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Swati Gautam

Tragedy


3.7  

Swati Gautam

Tragedy


रेड लाइट एरिया

रेड लाइट एरिया

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पानी लेने के लिए नीचे उतरा था कि स्टेशन पर चार बच्चों ने मुझे घेर लिया। रंग बिरंगे आधे फटे, कहीं चेन नहीं, कहीं बटन नहीं, ऐसे कपड़ों से सजे बच्चे, दो दो रूपये की जिद़ करने लगे। यह कोई नया दृश्य नहीं था किसी भी स्टेशन या सार्वजनिक जगह पर भीख मांगते बच्चे जगह-जगह देखे जा सकते हैं। मुझे देखकर जब दुकानदार ने बोतल हाथ में थमा और बच्चों को डांटा, तो मैंने हाथ के इशारे से मना किया और एक एक बिस्कुट का पैकेट बच्चों के हाथ में थमा दिया।

पास में ही रेड लाइट एरिया है। साहब रोज गाड़ी आती है इन्हें छोड़ने, रात को ले जाती है। इनको क्या मिलता है बस परसेंटेज मिलता होगा ?"

"हाँ मैं जानता हूं, मैं वाकिफ हूँ पूरी सच्चाई से, इसलिए मैंने बिस्कुट का पैकेट दिलाया। मैं रहा हूं ऐसे लोगों के साथ।"

ट्रेन में वापस आया सौम्या सीट पर नजर नहीं आई। सारी बोगियों में झांककर देखा। सौम्या, सौम्या कहां गई ? हर पल मेरी घबराहट और बेचैनी और चिंता बढ़ती जा रही थी। न जाने कैसे-कैसे ख्याल मेरे दिल में आने लगे ?

रेड लाइट एरिया और सुगंधा नाम दिमाग में दौड़ गया। जब कॉलेज में एन.जी.ओ. से जुड़ा था और उससे पहली बार मिला। सजे धजे अनजान चेहरे, हर दीवार पर लटके हुए, लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करते, होड़ लगी है आकर्षित करने की। जो पहले आकर्षित करेगा आज उसी का पेट भरेगा। छोटी छोटी कोठरी में रहती, लड़कियां औरतें सजीव है या निर्जीव हो चुकी हैं अपनी देह का व्यापार करते हुए ?

सकरी सी सीढ़ियों को पार करते हुए एक कमरे में पहुंचा। चारों तरफ सीलन जिसमें सांस लेना भी दुर्लभ था। तंबाकू और शराब की खुश्बू जैसे दीवारों में समा गई थी। हल्की सी रौशनी से टिमटिमाता हुआ एक बल्ब, सजावट के लिए लगी छोटी छोटी लड़ियाँ, पोस्टरों की वजह से कमरे में कहीं दीवार नजर नहीं आती थी।

मैं कमरे को गौर से देख रहा था कि तभी किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा ,"क्या देख रहे हो बाबू ?" आवाज में छेड़ने वाले भाव थे।

मैं थोड़ा घबरा गया पीछे मुड़ा और हकलाते हुए मैंने कहा ,"मैं सर्वे के लिए आया हूं, एनजीओ की तरफ से। आपसे कुछ जानना है।"

"बोलो क्या जानना है ?" उसने मुस्कुराते हुए कहा। बड़ी-बड़ी आंखें, आंखों पर लगा हुआ मोटा मोटा काजल। गालों पर लगाई गई बहुत चीप किस्म की लाली, जो शायद रात में ज्यादा अच्छी लगती हो? होठों पर गहरी लाल लिपस्टिक, सूट का गला जरूरत से ज्यादा बड़ा था, ये वही थी। मैंने पहले कभी ऐसी किसी औरत को नहीं देखा था। पहली नजर में मुझे उसे देखकर घिन ही आई, यह सोचते हुए मुझे जरा भी अफसोस नहीं हुआ था।

मैं उसे देख रहा था, तभी उसने अपनी गर्दन मटकाते हुए पूछा ,"क्या ? क्यों बे ! कोई लड़की नहीं देखी क्या पहले ? रोज रोज आ जाते हैं यहां सरवे करने। जल्दी बोल टाइम नहीं है मेरे पास, तेरे साथ खराब करने के लिए।"

मैंने एक पुरानी सी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए पूछा ,"क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूं ?" उसने मुंह से कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी गर्दन को हिलाते हुए समर्थन दिया, हां बैठ जाओ।

मैंने पूछा आपका नाम क्या है ? उसने दूसरी कुर्सी पर बैठ, एक पैर कुर्सी पर रखकर कहा, "परी" जानता है परी कौन होती है ? जिसके पंख होते हैं। उसके पास एक जादू की छड़ी होती है, जिससे सबकी इच्छा पूरी कर देती है। वोइच मेरा नाम है, बोले तो एंजेल।"

"ये आपका असली नाम है ?"

" बिल्कुल, नाम भी असली नकली होता है क्या ?"

"आप कहां की रहने वाली हैं ?"

"यहीं की, यहीं पैदा हुई यही बड़ी। जे ही हमारी जन्मभूमि है।"

"आप पढ़ी हैं, कुछ ?"

"अपन कॉलेज नहीं गई कभी क्योंकि काम बहुत होता है। पढ़ने का टाइम नहीं है, लेकिन अंग्रेजी पूरा बोल लेती है।"

मुझे सारी जवाबों में बनावट साफ साफ नजर आ रही थी, वो झूठ बोल रही है।

"आप कब से ये काम कर रही हैं ? आप इससे बाहर नहीं निकलना चाहती ? आप नहीं चाहती कि आपकी कोई इज्जतदार नौकरी हो, एक अच्छी लाइफ हो ?"

उसने गुस्से में आग बबूला हो अपनी कुर्सी से खडे होकर इशारे से कहा, "खड़ा हो, चल बाहर निकल।"

तभी किसी औरत की बहुत जोर-जोर से रोने की आवाज आई। आवाज हमारे करीब आते हुए, कमरे के अंदर समा गई। 40-45 साल की महिला फैले हुए बाल, फटा पुराना सा सूट, शायद किसी और के नपाने का था, अपने सर को पकड़कर चिल्ला चिल्लाकर अपने हाथ पैरों को खुजा रही थी।

उसने परी के पास आकर कहा, "परी मुझे बचा ले, मुझे गोली दे दे, मेरे सर में बहुत दर्द है।"

परी इधर-उधर अपने सारे सामान को टटोलने लगी, गोली उसके पास नहीं थी। उसने कहा तुम बैठो, मैं अभी तुम्हारे लिए गोली मंगवाती हूँ। तभी मैंने अपनी बैग से निकालते हुए कहा मेरे पास फ्लेक्सऑन है। आप ये दे दीजिए, इससे इनको आराम हो जाएगा।

गोली देकर परी ने उसे पास पड़े पलंग पर लिटा दिया और अपने हाथ से उसका सर दबाने लगी। धीरे-धीरे उसका चिल्लाना कम हुआ। वो सो गई। मैं कुर्सी पर बैठा दोनों की पीड़ा को महसूस कर रहा था। परी जो कितनी कठोर होने का दावा कर रही थी, दूसरे ही पल वो जैसे पिघलकर मोम बन गई। अब उसके चेहरे के भाव ही अलग थे। उसमें सहानुभूति, दया, करूणा, बेबसी, लाचारी सारे भाव एक साथ झलक रहे

थे।

परी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा ,"पुराना जीवन हमारी लिए पुराने जन्म के बराबर है। जिसमें हम कभी नहीं जा सकते। अब यही जीवन है। लोग सोचते हैं यह कमाने का सबसे अच्छा तरीका है लेकिन इसकी हकीकत हमसे ज्यादा कौन जानता है ? विमला मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। एक बार गर्भवती होने के बाद इसकी सफाई करवाई गई। उसमें इस इंजेक्शन लगे। इंजेक्शन इसे सूट नहीं किया, अब इसके हाथ-पैरों में खुजली होती है।" परी ने मुझे उसके घाव दिखाए "ये खुजा खुजाकर खून निकाल लेती है। इलाज बहुत महंगा है। इसकी जीवन से भी ज्यादा, इसलिए इसे मरने के लिए छोड़ दिया गया है। यहां हर औरत की यही कहानी है।"

उसने मुझसे पूछा,"तुम्हें क्या जानना है मेरे बारे में ? क्या करोगे जानकर मेरा असली नाम क्या है ? मैं कहां से हूं ? मैं कितना पढ़ी हूं ? मैं भी भूल चुकी हूं। जब भी पुराने जीवन को याद करती हूँ तो दर्द होता है। उसे याद नहीं करना चाहती, अगर तुम्हें जाना है तो तुम कल आना, कल बताऊंगी मैं तुम्हें सब कुछ, मैं कौन हूं ? क्या कहानी है मेरी ?"

पूरी रात मैंने आंखों में निकाल दी। मुझे सुबह का इंतजार था। क्या उसकी मां यही काम करती होगी ? उसका पिता कौन होगा ? न जाने कितने सवाल मेरे मन में थे, जिनका मैं जल्दी-से-जल्दी उत्तर चाहता था। सुबह पहुंचा उन्हीं तंग गलियों में, गलियां अचानक बहुत बड़ी लगने लगी थी। तेजी से बढ़ते हुए कदम उसके दरवाजे पर जा पहुंचे। आज उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट थी। भाव एकदम कल से अलग थे। उस कोठारी के अंदर एक और कमरा था वो उस कमरे में मुझे ले गई। उसने शालीनता से मुझसे कहा," बैठो, पानी पिओगे ?"

मैंने मना कर दिया, "बताओ क्या बताने वाली थी तुम ?" मैंने बिना देर किए पूछा।

वो हँसी, "तुम्हारे लिए तो सिर्फ एक कहानी है, जो तुम्हें जाननी है, लेकिन मेरी जीवन के सबसे सुंदर सबसे अच्छे पल हैं वो जिनके सहारे अब तक जी रही हूँ, किसी को बताना नहीं चाहती, पता नहीं कैसे मैंने तुम्हें हां कर दी।"

" मेरा नाम सुगंधा है। मेरे बाबा सिलाई का काम करते थे। प्यार से मुझे सोगू बोलते। हम पांच भाई बहन थे। मैं सबसे बड़ी, मैं दसवीं तक पढ़ी, अपने गांव के स्कूल में। मैं 18 साल की थी, जब मेरी शादी मेरे बाबा ने मोहन के साथ कर दी। मोहन बंबई में चमड़े की फैक्ट्री में काम करता था। मैं बहुत खुश थी उसके साथ। वो छुट्टियों में गांव आता, कहता, खोली का इंतजाम होते ही वो मुझे अपने साथ बंबई ले जाएगा। मैं दिन रात उसके साथ रहने के सपने सजाती, वो कौन सी घड़ी होगी जब हम दोनों साथ रहेंगे।

फिर वो दिन भी आया, वो मुझे अपने साथ लेकर बंबई आ गया। बहुत प्यार करता था मुझे, चोट मुझे लगती दर्द उसे होता। सुबह से लेकर शाम तक मैं बस उसके आने का इंतजार करती। पति के प्यार और ग्राहक के प्यार में बहुत अंतर होता है। पति के प्यार में सम्मान होता है। उसके प्यार को मैं कभी नहीं भूल सकती। एक महीना हो गया था मुझे। मैंने अपनी खोली से बाहर कदम भी नहीं रखा था। मोहन के पास समय ही नहीं था मुझे घुमाने का। एक दिन मैने जिद पड़ ली, मुझे घुमाकर लोओ। मुझे समंदर देखना है।

सुबह सुबह मैंने खाना बनाया और एक पोटली में बांध लिया। हम दोनों निकल पड़े समंदर देखने। मैंने इससे पहले कभी समंदर नहीं देखा था। उसका शोर, तुमने देखा है कभी समंदर को गौर से ? कितना भयानक लगता है।" जिज्ञासा से उसने मुझसे पूछा।

मैंने कहा ,"मैं गया था एक बार, फिर ? फिर क्या हुआ ?" मैंने पूछा। मेरे मन में सवाल था, कहीं इसके पति ने ही तो ? तभी उसने बोलना शुरु किया "शाम हो गई थी घूमते-घूमते। बंबई की लोकल पकड़नी थी। इतनी भीड़ ! मोहन ने मेरा हाथ कसकर पकड़ा था। धक्का मुक्की करते हुए अचानक मेरा हाथ मोहन के हाथ से छूट गया, तब मुझे एहसास नहीं था, इसके बाद मोहन का हाथ कभी मेरे हाथ में नहीं होगा।"

मैं घबरा गई। मैंने चारों तरफ मोहन को ढूंढा लेकिन मोहन मुझे कहीं ना दिखा। ट्रेन छूट गई। मेरे चेहरे को कोई भी पढ़ सकता था कि मैं घबराई हुई हूँ, तभी एक बूढ़ा, बड़ा भला आदमी था, मेरे पास आया उसने पूछा, क्या बात है बेटी क्यों परेशान हो ? मैंने उसे सारी कहानी बता दी। उसने कहा कोई बात नहीं। मैं तुम्हें अगले स्टेशन पर छोड़ देता हूं। वहां मोहन तुम्हें मिल जाएगा। शहर जैसी चालाकी नहीं थी मेरे अन्दर कि मैं वहीं मोहन का बैठकर इंतजार करती, वो शायद मुझे ढूंढता हुआ वापस आएगा। मैं चल पड़ी उसके साथ। उसने एक रुमाल निकाला और मेरे मुंह पर झाड़ा।

उसके बाद जब आँख खुली तो मैं यही थी। इस अंधेरे कमरे में, मेरी आंखें मोहन ढूँढ रही थीं। मोहन मेरे लिए सपना बन चुका था। मैं चिल्लाई, झपटाई, तभी एक लड़की अंदर आई, विमला, उसने मुझे बताया, कोई बूढ़ा मुझे यहाँ बेचकर गया है। उसने कहा, जितनी जल्दी भूल सकती हो भूल जाओ सब कुछ, जिन रास्तों से गुजर कर तुम यहां आई हो वो यहां तक आते तो हैं, लेकिन वापस बाहर नहीं जाते। शुरु-शुरु में सब कुछ भूलने में तकलीफ हुई लेकिन जीवन से समझौता करना पड़ा।

पहले लगता था कोई मसीहा आएगा, मुझे यहां से निकाल कर ले जाएगा, जैसा पिक्चरों में होता है, पर मैं भी किसी दिन विमला की तरह किसी कोने में पड़ी दम तोड़ दूंगी।" दीवार पर चलते हुए कॉकरोच को देखकर सुगंधा ने कहा, "इससे जलन होती है मुझे, इससे भी गई गुजरी किस्मत है मेरी। उसने मेरी तरफ देखा और बोली अब तुम जाओ। तुम यहां कभी मत आना और ना ही मुझसे मिलने की कोशिश करना। तुमने सारे जख्म कुरेद दिए, उन्हें भूलने में बहुत समय लगता है। बेचने और खरीदने की साथ साथ याददाश्त क्यों नहीं मिटा देते ये लोग। औरत की जगह बदलने से लोग की सोच बदल जाती है, कहीं वो लक्ष्मी है कहीं बाजारू। कभी मैं भी लक्ष्मी थी।"

उसके कमरे में लगी भगवान के फोटो देखकर मेरा मन हुआ कह दूं क्यों पूजती हो इन्हें ? उसकी कहानी सुनकर जब में उठा तो मेरी कदमों से ज्यादा वजन मेरे मन पर था। काश सुगंधा, सुगंधा रहती।

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मैं ट्रेन से उतरकर प्लेटफार्म पर भागा। सब जगह ढूंढा। सौम्या कही नजर नहीं आई, आस-पास लोगों से पूछा, यहां एक लड़की बैठी थी, आपने उसे देखा ? सबने मना कर दिया। पांच मिनट में ऐसा क्या हुआ ? जो सौम्या अपनी सीट पर नहीं है ! पूरी बोगी में कहीं नहीं ?

तभी पीछे हाथ रखते हुए आवाज आई ,"भैया।"

मेरी सांस में सांस आई, "कहाँ चली गई थी, बिना बताए ?"

"भैया, मैं वॉशरूम गई थी।"

"क्या जरुरत है वॉशरूम जाने की, अभी तो घर से आई हो। एक जगह बैठा नहीं जाता ?"

"आप इतना गुस्सा क्यों हो रहे हो ?"

मैंने इशारा किया, अंदर चलो। मेरे मन ने कहा, तुम तो मेरी बहन हो, पर मैं किसी भी लड़की को सुगंधा से परी बनते हुए नहीं देखना चाहता।


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