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Bhawna Kukreti

Abstract


4.8  

Bhawna Kukreti

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शायद-13

शायद-13

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" सर आप ?"

" नहीं "

"श्योर सर।"

      एक साथ तन्वी, मयंक और मैं बोल उठे। प्रियम सर ठठा के हंस पड़े। " मां जी, भाभी जी ने आज कथा रखी है, आप सब को बुलाया है। तन्वी का फोन कल रात से मिला रहा था पर स्विच ऑफ है..। " कहते हुए प्रियम सर ने तन्वी की ओर देखा। तन्वी ने सर झुका लिया।

     मैंने देखा तन्वी के इस तरह सर झुका लेने पर प्रियम सर के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं थी। मुझे साफ दिख रहा था कि प्रियम तन्वी को लेकर कितने सेंसिटिव हैं। जाने क्यों तन्वी को ये सब नजर नही आता था।

       कुछ देर बाद हम प्रियम सर के बंगले में थे। तन्वी यहां पहली बार आयी थी। लेकिन प्रियम के परिवार वाले जिस गर्मजोशी से उस से मिले मेरा रहा सहा शक भी दूर हो गया। तन्वी को सब ऐसे जानते थे जैसे वो उनके साथ जाने कब से हो। तन्वी भी हैरान थी ।मयंक और प्रियम के बड़े भाई पंडित जी का लिखा सामान लेने मार्किट चले गए।

    भाभी जी हमे घर का टूर कराने लगी। हर कमरा बेहद सलीके से सजाया गया था सिवाय प्रियम सर का। वहां सिर्फ एक बेड, एक कैनवास,कुछ पेंटिंग्स , एक अलमीरा और पर्दे थे। "प्रियम चाहते थे कि निवेदिता जब बहु बनकर आये तो वो कमरा सजाए" भाभी जी ने कहा, तन्वी ने मेरी ओर देखा।

इधर भाभी जी को पंडित जी ने आवाज दी । वो जल्दी जल्दी आगे बढ़ गईं और उधर पीछे से प्रियम सर ने तन्वी को आवाज दी "तन्वी !"

      प्रियम सर के साथ हम लोग उनके रूम में थे।वे तन्वी से एक पेंटिंग को डिस्कस करने लगे। मैं आदतन उनकी बंद अलमीरा को खोल कर वहां रखी पेंटिंग्स उठा उठा कर देखने लगी।एक अधूरा पेंसिल स्केच दिखाई पड़ा। वो देख कर मैं चौंक गई ।

   एक औरत शीशे में अपना अक्स देख रही थी ,अक्स में तन्वी से मिलता जुलता चेहरा था लेकिन जो औरत देख रही थी उसकी कद काठी तन्वी से अलग थी। मैंने अपने मोबाइल में उसकी तस्वीर ले ली।

     पंडित जी के आचमन के बाद पता चला कि आज प्रियम सर का जन्मदिन था। उसी के लिए ये कथा का आयोजन था। तन्वी की मां से भाभी जी खूब बातें कर रहीं थी। मयंक ,तन्वी के साथ हंसी मजाक में लगा हुआ था। प्रियम के भाई चुपचाप पंडित जी के वचन सुन रहे थे। प्रियम बीच-बीच मे मयंक को तन्वी को छेड़ते देखते और मुस्करा उठते। प्रियम सर मुझे अपनी ओर देखते जब पकड़ते तो मुझे तन्वी और मयंक की ओर इशारा करते । मैं मुस्करा देती।

   पूजा के बाद हम सबने प्रसाद लिया।कुछ देर गार्डन में टहलते हुए एकाएक प्रियम सर ने मुझे पूछा "तन्वी रुचिर को लेकर परेशान है क्या ? " मैंने प्रियम सर की ओर देखा" आपने कैसे गेस किया सर ?"


उसके बाद मेरी प्रियम सर से काफी देर बात हुई। मुझे प्रियम सर से बात करता देख तन्वी और मयंक फन्नी इशारे कर रहे थे। मुझे समझ आ रहा था कि वे दोनों क्या फिल्मी एंगल सोच रहे थे। " तन्वी बहुत इमोशनल है और रुचिर बेहद प्रैक्टिकल, अक्सर वो हर्ट हो जाती है" प्रियम सर तन्वी के बारे में कह रहे थे, "कल मैं होटल लौटा तो देखा था रुचिर ने तन्वी को जाते हुए इग्नोर किया।"," आप कहाँ थे ","वहीं हालवे में था।" , " लेकिन सर कल के बाद रुचिर उसके लायक नहीं ,ये वो समझ चुकी है..वो बदल चुकी है। " 

     प्रियम सर ने एक बारगी तन्वी की ओर देखा "कुछ बदलाव जो जल्दी होते हैं वो ..", मैंने टोकते हुए कहा " आपको ये शायद पता न हो , तन्वी दो बार पहले भी मन बना चुकी थी मूव ऑन करने का लेकिन फिर रिसोर्ट में जो हुआ वो आपको पता ही है , पर मुझे अब पूरा यकीन है कि तन्वी रुचिर के लिए वेट नही कर रही।"


       मैने प्रियम सर को रात की बात बता दी। पूरी बात को वो खामोशी से सुनते रहे ।जब निवेदिता और उनके बारे में तन्वी का मन जाना तो चौंक गए। एक दोस्त की पर्सनल लाइफ को किसी के सामने खोलना सही नही था।लेकिन मुझे तन्वी और प्रियम के बीच एक अनकही केमिस्ट्री दिख रही थी। मैं जब से प्रियम सर से मिली थी, उनकी हर एक बात में , मुझे साफ-साफ तन्वी के लिए प्यार दिख रहा था। ".. आपका पेंसिल स्केच देखा मैंने ! " मैने अपनी दोस्त के लिए आख़िरी कोशिश करी। प्रियम सर एक बारगी फिर चौंके और धीमे से मुस्करा उठे।



    "वाह !क्या मुस्कान है सर...वरुणा जी क्या आपने सर को प्रोपोज़ कर दिया ?!" मयंक ने आते ही कहा।"हां! जब कोई और इंट्रेस्टेड नहीं तो मैं क्यों मौका छोडूँ " मैंने मुस्कराते हुए प्रियम सर और तन्वी की ओर देखा। 


     प्रियम सर ने तन्वी की ओर देखा और बोले " तन्वी प्लीज़ सजेस्ट, एक्सेप्ट कर लूं ?"


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