Mukta Sahay

Romance


4.6  

Mukta Sahay

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साथी ऐसे भी और वैसे भी अंतिम

साथी ऐसे भी और वैसे भी अंतिम

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अब मुझे रोहन के फोन आया करते थे और मैं भी कभी कभी उन्हें फ़ोन कर लेती थी। मधुर अहसास था यह मेरे लिए। इसके साथ ही धीरे-धीरे मेरी शादी का समय भी आ गया। मुझे भी अपनी शादी का बड़ा उल्लास था और शायद रोहन को भी था। शादी हो गई और मैं बिदा हो रोहन के घर आई। नए जीवन की शुरुआत हुई, नई आशाओं और आकाँक्षाओं के साथ। 

इतने दिनो की भीड़-भाड़, शोर-शराबे के बाद पहली रात के लिए सजा कमरा और उसमें शांति से बैठी मैं, बहुत अच्छा लगा। शादी के बाद, अब पहली बार रोहन से अकेले में बात करने का अवसर मिलेगा, ये सोंच कर मैं मन ही मन बहुत खुश हो रही थी। मैं अब बेसब्री से रोहन के इंतज़ार में बैठी बार-बार घड़ी को देख रही थी। 

रोहन को कमरे में आते-आते पूरे आधे घंटे का समय लगा। मैंने नज़रें उठाई तो देखा वह दरवाज़े को बंद कर रहा था। अब मेरी मन में कुछ और भी भावनाएँ आने लगी और धड़कने तेज होती जा रहीं थी। रोहन पास आकर बैठा, जेब से एक लिफ़ाफ़ा निकल मुझे दिया। मैंने सिर ऊपर कर रोहन को देखा, इस आशय से कि ये क्या है। उसने कहा खोलो। मैंने खोला, टिकट थे दो, पेरिस के। मेरे हाथ पर हाथ रख रोहन ने कहा चार दिन बाद हम पेरिस जा रहे हैं। मैं खुश थी। मेरे चेहरे को अपने हाथों से ऊपर किया और कहा आज तो तुम शरमा रही हो। मैं तो सोंच कर आया था ढेर सारी बातें करने को। बहुत ही मुश्किल से इतने दिनों बाद तुमसे अकेले मिलने का समय मिला है। मेरी धड़कने अब कुछ आहिस्ता होने लगी थीं। 

रोहन ने आगे कहा घर के सभी लोगों से तो मिल ही ली हो, कुछ की पहचान तो याद होगी और कुछ दो दिन साथ रहेंगे तो याद हो ही जाएँगे तुम्हें। कहते हुए रोहन ने एक तकिया सिरहाने से टिकाया और मेरे बिलकुल क़रीब आकर बैठ गया। मुझे भी पीछे टिक कर बैठने को कहा। मैं भी उसके बराबर बैठ गई। पहले भी ऐसे पास बैठे थे हम दोनो लेकिन आज की अनुभूति कुछ अलग सी थी। रोहन ने मेरा हाथ अपने दोनो हाथों के बीच रख लिया, आज उसके स्पर्श में अधिकार का सा अनुभव था। 

गहरी साँस लेते हुए रोहन ने कहा कैसा लग रहा है तुम्हें अब जब हम यहाँ तक आ गए हैं। मैं कुछ कहती इसके पहले ही वह कहता है, मैं बताता हूँ मुझे क्या लग रहा है। बहुत दिनों के बाद ऐसा लग रहा है जैसे एक ठहराव मिला है। पिछले कुछ सालों से अपने अतीत, अपने उन यादों और विचारों के बीच उलझा हुआ था मैं, आज लग रहा है जैसे उन सब को एक विराम मिल गया है। मैं सिर्फ़ जीने के लिए जी रहा था इन दिनों। जीवन एक दिनचर्या हो कर रह गई थी, बस चली जा रही थी। अब जीवन जीने को जी कर रहा है, एक दिशा दिखने लगी है जीवन की। अच्छा लग रहा है। अब तुम बताओ नैना, कैसा लग रहा है तुम्हें। 

मैंने कहा हाँ रोहन मुझे भी एक ठहराव तो मिला है पर उससे भी कुछ ख़ास भी मिला है। अजय वाले प्रकरण के बाद मैं किसी पर भी भरोसा नही कर पा रही थी, किसी पुरुष पर तो बिलकुल भी नही। उस दिन भी जब माँ ने तुम्हारे परिवार से मिलनो को कहा था तो मैं इसलिए मिल रही थी क्योंकि मैंने उस समय के हालत से समझौता कर लिया था। ना अब माँ को मना करने का कोई कारण था और ना ही मैं समय से और लड़ना चाहती थी। मैं किसी से भी शादी कर लेती लेकिन शायद भरोसा, विश्वास नही करती कभी और शादी बस एक समझौता होती मेरे लिए।  मैं थोड़ा रुकी, ठंढी साँस ली और आगे कहा, ऊपर वाले ने मेरे लिए कुछ अच्छा सोंचा था। पहली मुलाक़ात में ही तुमसे मिल गई। मैं फिर से किसी पर विश्वास कर सकी। मैं फिर से मैं हो गई। एक दूसरे पर विश्वास ही तो शादी को सुंदर बनाती है। मुझे शादी करके एक साथी, एक दोस्त मिला जिस पर मुझे विश्वास है, कहते हुए मैंने अपना सिर रोहन के कंधे पर रख दिया। 

इस रात के साथ मैं और रोहन अपने जीवन की एक नई शुरुआत करने जा रहे थे जहाँ एक दूसरे पर विश्वास था, प्यार था और पारदर्शिता थी। इन सब के साथ हम दोनो अब जीवन को जीना चाहते थे एक-दूसरे के साथ और अपने खुशहाल भविष्य के ताने-बाने भी बन रहे थे।


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