रूठे का मानना चाहिए
रूठे का मानना चाहिए
महेश और मदन बचपन के पक्के दोस्त थे। दोस्ती में शिकवा शिकायत न हो, यह तो हो नहीं सकता है। महेश को मदन की कोई बात बुरी लगती थी, तो वह कोई शिकायत करने के बजाए चुप्पी साध लेता था। मदन महेश की इस आदत से वाक़िफ़ था।
इसलिए, जब महेश उससे बात करना कम कर देता था, तब मदन समझ जाता था कि महेश को उसकी कोई बात बुरी लगी है। तब मदन किसी भी तरह से महेश को मना ही लेता था।
एक दिन, महेश मदन को प्यार भरा ताना मारते हुए हँसते बोला,
"तुम मुझे मनाते क्यों हो? मुझसे दोस्ती तोड़ क्यों नहीं लेते हो, जब मैं बात बात पर मुंह फुला लेता हूं।"
तब मदन ने जवाब दिया,
"अगर कोई सच्चा दोस्त या कोई अपना सौ बार भी नाराज़ हो, तो उसको सौ बार मना लेना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोग बहुत कीमती होते हैं। जैसे, मोतियों की माला चाहे जितनी बार भी टूट जाए, उससे उन मोतियों की कीमत कम नहीं हो जाती है। उनकी माला फिर से बना लेनी चाहिए।"
मदन की यह बात सुनकर महेश की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली और उसने मदन को सीने से लगा लिया।
