प्यार
प्यार
नेहा बालपन में ही किसी के प्रति बेहद आकृष्ट हो गई थी।उस उम्र में होने वाला आकर्षण इश्क मोहब्बत तो हरगिज नहीं हो सकता था और ना ही प्यार जैसी ऊंची भावना पनप सकती थी।मगर कुछ न कुछ तो ऐसा ज़रूर हुआ था कि मात्र बारह वर्ष की उम्र में उसका दिल खो गया था।अहले सुबह जब छत पर कपड़े फैलाने गई थी तब बस एक झलक भर देखा था निगाहें टकराई और बस उलझकर रह गई उन दो आंखों के गहराई में मानों डूब ही गई और फिर गुजरता रहा दिन महीने साल दर साल फिर दशक और इस तरह बीत गए चार दशक।12 से 52 भी पार कर गई मगर आंखों में, दिल में, मन और मस्तिष्क में एक ही सूरत, एक ही नाम और एक ही इंसान यथावत विराजमान रहें।सपनों में कल्पनाओं में, चेतन, अचेतन और अवचेतन मन में वो इस कदर अख्तियार किए बैठा रहा की उसे दर्पण में भी वही शक्ल दिखाई देने लगी।उसके हाथों में हरे स्याही वाला एक कलम होती जिससे हर जगह उसका नाम लिखती रहती।कभी अपना नाम भी वही बता देती, अपने पति और अपने बेटे के नाम की जगह भी उसी इंसान का नाम लिख देती।
उसके हाव भाव और बात व्यवहार देखकर लोगों ने उसे पागल करार कर दिया।पागलखाने में पहुंचा दिया गया।मनोचिकित्सक उसका इलाज करना शुरू कर दिया।उससे बदल बदल कर कितने ही सवाल पूछे जाते मगर उसका एक ही जवाब हमेशा होता।सात आठ वर्षों तक दर्जन भर मनोचिकित्सकों ने अपने अपने तरीके से आजमाईश कर ली मगर नतीजा वही का वही रहा एक ही नाम, एक ही तस्वीर और एक ही इंसान जो दुनिया के तमाम रिश्तों में बड़ी सहजता से फीट हो जाता।एक दिन अनायास उसकी मुलाकात उस अज़ीम इंसान से हो गई उसके उम्र के अंतिम पलों में और उस पल उसके भीतर का गुबार किसी ज्वालामुखी के तरह फट गया और नेहा ने अपने मन की सारी बातें कह डाली।वर्षों का संजोया प्रेम, भक्ति, प्यार आसक्ति और मानसिक जुड़ाव ..... हैरानी की बात यह हुई की नेहा के मौन प्रेम का प्रतिदान मिला।
उसे उन सवालों का जवाब मिला जो वो कभी कर ही नहीं सकी थी।क्योंकि दोनों के उम्र में एक बड़ा अंतर था।दोनों परिवार के बीच एक ऐसा पहाड़ था जिसे पार करना नामुमकिन था।कुछ भी संभव नहीं था।मगर उसके मन मस्तिष्क को यह कहां मालूम था ? उसने अपने मन मंदिर में जिसे बसा लिया था उसकी हर रोज पूजा करती रही।शायद उसके आस्था और अटूट विश्वास का ही परिणाम था जो संध्या बेला में उसकी मुलाकात हुई जी भर के बात हुई, शिकवे शिकायतें हुई।रूठना और मनाना भी हुआ और अंत में एम आर आई और सीटी एंजियोग्राफी का जो रिपोर्ट आया वो और भी हैरानी करने वाला था ।
नेहा अवसाद से बाहर निकल आई थी।सहज सामान्य जीवन व्यतीत करने लगी।इन आखिरी लम्हों में बूझता हुआ चिराग धधकने लगा और उसकी ज्योति तेज़ हो गई।उसने फिर से अपनी पढ़ाई शुरू की और सफलता मिलने लगी उसमें आत्मविश्वास जगा और मनोबल बढ़ने लगा।मात्र दो वर्षों में ही उसने कमाल कर दिखाया।जिसे लोग पागल, मूर्ख और कमसवाल समझने लगें थे उन्हीं लोगों ने उसकी सफलता और उपलब्धियों के गुणगान करना शुरू कर दिया।वास्तव में य तो चमत्कार ही हुआ जो एक टूटा हुआ तारा आसमान में चमकता हुआ सितारा बन गया।बस किसी एक के प्यार ने उसकी दुनिया ही बदल ली।
वास्तव में प्यार में बहुत ताकत होती है। प्यार मौत से भी बचा लेता है और नव जीवन देता है।एक ऐसा खुशहाल जीवन जो पहले कभी नहीं जिया था वो खुशनुमा जीवन जीने लगी।हैरानी की एक और बात है कि आज भी उनसे रूबरू मुलाकात नहीं हुई है।उनका रिश्ता देह से नहीं था इसलिए रूबरू मिलने की चाहत भी नहीं हुई।यह रूहानी रिश्ता था जिसमें मन से मन का मिलन होता है उनके बीच शरीर नहीं कभी आकार ही नहीं ले सका।12 वर्ष के उम्र में जो दीदार हुआ था वही था पहला और शायद आखिरी मुलाकात।इन वर्षों में जो कुछ भी हुआ एक लम्बी दूरी के दरम्यान हुआ खतों के माध्यम से जज्बातों का आदान प्रदान हुआ, शिकवे शिकायतें हुई, रूठना मनाना भी हुआ और एक स्वस्थ संबंध बनकर मजबूत कड़ी तैयार हुई अगले जन्म के लिए .....।
नेहा का प्यार बेमिसाल बना और उसके प्यार का प्यार भी महान प्रेम कहलाया। प्रेम और मर्यादा के बीच का यह रूहानी मोहब्बत सदियों तक पढ़ी और सुनी जाएगी।

