांसे लेना ही भूल गया । स्तब्ध रह गया वह । वर्षों से उसकी इच्छा थी किसी जलपोत को निकट से देखने की । सागर के व्यू वाला फ़्लैट इसीलिए उसने दोगुना मूल्य चुका कर खरीदा था । दो वर्ष हो गए थे उसे इस फ़्लैट में आये परंतु कभी उसे दूर तक जलपोत के दर्शन नहीं हुए थे किंतु आज .... आज तो जैसे उसके भाग्य ही खुल गए थे । सामने तट पर खड़ा था एक अत्यंत सुंदर जलपोत जिसका अगला भाग समुद्र के तट की रेत में फंसा हुआ प्रतीत हो रहा था । पोत पर लिखे हुए सफेद अक्षर दूर से ही चमक रहे थे - 'सिंधु - सुता' ।

आश्चर्य । कैसे इतना बड़ा पोत यहां इस तट पर आ गया ? उसे तो यही ज्ञात था कि जलपोत गहरे समुद्र में ही तैरते हैं । उन तक जाने के लिए छोटी नौकाओं का आश्रय लेना पड़ता है । परंतु यह पोत तो जैसे बाहें फैलाए सामने आकर खड़ा हो गया था और आमंत्रण दे रहा था - 

'आओ , मेरे पास आओ । देखो मुझे ।'

कितनी ही देर तक वह अपलक निहारता रहा उसे । सूर्योदय की किरणें सुनहरी से रूपहली होने लगीं और उस प्रकाश में जैसे वह पल पल और अधिक सुंदर , और अधिक आकर्षक होता जा रहा था । 

 रेलिंग के पास खड़े खड़े ही आठ बज गए । अपने व्यामोह को झटक कर प्रमोद बाथरूम की ओर चला गया । नहा धोकर वापस लौटा तो सीधा किचन में जा पहुंचा । जल्दी जल्दी दो अंडों का आमलेट , ब्रेड और काफी का मग उठाये वह फिर बालकनी में आ गया । वहां वह अक्सर अपना लिखने पढ़ने का कार्य किया करता था । राइटिंग टेबल पर नाश्ते की ट्रे रख कर वह वहीं बैठ गया और नाश्ता करते हुए पोत को देखने लगा । सूर्य की किरणें पोत की खिड़कियों के शीशे से टकरा कर परावर्तित हो रही थीं और चकाचौंध उत्पन्न कर रही थी ।

समुद्र तट पर सुबह टहलने वाले अब छँटने लगे थे । कुछ लोग पोत के पास खड़े होकर उसे देखकर बातें कर रहे थे । धूप तेज होने के साथ-साथ लोग लौटने लगे ।अब यह भी शाम को सूरज ढलने के समय एकत्र होगी यह बात प्रमोद अच्छी तरह जानता था ।

उसने अपने मित्र संजय को फोन लगाया -

"हाय , आज सुबह-सुबह कैसे याद आ गई हमारी ?"

संजय ने हँस कर पूछा ।

"तुम्हारा नाश्ता हो गया ?"

"हां , और ऑफिस के लिए तैयार भी हो गया । तुम आ रहे हो न ?"

 उसने पूछा ।

"एक बढ़िया न्यूज़ दूं क्या ?"

"जरूर । नेकी और पूछ पूछ कर ।"

"तो बस , फटाफट आ जाओ मेरे पास ।"प्रमोद बोला ।

"कहां हो तुम ?"

"फ्लैट पर ।"

"और वह न्यूज़ ?"

"वह भी यही है । तुम पहुंचो तो ।"

"जरूर । बस निकल ही रहा हूँ ।"

"ओके । मैं वेट कर रहा हूँ ।"कह कर प्रमोद में फोन रख दिया ।

 संजय उसका कुलीग होने के साथ-साथ अच्छा मित्र भी था । दोनों एक ही न्यूज़ पेपर 'जनता जागे' में काम करते थे । वे खोजी पत्रकार थे और एडवेंचर प्रेमी भी । उनका अधिकांश अभियान साथ रह कर ही पूरा होता था । संजय को प्रमोद ने इसीलिए बुलाया था । वह उसके साथ जा कर उस सुंदर पोत का निरीक्षण करना चाहता था ।

 एक घंटे बाद संजय ने फ्लैट की घंटी बजाई ।

"आओ .आओ ।"

द्वार खोलते हुए प्रमोद ने कहा ।

"अब बताओ । क्या न्यूज़ है ?"

संजय ने अंदर आते हुए पूछा ।

"अरे , नीचे न्यूज़ नहीं दिखी तुम्हें ?"

"नीचे ? क्यों मजाक कर रहे हो ?"

"मजाक नहीं कर रहा । अच्छा आओ । यहीं से दिखाता हूँ ।"

 प्रमोद संजय को साथ लेकर बालकनी में पहुंचा तो संजय भी उस पॉट को देख कर अवाक रह गया ।

"अजीब बात है । समुद्र के इतने निकट कोई जहाज कैसे आ सकता है ? वह तो गहरे पानी में ही ......"

"हां , यही तो न्यूज़ है । सोचो तो , क्या हुआ होगा ?" 

प्रमोद ने पूछा ।

"शायद किसी कारण जहाज पर नियंत्रण नहीं रहा होगा कप्तान का और वह यहां रेती में आ धँसा ।"

 संजय ने कुछ सोचते हुए उत्तर दिया ।

"हाँ , शायद ऐसा ही हुआ होगा क्योंकि कल रात कोई आंधी तूफान तो आया नहीं था जो इस जहाज को यहां तक धकेल कर ले आता था ।"

"क्या इरादा है ?"

 बहुत तेज देर तक पोत को देखने के बाद संजय ने पूछा ।

"इरादा तो नेक ही है यार ! चल कर निरीक्षण करते हैं ।"

"हां , यही ठीक होगा । चलो ।"

 प्रमोद ने डायरी , पेन , मोबाइल और बड़ी टॉर्च ले ली । फ्लैट बंद करके दोनों नीचे पहुंचे । दोनों के पास उनकी विशेष की रिंग भी थी जिसमें एक छोटी पेंसिल टार्च और छोटा चाकू भी लटक रहे थे ।

 दिन के साढ़े ग्यारह बज चुके थे । समुद्र तट पर इक्का-दुक्का लोग ही दिखाई दे रहे थे किंतु उनकी पोत में रुचि नहीं प्रतीत हो रही थी । एक दृष्टि डाल कर वे अपनी दुनिया में मस्त हो जाने वाले लोग थे ।

 प्रमोद और संजय पंद्रह मिनट में ही पोत तक पहुंच गए । उसका नुकीला इंजन वाला सिरा तट की ओर सिर उठाए खड़ा था । दोपहर की धूप में पूरा जहाज चमचमा रहा था । 

"अब इसके अंदर कैसे चला जाए ?"

 प्रमोद ने पूछा ।

"अंदर ?"

"और क्या ? सुबह से अभी तक कोई व्यक्ति जहाज में दिखाई नहीं दिया । यह क्या विचित्र नहीं लग रहा है ?"

प्रमोद ने पूछा ।

"हाँ , विचित्र तो है लेकिन ... रात में किसी समय यह पोत इधर आया होगा । संभव है इसके कर्मचारी और यात्री उसके बाद ही उतर कर तट पर कहीं होटल आदि में ठहर गए हों ।" 

"यह भी तो हो सकता है कि कोई अंदर ही रह गया हो । चलो , चल कर ढूंढते हैं किसी को जो इसके संबंध में बता सके ।"

 प्रमोद ने कहा और पोत की ओर बढ़ गया । पहले दोनों ने तट पर से ही पोत को अच्छी तरह घूम घूम कर देखा । पीछे की और उन्हें एक रस्सी की सीढ़ी लटकती दिखाई दी । 

"वह देखो । सीढ़ी है उधर । मैंने कहा था न । जरूर इसके यात्री और कर्मचारी उतर कर बस्ती में चले गए होंगे ।"

संजय बोला । प्रमोद ने सिर उठा कर फिर पोत की खिड़कियों की ओर दृष्टि डाली । सभी खिड़कियां बंद थीं । तभी प्रमोद को ऐसे लगा जैसे एक खिड़की के पीछे से कोई गुजरा हो ।

"पोत में अभी भी लोग हैं संजय !"

"क्या कह रहे हो ?" 

"हां , मैंने अभी किसी को उस खिड़की के पीछे से गुजरते हुए देखा है ।"

"कौन था ? स्त्री या पुरुष ?"

"पता नहीं किंतु कोई तो अवश्य था वहां ।"

"यानी कम से कम एक व्यक्ति तो जहाज पर अवश्य ही है ।"

"बिल्कुल । चलो , हम अंदर चलें ।"

"हां , चलो ।"

संजय ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा ।

 दोनों जहाज के पीछे की ओर पहुंचे जहां सीढ़ी लटक रही थी । उसकी सहायता से वे आसानी से पोत के डेक पर पहुंच गए । 

 डेक भी साफ सुथरा दिखाई दे रहा था । वे डेक से नीचे जाने के लिए सीढ़ियों तक पहुंच गए । सीढ़ियां एक और कोने में बनी हुई थीं और उन्हें जहाज के अंदर ले जा सकती थीं ।

ऊपर डेक पर सूर्य की चमकती किरणों के कारण बहुत रोशनी थी लेकिन सीढ़ियां अंधेरे में डूबी हुई थीं । प्रमोद ने अपनी टार्च जला ली । आगे आगे प्रमोद और उसके पीछे संजय । दोनों आहिस्ता आहिस्ता सीढियां उतरने लगे । सीढ़ियां बहुत पुरानी और खस्ताहाल दिखाई दे रही थीं । यही हाल नीचे शिप का भी था । अंधेरा और सीलन भरा । मकड़ी के जाले छत से लटक रहे थे ।

"अजीब बात है । बाहर से तो यह पोत बिल्कुल नया जैसा दिखाई दे रहा था और अंदर से ...... यह तो जैसे सदियों पुराने जहाज में आ गए हैं हम लोग ।"

 संजय ने कुछ सहमते हुए कहा ।

"हां , है तो विचित्र बात ही । ऐसा लगता है जैसे वर्षों से यहां किसी इंसान के पाँव न पड़े हों ।"

 प्रमोद ने भी सहमति प्रगट की । दोनों कुछ और आगे बढ़े । तभी पीछे से एक रोबदार आवाज गूंजी -

"कौन ? कौन है वहां ?"

 दोनों चौंक पड़े । उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा तो एक व्यक्ति कैप्टन के लिबास में खड़ा हुआ दिखाई दिया ।

"कौन हो तुम लोग ? यहां कैसे आए ?"

 उसने फिर पूछा ।

"मैं ..... मैं प्रमोद हूँ और यह मेरा मित्र संजय । हम 'जनता जागे' समाचार पत्र की ओर से आए हैं ।"

  प्रमोद ने बताया ।

"यहां किस लिए ?"

"यह पोत समुद्र तट पर रेती में फंसा दिखाई दिया तो उत्सुकता वश हम यहां चले आए । यह खबर है हमारे अखबार के लिए सर !"

 संजय ने तुरंत बातचीत का रुख मोड़ते हुए कहा ।

"ओह , खबर नवीस हो तुम लोग ।"

 उसने हिकारत भरे स्वर में ऐसे कहा जैसे खबर नवीस होना बड़ी तुच्छ बात हो ।

"साला , इसने तो हमारे प्रेस से होने का कोई रोब ही नहीं खाया ।"

  प्रमोद ने फुसफुसाते हुए कहा ।

"ठीक है ठीक है । इस ओर आ जाओ । मेरे केबिन में चलो । वहीं बैठ कर बातें करेंगे ।"

 कैप्टन ने कहा और पलट कर एक गैलरी में घूम गया । 

दोनों उसके पीछे चल दिए । थोड़ा आगे जाने पर गैलरी के दोनों और कई दरवाजे बने दिखाई देने लगे । 

"यह सब ....."

"केबिन हैं जहाज के कर्मचारियों के । मेरा केबिन सबसे अंत वाला है । सबसे बड़ा और शानदार ।"

 कैप्टन ने गर्व से कहा । सभी केबिनों के द्वार बंद थे । अंतिम केबिन तक पहुँच कर उसने उसका द्वार खोल दिया ।

"अद्भुत ।"

संजय के मुँह से निकल पड़ा ।   

"बहुत... बहुत खूबसूरत है आपका केबिन ।"

 प्रमोद भी बोला ।

केबिन क्या था अच्छी खासी आरामगाह लग रहा था वह । दो अच्छे चौड़े बेड । एक ओर दीवार में जड़ी मेज जिस पर फूलदान फंसाया हुआ था । ताजे फूलों का गुलदस्ता अपनी भीनी भीनी खुशबू बिखेर रहा था । बेड पर बहुत सुंदर कीमती कपड़ा मढा हुआ था । उसके नीचे बनी दराज को खोल कर कैप्टन ने एक बोतल निकालते हुए कहा -

"बैठो बैठो । आराम से बैठो । यह बहुत पुरानी शराब है तीन सौ साल पुरानी । आओ , जाम टकराएँ फिर बातें करेंगे ।"

उसने वहीं कहीं से तीन बिल्लौरी कांच के गिलास निकाल कर उस मेजनुमा संरचना पर टिका दिए । जाम तैयार करके उसने उनकी ओर बढ़ाया ।

"मैं शराब नहीं पीता ।"

 प्रमोद में बड़े संकोच से हाथ जोड़ते हुए कहा ।

"मैं भी ।"

 संजय ने भी हाथ जोड़े ।

"क्या ? शराब नहीं पीते तो क्या दूध पीते हो अभी तक ? हा हा हा । अभी बच्चे ही हो तुम । हा हा हा ।"

ठहाका लगा कर वह हंस पड़ा । सारा जहाज ही हिल उठा था उसकी हंसी से ।

"ले लो । बहुत उम्दा शराब है । एक घूंट ले लो । चख कर तो देखो । जिंदगी भर याद करोगे कि कप्तान साहब ने क्या चीज पिलाई थी ।"

 उसने फिर आग्रह किया किंतु दोनों ने अस्वीकार कर दिया ।

"खैर , मर्जी तुम्हारी ।"

  कैप्टन बोला और एक-एक करके उसने तीनों जाम एक ही सांस में खाली कर दिए ।

"वाह आनंद आ गया ।"

उसने अपनी लाल जीभ होठों पर फिराई तो न जाने क्यों दोनों के शरीर में सिहरन सी दौड़ गई ।

"अब पूछो क्या पूछना चाहते हो ?"

वह उनकी ओर उन्मुख हुआ । 

"यही पूछना था कि अचानक आपका जहाज यहां किनारे तक कैसे आ गया ? यहां तो रेतीला तट है । आधे से अधिक जहाज आपका रेत में खड़ा है ।" प्रमोद ने कहा ।

"रेतीला तट ? हा हा हा । शराब मैंने पी है और नशा तुम लोगों को हो गया है । हा हा हा ।"

"क्या कह रहे हैं आप ?"

"अरे कल रात जो तूफान आया था उसे नहीं देखा तुम लोगों ने ? बाप रे बाप , लगता था पूरा जहाज ही पलट जाएगा लेकिन कुछ नहीं हुआ हमारे जहाज को । अरे सिंधु - सुता नाम है इसका सिंधु - सुता । समंदर तो पिता है इसका । भला इसे कौन हानि पहुंचा सकता है ? हा हा हा ।"

कैप्टन ने हंसते हुए बताया । उसकी बात सुन कर दोनों चकित रह गए । क्या हो गया है कैप्टन को ? कल से रेतीले तट पर खड़े पोत की वास्तविकता को स्वीकार ही नहीं करना चाहता । लगता है इसका दिमाग हिल गया है - संजय ने सोचा ।

 "दिमाग नहीं हिला है हमारा । सच कह रहे हैं हम । हमारी सिंधु - सुता तो सागर की लहरों पर अठखेलियां कर रही है । इधर खिड़की से बाहर देखो । कैसी ऊँची लहरें उठ रही हैं ।"

 कैप्टन ने कहा । दोनों ने खिड़की की ओर दृष्टि उठाई तो उनके होश उड़ गए ।

ठीक ही कह रहा था कैप्टन । सिंधु - सुता पोत तो गहरे सागर में लहरों पर तैरता चला जा रहा था । क्या हो रहा है यह ? जब वे पोत पर चढ़े थे तब तो यह आधा रेतीले तट पर धँसा खड़ा था । बिना किसी बाहरी सहायता के वह सागर में कैसे आ गया ? 

दूर पर कुछ मछुआरों की नौकाएँ भी दिखाई दे रही थीं तट की ओर । ऊँची ऊँची लहरों को काटता पोत बढ़ता जा रहा था । 

"कहां .... कहां जा रहा है यह जहाज ?"

         प्रमोद ने कंपित स्वर में पूछा ।

"आस्ट्रेलिया । वहां हमारे कुछ यात्री उतरेंगे ।"

         कैप्टन ने बताया ।

"और हम ?"

"तुम्हें तो फिर वापस लौटना है न ! यहीं आराम करो तुम लोग तब तक । मैं जहाज का एक राउंड लगा कर आता हूं ।"

         कैप्टन ने कहा और केबिन से बाहर निकल गया । संजय ने भयभीत दृष्टि से प्रमोद की ओर देखा ।

"यह सब क्या हो रहा है प्रमोद ?"

"पता नहीं । यह कैप्टन भी अजीब ही लग रहा है । चलो , हम लोग भी जहाज का एक चक्कर लगा लेते हैं ।"

"हां , यही ठीक होगा । चलो ।"

         संजय ने सहमति जताई । दोनों केबिन से निकल कर गैलरी में आ गए ।

         गैलरी में हल्का नीला प्रकाश फैला हुआ था । वे अन्य केबिनों की ओर बढे । सभी के दरवाजे हैंडल घुमा कर खोले जा सकते थे । अंदर यात्री सोए हुए थे एक केबिन में एक अत्यंत सुंदर स्त्री बिस्तर पर लेटी कोई पुस्तक पढ़ रही थी । एक केबिन में एक बेड पर एक बारह तेरह वर्ष का लड़का लेटा हुआ था । 

         एक-एक करके उन्होंने सभी केबिन खोल खोल कर देख लिए । वे सभी बहुत सुंदरता से बनाए गए थे । ऐसा लग रहा था जैसे जहाज नया हो और अपनी पहली यात्रा पर ही निकला हो ।

        आगे जाने पर उन्हें एक हाल जैसा दिखाई दिया जहां बैंड वाले कोई मधुर धुन बजा रहे थे । तीन यात्री टेबल पर बैठे कुछ खा रहे थे । बहुत ही खुशनुमा वातावरण था ।

        वहां से निकल कर वे इंजन रूम की ओर बढ़ गए । वहां भी सब व्यवस्थित था । यूनिफार्म पहने हुए कर्मचारी अपने-अपने काम में लगे हुए थे । 

        वे ऊपर डेक पर पहुंचे । चारों ओर पानी ही पानी दिखाई दे रहा था । जहाज तेज गति से आगे बढ़ता जा रहा था । 

         अचानक तेज आवाज में भोपू बजने लगा । देखते ही देखते जहाज पर भगदड़ सी मच गई । माइक पर जोर जोर से कहा जाने लगा -

"डेक पर से सभी लोग जहाज के अंदर आ जाएं । डेक बंद किया जा रहा है । तूफान आने वाला है किंतु चिंता की कोई बात नहीं है । सभी लोग अंदर आ जाएं ।"

         प्रमोद ने संजय का हाथ पकड़ा और तेजी से नीचे की ओर भागा । दो कर्मचारियों ने डेक का द्वार बंद कर दिया । पूरा जहाज तेजी से हिल रहा था । ऐसा लग रहा था जैसे वह जहाज लहरों के हाथ का खिलौना बना हुआ हो । नीचे भी अफरा-तफरी का माहौल था । सब इधर से उधर भाग रहे थे ।

         प्रमोद और संजय भी कैप्टन के केबिन की ओर दौड़े किंतु वह बंद था । जब बार बार हैंडल घुमाने पर भी वह नहीं खुला और उस हिलते हुए जहाज में खड़े होना भी मुश्किल होने लगा था तब वे दोनों इंजन रूम की ओर भागे । थोड़ा प्रयास करने पर उसका द्वार खुल गया । वहां दो व्यक्ति जहाज को नियंत्रण में रखने का प्रयत्न कर रहे थे । जहाज का कैप्टन एक सीट पर बैठा बार बार एक लीवर को इधर उधर कर रहा था । 

        इन दोनों को इंजन रूम में देख कर व दहाड़ा -

"तुम लोग यहां क्या कर रहे हो ? वहां केबिन में ......"

"हम बाहर निकले थे । केबिन का दरवाजा खुल नहीं रहा था इसीलिए ......"

"अच्छा अच्छा । उधर ..... उधर खिड़की के पास खड़े हो जाओ और वह.... वह हैंडल पकड़ लो । गिर गए तो सर फूट जाएगा ।"

         उसने चिल्ला कर कहा ।

         संजय और प्रमोद किसी प्रकार डगमगाते गिरते पड़ते उस कथित विंडो तक पहुंच गये । उसके बगल में ही एक हैंडल जैसा बना हुआ था ? उन्होंने उसे जोर से पकड़ लिया । कुछ संभल कर उन्होंने खिड़की से बाहर दृष्टि डाली तो सिहर गए । चारों ओर लहरें उछाल मार रही थीं । बार बार बड़ी बड़ी लहरें उठतीं और उनका जहाज बुरी तरह डगमगा जाता ।

         तभी संजय की दृष्टि उन्हीं लहरों पर डोलती एक छोटी मोटर बोट पर पड़ी । वह लहरों पर उछल कर इधर उधर हो रही थी । ऐसा लगता था कि सहायता न मिलने पर वह समुद्र में पलट जाएगी । पता नहीं कैसे उसका चालक उसे अब तक संभाले हुए था ।

         संजय ने प्रमोद का ध्यान भी उधर आकृष्ट कराया । उसी समय कैप्टन ने भी उस मोटर बोट को देख लिया ।

"ओह , पता नहीं कौन किस्मत का मारा फँस गया है तूफान में । यह तो बस गया ही समझो ।"

"अरे , क्या हम उसे बचा नहीं सकते ?"

उस संघर्षरत वोट को देखते हुए प्रमोद ने पूछा ।"पहले अपने जहाज को तो बचा लें किसी तरह ।"

एक चालक ने चिल्ला कर उत्तर दिया । उसी समय बोट की ओर से सहायता के लिए संकेत दिए जाने लगे । उस पर लगा लाल रंग का बल्ब बार बार जल बुझ रहा था । मोटर बोट एक क्षण के लिए दिखाई देती और अगले ही क्षण फिर लहरों में खो जाती ।

"अरे , यह तो हमारी ओर ही आ रही है । अगर पोत से टकरा गई तो उसके परखच्चे उड़ जाएंगे ।"

"कुछ कीजिए कैप्टन ! शायद हम किसी का जीवन बचा सकें ।" 

         संजय ने विनय पूर्वक कहा ।

"हम ..... हम कुछ नहीं कर सकते इस तूफान में । लहरें कुछ शांत होंगी तभी कुछ प्रयास किया जा सकेगा ।"

         कैप्टन ने बोट पर दृष्टि जमाते हुए कहा ।

         और फिर वे सब चौंक उठे । एक पल के लिए बिजली चमकी । उसके प्रकाश में उन्होंने बोट पर बैठी एक अनुपम सुंदरी को देखा । क्षण भर के प्रकाश में ही उनकी दृष्टि में वह रूप बस गया । उसके सुनहरे बाल कंधों पर लहरा रहे थे । एक हाथ से बोट का स्टेयरिंग पकड़े वह दूसरे हाथ से सहायता मांगती इशारा कर रही थी ।

         उसी समय चालक ने पोत के सामने अचानक से एक चट्टान जैसी देखी और झटके से जहाज को मोड़ दिया । एक हल्का सा धमाका हुआ और अगले ही क्षण तूफान के शोर में खो गया । जहाज उसी ओर घूमा था जिस और वह मोटर बोट थी । शायद जहाज के उस से टकराने का ही धमाका था वह । थोड़ी देर बाद प्रमोद ने समुद्र में उस मोटर बोट के टुकड़े बहते देखे । जहाज से टकरा कर वह नन्ही बोट टुकड़े टुकड़े हो गई थी । उनके चेहरे पर अफसोस के भाव थे ।

         लहरों की ऊंचाई और हवा का वेग कुछ कम होने लगा था जब संजय की दृष्टि पोत से लटकती सीढ़ी पर पड़ी । तेज हवाओं के कारण शायद वह खुल कर नीचे लटक गई थी । उसको पकड़े हुए लटकी हुई थी वह । उसका मुख तेज उड़ते सुनहरे बालों से ढक गया था । वह जहाज पर चढ़ने का प्रयत्न कर रही थी ।

"कैप्टन ! वह लड़की ...."

"कौन सी लड़की ?"

"वही मोटर बोट वाली ।"

"डूब कर मर गई होगी अब तक । उसकी बोट तो टुकड़े टुकड़े हो गई । बेचारी ...."

         कैप्टन बोला ।

"वह उधर ...... सीढ़ी पर लटकी हुई है .... ऊपर आने का प्रयत्न कर रही है ।"

          संजय ने बताया ।

"क्या ? असंभव !"

        कैप्टन चकित होते हुए बोला ।

"आप स्वयं देख लीजिए । उधर .... उस ओर ।"

        संजय में उंगली से संकेत करते हुए कहा । उसी समय जैसे आंधी आ गई । तेज हवा का एक झोंका आया और उसके साथ वह सीढ़ी उड़ कर उनकी उस विंडो के सामने आ गई । और .... यह क्या ? वह लड़की बंद विंडो को पार करती हुई अंदर आ गई ।

"तुम .... तुम यहां कैसे ?"

         कैप्टेन ने पूछा । वह भयभीत हो गया था । यह अनहोनी देख कर तो प्रदीप और संजय के हाथ पांव भी फूल गए थे । वे भी अपना आश्चर्य और भय छिपा नहीं पा रहे थे ।

"मैं पुकारती रही और तुमने मेरी मदद नहीं की ।"

         वह युवती क्रोध भरे स्वर में कैप्टन से कहने लगी -

"जैसे तुम्हें अपनी जान प्यारी है वैसे ही मुझे भी अपनी जान प्यारी थी ..... लेकिन ... नहीं बचाई तुमने मेरी जान । मार दिया मुझे । अब मैं भी सब नष्ट भ्रष्ट कर दूंगी । चुन चुन कर मारूंगी तुम सबको । ...... तुम्हें जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है । मार डालूंगी सबको .... मार दूंगी ..... हा हा हा ।"

         वह भयंकर रूप से अट्टहास करने लगी । देखते ही देखते उसका सुंदर चेहरा भयंकर हो गया । बदले की भावना ने उसके सौंदर्य को सोख लिया था । पिशाच बन गई थी वह । उसका वह भयंकर अट्टहास कानों के परदे फाड़े डालता था । आंखें लाल और बड़ी बड़ी हो गई थीं । दांत बड़े और हिंसक पशुओं के समान हो गए थे । सुंदर गोरा रंग काला पड़ गया था । उसके नाखून बड़े और नुकीले हो गए । और वह साक्षात पिशाचिनी बन गई ।

"हे भगवान ! क्या हो रहा है यह सब ? रक्षा करो बजरंगबली !"

प्रमोद बड़बड़ाया । उसी क्षण जहाज जोर से डगमगाया । संजय और प्रमोद लड़खड़ा कर गिर पड़े और उनकी चेतना लुप्त हो गई ।

समय अपनी गति से चलता रहा ।

 न जाने कितनी देर बाद संजय की चेतना लौटी । उसने आंखें खोलीं किंतु गहन अंधकार के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई दिया । इधर उधर हाथ मारने पर उसका हाथ किसी मानव देह से टकराया ।

"प्रमोद ! .... प्रमोद ! ... उठ यार ! आंखें खोल ।"

उसने उसकी बांह पकड़ कर झकझोरते हुए पुकारा । कुछ देर में प्रमोद ने भी कुनमुना कर आंखें खोल दीं । 

"ओह , इतना अंधेरा .... हाथ को हाथ नहीं सुझाई दे रहा है । हम कहां है संजय !"

 प्रमोद ने पूछा ।

"पता नहीं .... इंजन रूम में ही है हम शायद । तुम्हारी टार्च और मोबाइल कहां है ?"

"देखता हूँ ।"

प्रमोद ने अपनी जेब टटोली तो मोबाइल मिल गया । थोड़ी कोशिश के बाद वह ऑन हो गया । उसकी धीमी रोशनी में पास पड़ी हुई उसकी टार्च भी मिल गई ।संजय ने टार्च उठा कर जलाई तो चारों ओर रोशनी फैल गई । वे अभी भी इंजन रूम में ही पड़े थे और वहीं पड़े थे दोनों चालकों तथा कैप्टन के नर कंकाल । उनके पहने हुए कपड़ों से ही उनकी पहचान हो पा रही थी ।वे दोनों उठ कर किसी प्रकार इंजन रूम से बाहर आए । पूरे जहाज का हाल खस्ता हो गया था । जगह जगह मकड़ियों के जाले लटक रहे थे । हर केबिन का द्वार टूटा हुआ था और अंदर यात्रियों तथा कर्मचारियों के कंकाल पड़े हुए थे । वे लड़खड़ाते हुए इधर उधर भटकते रहे । हर तरफ तबाही अपने निशान छोड़ गई थी ।

"कहां गई वह लड़की ?"प्रमोद बड़बड़ाया ।

"लड़की या पिशाचिनी ?"

"जो भी थी वह .... चुड़ैल या पिशाचिनी .. लेकिन बहुत खूंखार थी । उसी ने इन सब को मारा होगा । अपनी मौत का बदला ले रही थी वह ।"

"और ये जाले ? अभी देर ही कितनी हुई है हमें बेहोश हुए ? इतनी ही देर में मकड़ियों ने यहां जाले भी बना लिए ? और यह जहाज ? कितना सुंदर ..... बिल्कुल नया जैसा ही था । इतने थोड़े से समय में ही इतना पुराना खंडहर जैसा कैसे हो गया ?"

"कुछ समझ में नहीं आ रहा है । चलो , डेक पर जाने वाली सीढ़ी ढूंढो । अब निकलो यहां से ।"प्रमोद ने कहा ।

"हां हां चलो । ढूंढते हैं ।"

उसी अंधकार में टार्च की रोशनी में इधर उधर देखते , अपनी याददाश्त के अनुसार वे वापस लौटने लगे । कुछ देर इधर उधर भटकने के बाद उन्हें वह सीढ़ी मिल गई जिससे उतर कर दोनों से नीचे आए थे । सीढ़ियों की हालत भी जहाज के समान ही खस्ता दिखाई दे रही थी । संभल संभल कर पांव रखते हुए वे ऊपर डेक पर पहुंच गए ।

डेक पर अभी भी हलका उजाला फैला हुआ था । शाम ढलने लगी थी । समुद्र शांत था । हवा सुखद थी यद्यपि वातावरण में हल्की उमस भरी हुई थी और .... यह क्या ? 

वह जहाज तो वहीं समुद्र तट पर खड़ा था । उसका आधे से अधिक भाग रेतीले तट पर फँसा हुआ था । किनारे कुछ लोग अभी भी सूर्यास्त देख रहे थे । 

 उस रोशनी में आकर संजय ने प्रमोद की ओर मुड़ कर कहा -

"प्रमोद ! यह सब क्या गोरखधंधा है ?"

अगले ही पल वह चीख पड़ा । 

"प्रमोद .... प्रमोद ही हो न तुम ? तुम्हारी दाढ़ी ..... तुम्हारे बाल ..."

"क्या हुआ मुझे ?"

प्रमोद ने पूछा । और जब उसने संजय की ओर देखा तो उसकी आंखें भी फटी की फटी रह गई । दोनों एक दूसरे को आंखें फाड़ फाड़ कर देख रहे थे क्योंकि उनके सामने युवा प्रमोद और संजय नहीं बल्कि वृद्ध प्रमोद और संजय खड़े थे सफेद दाढ़ी मूछों और बालों वाले .......

"क्या यह तुम हो संजय ?"

"तुम.... तुम प्रमोद ही हो न ?"

संजय ने चकित हो कर पूछा ।

"यह ... यह क्या हुआ ? तुम इतने बूढ़े कैसे हो गये ?"

"यही तो मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ । हम दोनों इतने बूढ़े कैसे हो सकते हैं और वह भी इतने कम समय में ?"

"अब क्या होगा ?"

वही जो ऊपरवाला चाहेगा ।"

"ऊपरवाला या वह चुड़ैल ?"

"पता नही ....."

दोनो भयभीत हो कर अवाक एक दूसरे को तो कभी आसमान की ओर देख रहे थे ...

        


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