STORYMIRROR

Shailaja Bhattad

Abstract

4  

Shailaja Bhattad

Abstract

श्राद्ध

श्राद्ध

1 min
28

"आज दादाजी का श्राद्ध है, बेटा छत पर जाकर यह प्रसाद रख आओ, ताकि काक खाले; अच्छा सुनो पानी भरा सकोरा ले जाना मत भूलना, दादा जी को खाने के साथ बीच-बीच में पानी पीने की भी तो आदत थी न।"
 "ठीक है माँ, जाता हूँ।" पितृपक्ष की पंचमी दादा जी की तिथि थी। हर साल माँ यही कहती और मैं चुपचाप लेकर छत पर रख आता। आज भी रखकर जैसे ही दो-तीन सीढ़ियाँ उतरी; याद आया छत पर सूख रहे कपड़े भी तो लेना है। जैसे ही पलटा देखकर स्तब्ध था, क्योंकि छत पर काम कर रहे, नीचे आते व्यक्ति से मैं टकरा गया था। जिसके मुँह पर दादाजी का श्राद्ध चिपका हुआ था। छत से प्रसाद गायब था। दौड़कर माँ के पास पहुँचा तो माँ ने श्राद्ध की विधि पुनः की, लेकिन इस बार प्रसाद सिर्फ एक के लिए नहीं वरन उस व्यक्ति के लिए भी निकाल कर घर बुलाकर उसे पेट भर खिलाया गया। माँ ने कहा- "दादाजी, शायद इसी रूप में आए हो।"


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Abstract