Bhawna Kukreti

Abstract


4.8  

Bhawna Kukreti

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शायद-11

शायद-11

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सुबह अपने रूटीन और तय समय पर मयंक उसके ड्राइंग रूममे बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था। माँ उसका टिफ़िन बांधते हुए,मयंक से कह रही थी"तुम्हारे लिए भी दो परांठे रखे हैं बेटा, खा लेना" मयंक ने फिरोज़ी रंग की कुर्ती में तन्वी को आते देखा तो उठ कर खड़ा हो गया। दोनो एक दूसरे को देख मुस्कराये, मयंक ने आंखों से माँ की ओर इशारा किया,तन्वी ने 'जाने दो' का इशारा करते हुए कहा,"माँ देर हो गयी आज फिर,लाओ टिफ़िन दो।"


तन्वी की माँ ,तन्वी की बढ़ती उम्र और उसके चेहरे पर आए दाग को लेकर चिंतित थी।तन्वी कों ख़ूबसूरत तो नही मगर औसत चेहरे मोहरे की कहा जा सकता था।लेकिन जंगल मे चेहरे पर लगी चोट से उसके गाल पर दो स्टिचेस के निशान साफ दिखते थे। मां ने उसको टिफ़िन दिया तो तन्वी ने बताया कि आज शाम वो मुझे यानी वरुणा से मिलने वाली है।" वरुणा!!? कब आयी वो,कहाँ ठहरी है,तूने बताया भी नहीं","मां अभी देखा उसका मेसेज, रात देर हो जाएगी।", "माँ फिकर नॉट मैं हूँ न ,में साथ रहूंगा।" ,"फिर तुम..!!" तन्वी और कुछ कह पाती मयंक ने तन्वी के हाथ से स्कूटी की चाबी ली और सीढ़ियों पर ये जा वो जा।


ऑफिस पहुंचते ही प्रियम सर ने कहा "क्लाइंट को आज शाम 6 बजे तक प्रेजेंटेशन चाहिए ।" दिन भर तन्वी,मयंक और प्रियम सर तीनो अपने अपने प्रोजेक्ट पर बाकी ऑफिस स्टाफ के साथ बिजी रहे। किसी तरह प्रोजेक्ट 5 बजे तक पूरा हों पाया। प्रेजेंटेशन के लिए सर ने मयंक को भेज दिया। मयंक बड़बड़ करता चला गया।


तन्वी ने मुझसे 5:30 बजे मिलने का कहा था। मैं होटल लाऊंज में बैठी वेट कर रही थी ।पूरे तीन साल बाद हम सहेलियां मिल रहीं थीं।वो थोड़ा लेट पहुंची। उसके साथ कोई और भी था। देखा देखा सा लग रहा था। तन्वी ने मुझे देखा और हाथ हिलाया।


"हाय कैसी हो तुम डियर" ,"हेलो जान !!"तन्वी ने बहुत गर्मजोशी से मुझे गले लगाया। मैं तन्वी को देख रिलैक्स थी।पिछली बार बहुत बिखरे हालात में मिली थी। वो दो बार रुचिर को छोड़ने का मन बना चुकी थी। लेकिन फिर उसकी ईमेल से पता पड़ा कि एक एक्सीडेंट की वजह से वे एक बार फिर करीब आ गए थे।


तन्वी के चेहरे पर अजीब सा निशान देख मैं चौंक पड़ी। "ये दाग?!", तन्वी के चेहरे पर उदासी छा गई। उसके साथ आये इंसान ने तुरंत कहा


" लाइक आ मोल ओन पिंक चीक! शी लुक्स इवन मोर ब्यूटीफुल"

"वरुणा ,ये हमारे सर है ,प्रियम सर... स्वप्न मंजूषा !आर्ट मास्टर पीस!! ? और प्रियम सर ये वरुणा है, मेरी बचपन की सहेली.. आर्ट एनथुजियास्ट।"

" ओ माय गॉड , रियलीsss प्रियम सर!! यु लुक सो यंग ।" मेरे मुह से निकल पड़ा।

"आज कल यंग लोगों की सोहबत में हूँ ,मे बी इसलिए "कह कर प्रियम सर मुस्कराये।



अब मैं आश्चर्य में थी। एक जाना माना नाम,तन्वी के साथ, मेरे सामने था। मुझे एक पल को तन्वी से जलन होने लगी। फिर हम तीनों ने साथ बैठ कर स्नैक्स लिए और कुछ इधर उधर की बाते की। प्रियम की तन्वी की तरफ एक सहजता थी जो साफ दिखायी पड़ती थी, जबकि मैं तन्वी को रुचिर के साथ देखने की आदि थी ,फिर भी मेरी नजरें फर्क साफ देख पा रहीं थी। प्रियम सर के उलट रुचिर जब भी तन्वी के साथ पब्लिकली दिखा चौकन्ना सा ही रहा।


प्रियम सर ने तन्वी से अकेले में कुछ कहा और होटल से बाहर चले गए। मैंने तन्वी को सीधे सीधे पूछा "ये क्या माजरा है मैडम?!" इस से पहले वो कुछ कहती उसका मोबाइल पर कॉल आ गया। कॉल को देख कर वो मुस्कराई और उठ खड़ी हुई "हाय,..हाव आर यूँ?...हां ग्रन्डयोर में हूँ.......अभी अभी तो आयी हूँ , ऐसे क्यों पूछ रहे हो?..हैलो.. हैलो?!"


5 मिनट के अंदर रुचिर, सामने से चला आ रहा था। "हाय वरुणा,गुड़ टू सी यू " , "वाव रुचिर , तुम तो और हैंडसम होते चले जा रहे हो।" वो तन्वी को एक ठंडा सा हाय बोल कर ,मेरे करीब चेयर खिसका कर बैठ गया।ये मुझे अजीब लगा। उसे तन्वी के पास की चेयर पर होना चाहिए था। तभी तन्वी के पीछे से एक और गुड लुकिंग इंसान आया औंर उसके पास की चेयर खिसका के बोला "हेलो अगेन मिस तन्वी, एंड हाय एवेरीबडी, मैं मयंक..तन्वी का दोस्त,कलीग वगैरह वगैरह।"


उस खुशमिज़ाज इंसान,मयंक के आते ही जैसे हमारे टेबल की फ़िज़ा ही बदल गयी।कुछ देर में हंसी मजाक के हंसगुल्ले होने लगे।मुझे कुछ देर पहले रुचिर और तन्वी के बीच जो खिंचाव से महसूस हो रहा था वो नदारद दिखा।मैं मयंक के साथ कॉफी के आर्डर को कहने गयी लौट कर देखा दोनो आपस मे बाते कर रहे थे । रुचिर तन्वी के पास जाकर बैठ गया था ।


कुछ देर बाद रुचिर को उसके किसी कलीग का फोन आया और वो हम सबसे विदा लेने लगा। तन्वी उसे शायद गले लगा कर बाय करने बढ़ी थी पर वो बहुत जल्दी में था। मयंक और मैंने ये इग्नोर किया। "तन्वी मां जी इंतज़ार कर रही होंगी"मयंक बोला।" कम ऑन मयंक ..प्लीज़ !!" तन्वी ने मयंक को घूरा, वो किसी बच्चे जैसा चुप हो गया। मुझे लग रहा था की मयंक उसके साथ बहुत खुला हुआ था । और तन्वी किसी क्लास मॉनिटर की तरह उससे पेश आ रही थी।


यहां सिर्फ 2 दिन के लिए और थी। ये जान कर तन्वी ने मुझे होटल छोड़ कर उसके घर रहने का आफर दिया। इस से पहले में कुछ कहती, मयंक फिर चहचहाने लगा"बाय गॉड!! मेरे तो मजे आ जाएंगे, कल सुबह दो-दो सुंदरियों के दर्शन होंगे।" तन्वी ने मुझे देखा और हम दोनों हंस पड़ी,"क्या हुआ ?!!"मयक ने पूछा।


हम दोनों कैब में तन्वी के घर की ओर जा रहे थे। पीछे पीछे मयंक उसकी स्कूटी लिए आ रहा था।"यार ये मयंक ..?!" मैने कैब में पीछे से आते मयंक को देख कर तन्वी से कहा तन्वी बोली " हाँ यार ..ही इज़ अ क्यूट बडी !" हम दोनो ने देखा वो स्कूटी को खाली सड़क पर लहराता मस्ती में चला आ रहा था।


दोनों घर पहुंच गए ।आंटी बहुत इमोशनल हो गईं थीं।बोली "इसे कुछ समझा, मैंने कब तक जीना है ,भाई भी ब्याह कर लेगा ,उसका भी परिवार होगा, कौन जाने कैसी भाभी मिले....!"


आंटी जी ने भी तय कर दिया था कि आज रात हमारे बीच बहुत सारी बातें होनी हैं ।मुझे भी तन्वी की लाइफ में एक नहीं तीन-तीन अलहदा शख्शियत के लोग दिख रहे थे मगर तन्वी उस एक पर अटकी लग रही थी, जो फ़िलहाल मुझे उस के लिए कभी कुछ खास इच्छुक नही लगा।


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