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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Romance Fantasy Inspirational


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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सीजन 2 - मेरे पापा (5)

सीजन 2 - मेरे पापा (5)

9 mins 159 9 mins 159

अपनी कल्पनाओं में पुलकित मैं, यात्रा के बाद सबके साथ घर पहुँच गई थी। उस रात सुशांत के कॉल की आशा नहीं थी। विरह में व्यथित मेरा ह्रदय, ‘समय को निष्ठुर’, ठहराने को कर रहा था कि क्यों यह इतने मंथर गति से चल रहा है। मुझे रविवार से बुधवार के तीन दिन ही बिताना, एक जीवनकाल जितने बड़े लग रहे थे। 

बुधवार भी वह जिसमें सुशांत से मिलन संयोग भी नहीं बन रहा था। बस एक तसल्ली होने वाली थी कि ‘सुशांत, फ़्रांस से हमारी भारतमाता - धरती पर सकुशल लौट आए हैं’। 

फिर बिस्तर पर मैंने व्याकुलता में करवट ली थी। इसके साथ मेरे दृष्टिकोण ने भी करवट ली थी। मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची थी कि ‘समय को निष्ठुर ठहराना उचित नहीं है’। यह समय ही तो था जिसने इस तुच्छ सी लड़की का (मेरा) सुशांत जैसे उत्कृष्ट युवक से जीवन मिलन का संयोग बनाया था। 

यह मनुष्य मन की वह सहज प्रवृत्ति थी जो मुझमें रहकर, असीम सुख की घड़ी शीघ्र आ जाए ऐसी अभिलाषा करा रही थी। मैं इस हेतु अत्यंत अधीर हो रही थी। समय निर्दोष होता है, वह सदा अपनी गति से गमन करता है। वह सभी को साथ, अपने प्रवाह में लिए चलता है। प्रत्येक प्राणी को कभी दुःख, कभी सुख के दर्शन कराते हुए गुजरता चला जाता है। 

तीन दिन भी अपने इस स्वभाव अनुरूप समय गतिशील रहा था। यह मेरी मनोवृत्ति में कमी थी कि इसे बिताना मुझे पहाड़ सा लगा था। फिर बुधवार भी आया था। इस दिन सुशांत ने कोई कॉल कर सकने का अवसर नहीं पाया था। समाचारों पर लगे मेरे कर्णों एवं आँखों से मुझे पता चल गया था कि पाँच राफेल जेट, अंबाला अर्थात भारत की धरती पर लैंड कर चुके हैं। 

अधीरता से उस रात मैंने सुशांत के कॉल की प्रतीक्षा की थी, मगर कॉल नहीं आया था। किसी अन्य की दृष्टि में जो एक सामान्य घटना थी, वह सुशांत ‘मेरे पतिदेव’ से जुड़ी होने से, मेरे लिए विशेष थी। उनके हर कार्य, मेरी दृष्टि में विशेष होते थे। उनका कॉल नहीं आने से मेरा आशंकित मन, किसी अनहोनी की आशंका से मुझे डरा रहा था। आकुलित मन मैं, बहुत समय करवटें बदलने के बाद ही निद्रा की सौगात पा सकी थी। रात्रि अंतिम पहर में मैंने दुःस्वप्न देखा कि 

“सुशांत, एक फ्रेंच लड़की से मिलकर, उसके मोहजाल में फँस गए थे। फिर वे राफेल लाने वाली टीम के साथ, भारत नहीं लौटे थे अपितु उस फ्रेंच सुंदरी के साथ संसर्गरत फ़्रांस की एक होटल कक्ष में पड़े थे। दुःस्वन के अंत में मैंने, सुशांत का एयरफोर्स से कोर्ट मार्शल होते देखा था।”

अत्यंत व्याकुलित हो जाने से तब मेरी नींद टूट गई थी। देखा तो खिड़कियों से सूर्य-रश्मियाँ, मेरे कक्ष को प्रकाशित कर रहीं थीं। 

मैं चेतन हुई जब मुझे समझ में आया कि यह एक दुःस्वप्न था, तब अच्छा लगा कि यह यथार्थ नहीं था। अगर यह यथार्थ होता तो इसकी भीषण कटुता को मैं, कमजोर लड़की सहन नहीं कर सकती थी। मैंने साइड टेबल पर रखे जल से, भय अतिरक में अपने सूख गए गले को तर किया था। फिर उदासी में ही बिस्तर छोड़ा था। ऑफिस जाना है, इस लाचारी ने मुझे तत्क्षण स्फूर्त किया था। 

मैं तैयार होकर किचन में अपेक्षाकृत विलंब से पहुँची थी। 

मैं प्रतिदिन तो ऐसा नहीं करती मगर देखे दुःस्वप्न के प्रभाव से मुक्त होने के विचार से, आज मैंने पापा, मम्मी जी के बारी बारी चरण छुए थे। पापा ने कहा - सदा सुखी रहो। 

यह सुन मैं प्रसन्न हुई थी मगर, मम्मी जी के आशीर्वाद ने मुझे अधिक हर्षित किया था। उन्होंने कहा - बेटी, अखंड सौभाग्यवती भवः। 

इस छोटे से आशीर्वचन का अर्थ विशाल होता है। इसका फलीभूत होना, मेरे पूरे जीवन काल में मुझे ‘पतिदेव’ सुशांत का साथ सुनिश्चित करने वाला था। 

चूँकि जागने में मुझे आज देर हुई थी। अतः जब मैं आई तो मम्मी जी ने नाश्ता चाय तैयार करके टेबल पर लगा दिया था। हम नाश्ता करना आरंभ कर चुके तब, पापा के मोबाइल पर रिंग बजने लगी थी। मेरी अति जिज्ञासु दृष्टि मोबाइल पर पड़ी तो मैंने जो देखा, उससे मुझे चरम प्रसन्नता मिली थी। जी हाँ, इस घड़ी अनुरूप, यह इनकमिंग कॉल ‘मेरे पतिदेव’ का ही था। 

‘मेरे पापा’ भी अद्भुत व्यक्तित्व के धनी हैं। वे मेरे मन की सब भाँप लेते हैं। उन्होंने समझ लिया था कि मैं सुशांत की झलक और वाणी सुनने को मरी जा रही हूँ। उन्होंने अपने मुँह का कौर चबाना जारी रखते हुए, मुझे कॉल रिप्लाई करने का इशारा किया था। 

बटन प्रेस करते ही सुशांत का स्फूर्त, मन को खुश कर देने वाला सुंदर मुखड़ा दिखाई दिया था। विनोदी स्वभाव के सुशांत ने यहां परिहास का मौका नहीं चूका था। वे बोले - 

पापा, यह आप आज मुझे, अतीव सुन्दर लड़की हुए, कैसे दिखाई पड़ रहे हैं? क्या मुझे अपनी आँखों की जाँच करवानी चाहिए?

उनका यह कहना सब देख-सुन रहे हैं, यह बोध होने से मैं बुरी तरह लजाई थी। सुशांत अपने मंतव्य में सफल हुए थे। उन्होंने मेरे चेहरे पर उभरता प्राकृतिक ‘रंग श्रृंगार’ का दर्शन कर लिया था। मेरे मुख से सिर्फ - ‘धत्त’ निकला था। मैंने सिर झुका कर मोबाइल पापा को दे दिया था। 

अपनी मीठी मीठी अनुभूतियों के बीच, मैं पापा एवं पतिदेव की बातें सुन रही थी। जिससे पता चल गया था कि सुशांत कल ही राफेल लेकर आ चुके थे। आने के बाद उन्हें भारत एवं फ़्रांस में समय अंतर के कारण ‘जेट लैग’ (लंबी विमान यात्रा से हुई थकान) रहा था। इस कारण वे कॉल नहीं कर पाए थे। 

मुझे ऑफिस जाना था। अतः पापा- मम्मी जी एवं सुशांत में बातें चल रहीं थीं तब ही मैंने टेबल छोड़ दी थी। तब तक मेरे मन में सुखद आशा का संचार हो गया था। निश्चित ही आज रात मेरी सुशांत से मधुर बातें हो पाएंगी, यह विचार मन में रख मैं ऑफिस पहुँची थी। प्रसन्नता से भरे हृदय से, उस दिन ऑफिस में मेरी कार्य क्षमता में वृद्धि परिलक्षित हुई थी। उस दिन मैंने सामान्य दिनों की अपेक्षा बहुत अधिक काम निपटाए थे। मैं उस शाम ऐसी ही उल्लासित घर लौटी थी। 

मन पर छाए आनंद में, मैंने मम्मी जी से कहा - मम्मी जी, अभी आपका रसोई प्रवेश वर्जित है। आज का पूरा डिनर, मैं ही तैयार करूंगी। 

उन्हें अच्छा लगा था। मुझ पर भेदपूर्ण दृष्टि डालते हुए उन्होंने हामी भर दी थी। मैंने सुशांत और पापा दोनों को प्रिय लगने वाली रसोई तैयार की थी। 

रात डिनर भोज्य देख कर पापा अत्यंत प्रसन्न हुए थे। मुझसे कहा - क्या बात है बेटी! दाल, बाटी, चूरमा एवं बेसन के गट्टे! आज तो आनंद आ जाएगा खाने में!

यद्यपि यह लंच में बनाया जाने वाला भोज्य है। तब भी हर्ष अतिरेक की मनःस्थिति में मैंने, इसे अभी के लिए बनाया था। सबने रस लेकर भोजन किया था। स्वादिष्ट होने से सबकी ओवर ईटिंग भी हुई थी। मैं सोच रही थी कि अपने परिजनों के ऐसे खाते देखने से ही, रसोई बनाने वाले को तृप्ति मिलती है। 

समय पर, मैं आनंद की घड़ी के आगमन की प्रत्याशा में बिस्तर पर आ लेटी थी। आगे जो उल्लेख कर रही हूँ वह सुनने पढ़ने वाले को बड़ा विचित्र सा लगेगा। दिन भर रही मेरी उमंगपूर्ण भावदशा ने लेटते ही पलटा खाया था। 

एकमात्र यह मन के विचार ही होते हैं जो प्रकाश से भी अधिक गति से चल सकते हैं। एकाएक मुझे दुःस्वप्न का स्मरण पुनः आ गया था। इस कारण पतिदेव के प्रति श्रद्धानत रहने वाले मेरे हृदय में, इससे बिलकुल ही विपरीत शंकालु भाव ने स्थान ले लिया था। शंकालु विचार चाहने पर भी मन से जा नहीं रहा था। ऐसी स्थिति में, मैं अभी, किसी और से नहीं स्वयं से ही परेशान हो रही थी। 

तभी सुशांत का कॉल आया था। वे आत्मविश्वास और गर्व से भरे अत्यंत प्रसन्न थे। यह देख मैं सतर्क हो गई कि मैं कुछ भी ऐसा नहीं कहूँ कि इनका अच्छा मूड स्पॉइल हो जाए। 

मुझे पूछना तो यह चाहिए था कि - ‘आप घर कब आ रहे हैं?’ इसकी ही उतावली मुझे, इन दिनों सबसे अधिक रही थी मगर शंकालु विचार के आधीन मैंने इससे अलग प्रश्न किया था। यद्यपि चतुराई से अपने शब्दों को परिष्कृत करते हुए मैंने पूछा था - 

सुनिए जी मुझे एक बात बताइये कि आप फ़्रांस गए थे, वहां तो एक से एक सुंदर लड़कियां होती हैं, उन्हें देखकर क्या आपके मन में, उनके लिए प्रेम उत्पन्न नहीं होता था? क्या अभी की ट्रिप में कोई ऐसी लड़की आपके संपर्क में आई है?

सुशांत जैसे इन प्रश्नों के लिए तैयार बैठे थे। उन्होंने तपाक से कहा - 

हाँ निकी, आप सही कह रही हो। पेरिस में, जिन्हें सुंदरता की मूर्ति कहना सर्वदा उपयुक्त है, ऐसी अनेक लड़कियाँ हैं। उनमें से कुछ से आमना सामना मेरा भी हुआ है। 

सुशांत इतना कह कर रुक गए थे। ‘सुंदरता की मूर्ति’ शब्द किन्हीं और लड़कियों के लिए कहे जा रहे हैं, उनके मुख से यह सुनकर मेरे अंग-प्रत्यंग जल भुन गए थे। अधीर हो मैंने कहा - जी बात अधूरी कही है, आपने!

सुशांत ने मेरे मन में संदेह के कीड़े को देख-समझ लिया था। फिर भी वाणी को मृदुल और प्रेम से ओत-प्रोत रखते हुए उन्होंने कहा - 

रमणीक, ऐसी हर लड़कियों को छूकर आईं प्रकाश किरणें, मेरे मन दर्पण से परावर्तित होने के बाद, आपकी ही छवि निर्मित करती थीं। तब मेरी आँखों के सामने आप ही आप दिखाई पड़ती थीं। आप सच मानो मेरे हृदय में ‘सुंदरता की एकमात्र प्रतिमा’ तुम ही विराजित हो। तुमसे ही मेरा जीवन और तुमसे ही मेरी दुनिया है। 

आहा! आहा! पतिदेव के मुखारविंद से गूँज रहीं वाणी, उनका एक एक शब्द, मुझे अभूतपूर्व तृप्ति प्रदान कर रहा था। मेरा वश चलता तो मैं समय को इसी घड़ी पर रोक लेती। मेरे मुख से अब कुछ नहीं निकल रहा था। कई मिनटों तक मैं सम्मोहित, इन्हें ही देखती रही थी। मैं उन्हें अपनी आँखों के रास्ते हृदय में ऐसे बसा लेना चाहती थी कि अब इस छवि के अतिरिक्त जीवन में, मेरी दुनिया में कुछ और ना दिखे। 

सुशांत, मेरी प्रसन्नता में विघ्न उत्पन्न करने वाले पतिदेव नहीं थे। मुझे, स्वयं को देखता अनुभव करते हुए, वे धैर्य पूर्वक मुझे देखते रहे थे। 

इस रात, आगे के मेरे प्रश्न और पतिदेव के उत्तर छोटे छोटे रहे थे। 

मैंने फिर पूछा था - 

सुनिए जी, विवाह के कुछ वर्षों बाद पतियों को अपनी पत्नी, सुंदर दिखाई नहीं देती। क्या हममें भी यह होगा?

सुशांत ने कहा - 

नहीं, निकी तुम, मुझे इतनी ही सुंदर तब भी लगा करोगी। तब तो तुम, एक पापा कहने वाली हमारी संतान भी मुझे दे चुकी होगी। हममें बांड की स्ट्रेंथ तब दोगुनी नहीं हो जाएगी? 

प्रसन्नता की अनुभूति ने फिर मेरे मन में आहा! आहा! वाला स्वर फिर सुनाई दिया था। अब मुझे ज्ञात हो गया था, हमारे बच्चे की बात सिर्फ मेरे मन में नहीं इनके मन में भी है। 

अगला प्रश्न मेरा, इनसे यह हुआ था - आपने एक ही संतान की बात कही है, क्या अपने दो बच्चे अधिक उपयुक्त नहीं रहेंगें?

सुशांत ने कहा - रमणीक इसमें, हमें देश की जनसंख्या की समस्या को समझना चाहिए। साथ ही मैं यह भी समझता हूँ कि किसी पत्नी के माँ बनने के क्रम में प्रसव वेदना अत्यंत कष्टकारी सच्चाई होती है। मैं एक से अधिक बार ऐसा कष्ट सहते आपको देखना नहीं चाहता। 

आहा! आहा! मैं अब हर्षातिरेक में अभिभूत थी। इन्हें कितना ध्यान है मेरा! क्या ऐसे संवेदनशील और भी कोई पति होते होंगे, दुनिया में!

अंत में मैंने पूछा - अब आप बताइये कि कब आप साक्षात आकर, अपनी इस पुजारन को दर्शन देने वाले हैं?

सुशांत ने कहा - जी अपने धर्म (पत्नी) के दर्शन करने के लिए, यह पुजारी चार घंटे बाद ही एयरपोर्ट के लिए निकलने वाला है। 

मुझे ऐसा लगा मेरा ईश्वर, मेरे मन की समझ मेरे बिना माँगे ही वरदान प्रदान कर रहा है। उनका कल ही होने वाले आगमन का विचार, अब मुझे सुखद आश्चर्य प्रदान कर रहा था।


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