सचमुच यही तो है सच्चा प्यार
सचमुच यही तो है सच्चा प्यार
जाड़ों के दिन थे और उसी मीठी सी दोपहरी में किसी ने निधि के हाथ में एक गुलाबी लिफाफा लाकर दिया। उसे खोलने पर एक मित्रता का प्रस्ताव मिला ।उसका दिल जोर से धड़कने लगा। ये कौन है जिसे वह दोस्ती के लायक लग रही है। निधि अपने सीनियर के पास गयी। उन्होंने निधि को डाँट लगाकर किस्सा वही समाप्त कर दिया, "पढ़ने के लिए आयी हो ना, पढ़ने में मन लगाओ, क्या फालतू काम में इंट्रेस्ट लेना ?"
अब निधि को और भी विश्वास हो चला था कि प्यार-व्यार उसके लिए नहीं है। उसे तो पढ़कर कुछ बनना है। इस तरह निधि का ग्रेजुएशन हो गया। अब आगे की पढ़ाई की लिए यूनिवर्सिटी आ गयी। वहाँ भी हर तरह से लोग दोस्ती का हाथ बढ़ाते दिखे जिसे वह दरकिनार करती गयी। उसने तो ठान रखा था उसे इन पचड़ों में पड़ना ही नहीं है। पर कहीं ना कहीं, प्यार क्या होता है ये अनुभव करने की ख्वाहिश भी दिल में पल रही थी। अपनी एक खास दोस्त के साथ ही घूमा करती थी। एक दिन उस सहेली ने उसे एक सीनियर स्टूडेंट "सिद्धार्थ" से मिलवाया। उन्होंने उसे अपनी किताबें पढ़ने के लिए दीं। एक अच्छी दोस्ती की शुरुआत हो रही थी। उसने प्रथम श्रेणी में फर्स्ट ईयर पास कर लिया था। उसकी ख़ुशी का ठिकाना ना था। सिद्धार्थ उसके परिणाम से काफी खुश थे। देखते ही देखते फाइनल ईयर भी पूरा होने का समय आ गया था। अब उसे यूनिवर्सिटी छोड़ना थी। तभी एक दिन अचानक, सिद्धार्थ ने उसे "धर्मवीर भारती" की "गुनाहों का देवता" पढ़ने के लिए दी और कहा कि "इसे पढ़ो और समझो शायद तुम्हे कुछ समझ में आ जाये।"
बेहद संवेदशील उपन्यास है। शायद आपमें से कुछ लोगो ने पढ़ा होगा। पढ़कर निधि की आँखों से अनवरत आँसू निकलते रहे। इतनी गहराई से कोई प्रेम कर सकता है ? क्या कोई ऐसा इंसान असली जिंदगी में होता है ? उसे सिद्धार्थ ही "गुनाहों का देवता" नज़र आ रहे थे।
१८ वर्ष कि उम्र से जिस प्यार की परिभाषा को जानने की कोशिश कर रही थी। आज वो उसके सामने खड़े थे। ईश्वर ने उसके सभी सवालों का एक मूर्त जवाब दिया था। उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी थी। अब क्या होगा ? जो लड़की कभी मंदिर नहीं गयी थी। उसने मंदिरों के चक्कर काटने शुरू कर दिए थे। वो अपने "देवता" को, खोना जो नहीं चाहती थी।
पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। सिद्धार्थ बहुत कोशिशों के बाद भी वह कुछ ऐसा हासिल ना कर सका जिससे वह निधि के घर आकर उसका हाथ मांग सके। रोज़-रोज़ अपने विवाह के लिए घर में होने वाले कलह के आगे निधि ने घुटने टेक दिए। फिर आनन-फानन में शहनाईयाँ बजीं, बारात आयी। मन में इष्ट समाये रहे और उसने किसी और के संग फेरे ले लिए।बड़ी ही विकट रात थी। ना तो वह समर्पित प्रेमिका थी और ना ही पतिव्रता पत्नी। उसकी अंतरात्मा धिक्कार रही थी।
भोर का समय था। मयंक ने अपनी नवब्याहता से कहा-" पता है, हमें ५० वर्ष साथ रहना है।" "एक वर्ष साथ रहें, तो बड़ी बात है, ५० का तो पता नहीं !" निधि के ये प्रथम संवाद थे मयंक के साथ। शायद ही किसी नवयुगल ने ऐसी बात की होगी।
उस रात धरती फटी थी कहीं। कहीं आसमान रोया था। निधि का अंतर्मन कराह रहा था। जिस मांग को आसमान के तारों से भरना था। वो सिंदूर के भार से आहत थी। उसके दाहिनी तरफ एक अनजान शख्स बैठा था। जहाँ सिद्धार्थ हुआ करते थे। उफ़ ! ! इतना दर्द कैसे संभाल सकेगी वो। इस मामले में महिलाएं संगीन होती हैं। एक बार दिल में जिसे बैठा लिया वो कभी नहीं निकल पाता।
उसे जीवन बेरंग लगने लगा था। एक इस बात से खुश थी।सिद्धार्थ से किया एक वादा निभा रही थी। सिद्धार्थ ने उसे विदा करते वक़्त एक वादा लिया था। "याद रखना, तुम्हारा जिन्दा रहना, हमारे मिलने से ज्यादा जरुरी है। " ऐसे कई मौके आये, जब वह जीवन से निराश हुयी पर एक इस वादे ने उसे जीवित रखा।
इस शादी और उससे जुडी जिम्मेवारियों के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थी। फिर भी वह कठपुतली की तरह विदा हो गयी।विदा करने वाले खूब रोये ।पर निधि के आँसू तो सिद्धार्थ से विदा होते वक़्त ही बहकर सूख चुके थे। बस मन भर उठा था। वह झूठ के बल पर कोई सम्बन्ध नहीं चाहती थी ।उसने मयंक के सामने, अपने दिल का हाल रख दिया ,"आप चाहें तो इस शादी को अस्वीकार कर सकते हैं ,और आपके ऐसा करने में ,मुझे ख़ुशी होगी।" मयंक ने कहा ,"मुझे कोई आपत्ति नहीं।" ये नुस्खा भी काम ना आया। उसे लगा था कि सच्चाई जान लेने के बाद मयंक उसे छोड़ देंगे और अंततः वह अपने मर्ज़ी की जिंदगी जी सकेगी। पर मयंक ने साथ ना दिया अब वो क्या करेगी ?
एक नए सिरे से नए रिश्ते की नींव रखनी थी जबकि अब तक घाव हरे थे।प्रेम की जिस रूप ने मन को घर कर रखा था व्यवहारिकता उससे कहीं अलग थी। यही होता है जब स्नेह के अथाह-सागर में गोते लगा चुके हों तो जलाश्रयों के जल में क्या गहराई दिखेगी ? कहीं कुछ ख़त्म सा हो रहा था मानो बस जी रहे हैं, क्योंकि जीना है। तभी एक दिन फोन की घंटी बजी।
''क्या मैं निधि से बात कर सकता हूँ ?''
"मैं निधि बोल रही हूँ ,आप कौन ?"
"सिद्धार्थ'' फिर बातें हुईं।
बरसों बाद हुई बातचीत में आँसू रुकते ना थे पर होठों पर मुस्कराहट खेल रही थी। एक ये बात आपको कितनी खुश कर देती है कि कोई आपके कारण दुखी नहीं है। सब अपने जीवन में आगे निकल गए। सचमुच आज निधि के ह्रदय से बहुत बड़ा बोझ उतर गया था। यह पहली अच्छी बात हुई। सिद्धार्थ ने उसकी शादी के दो साल बाद शादी कर ली थी। दूसरी बहुत ही अच्छी बात कि वह अपने पत्नी और बच्चे के साथ बहुत ही खुशहाल जीवन जी रहा था।आमतौर पर लड़कियाँ असुरक्षा की भावना से भर उठती हैं। मेरा चाहने वाला अपनी दुनिया बसा बैठा है। पर निधि और सिद्धार्थ तो अलग ही किस्म के लोग थे।
एक ओर सिद्धार्थ यही कहता जा रहा था कि ''मैं बहुत शुक्रगुज़ार हूँ, तुम्हारे पति का जिन्होंने उस वक़्त तुम्हारी देखभाल की और तुम्हे संभाला जबकि तुम्हे मेरी जरुरत थी। "लव इज समथिंग विच बूस्ट्स यू अप !" हम मिले, हमें यूं हीं मिलना था। जो लोग हमसे जुड़े, उनकी क्या गलती है ? सजा उन्हें क्यों दें ? और सबसे बड़ी बात तो ये है। ना तू स्वार्थी है ना मैं हूँ। जब पेरेंट्स को दुखी नहीं कर सके तो इन निर्दोष लोगों को दुखी कर, हमें क्या हासिल होगा ?"
"हाँ सिद्धार्थ !" तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो। बल्कि मैं भी तुम्हारी पत्नी को धन्यवाद देती हूँ। उसने तुम्हें भरपूर स्नेह और अपनापन दिया जिससे तुम अपने परिवार में खुश रह सके। पर तुमने कहा था कि हमेशा मुझे चाहोगे।मेरी जगह किसी और को दे दी ?" निधि ने तर्क दिया।
"कोई किसी की जगह नहीं लेता। सब अपनी जगह स्वयं बनाते हैं। तुम्हारी जगह सुरक्षित है। मेरे मन में तुम वैसे ही हो जैसे थीं !"
निधि आत्मविश्वास से भर उठी। सच ! वह कितनी भाग्यशाली है। न नाराजगी, न प्रतिकार ! सिद्धार्थ ने उसे दोषमुक्त कर दिया और जीवन में आगे बढ़ने के लिए कहा और निधि ने भी उसका कहा मान लिया और क्यों न मानती ? इतने सुलझे और साफ़ विचार जो थे उसके।
निधि के फ़ोन रखते ही मयंक घर में दाखिल हुए,''कैसा लगा मेरा सरप्राइज ?" ''मतलब'' निधि ने अनजान बन कर पूछा। "अरे मेरे एक दोस्त ने बताया कि सिद्धार्थ से उसका मिलना-जुलना है तो मैंने सोचा क्यों ना तुम्हारी बात करा दूँ, ताकि तुम यह जान लो कि वह अपनी जिंदगी खुशी से जी रहा है। अब तो खुश हो ना।'' मयंक ने कहा।
"बहुत खुश ! आपने मुझे जीत लिया मयंक।" "तुम्हें जीतने के लिए ही मैंने अपने दिल की सुनी मोहतरमा ! प्यार तो हो जाता है पर शादियाँ निभाई जाती हैं। तुमसे प्यार जो हो गया मुझे। चलो !अब हम अपनी शादी को ना केवल निभाएं बल्कि खुशगवार बनाएं।
"अजब अलबेला साजन है मयंक" ये ख्याल आते ही ख़ुशी के आँसूं उसके गालों पर लुढ़क पड़े। सचमुच कितनी भाग्यशाली है वो ! उसके पति को उसका कितना ध्यान है। अब वह उनका पूरा ख्याल रखेगी। जीवन में बस उजाला ही उजाला हर तरफ नज़र आ रहा था। दुःख का वह कोना, जो सालों से बंद पड़ा था उसे मयंक ने प्रकाशित कर दिया था। वह मयंक के गले लग कर असीम आनंद की अनुभूति कर रही थी और मयंक उसे छोटी बच्ची जानकर उसकी पीठ सहला रहे थे। निधि की ईमानदारी व सच्चाई से प्रभावित तो थे ही साथ ही यह जान गए थे कि नए पौधों को बोने के पहले पुरानी मिट्टी को फेरबदल कर ,खाद- पानी देना जरूरी है। तभी तो उन्होंने ये कदम उठाया था।
मेरे विचार -
सचमुच ! यही तो है सच्चा प्यार। जहां पाने और खोने से ऊपर की बात हो। जहां एक दूसरे की ख़ुशी सर्वोपरि लगे। जहां स्वार्थ ना हो, हो तो बस धैर्य और त्याग।
दोस्तों, प्यार पाना सौभाग्य की बात होती है। उसे खो देने की तकलीफ कभी कम नहीं होती। पर भाग्यवश जो जीवनसाथी हमें मिलता है वह एक साथी बन जाये तो जीवन सौभाग्य से भर उठता है !

