"पूड़ी -तरकारी का श्रेय युद्ध"
"पूड़ी -तरकारी का श्रेय युद्ध"
आदरणीय "StoryMirror“मंच को एक लघु संस्मरण सादर समर्पित !
निष्कर्ष : यह संस्मरण मिथिला के घर-आंगन की खुशबू लिए हुए है। एक थाली पूरी-सब्जी से पूरे समाज का दर्शन निकल आता है: अच्छाई सामूहिक है, बुराई का दोषी कोई एक नहीं। इसलिए अगली बार जब कोई पूछे “किसने बनाया है?”, तो जवाब हो – “घर ने बनाया है”।
दिनाँक:----29 अप्रैल 2026
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“पूड़ी-तरकारी का श्रेय युद्ध”(मिथिला संस्मरण )डॉ लक्ष्मण झा परिमल==================== काम काज के घर में कम-ज्यादा खाने-पीने में मेष-वृष हो ही जाते हैं! कभी सब्जी फीकी हो जाएगी, तो कभी मसाला ज्यादा; कभी दाल पतली और तो हल्दी गायब रहेगी! कभी-कभी अधपकी पूड़ी तो कभी चावल गीला मिलना कोई आश्चर्य नहीं है! उस पर आकर घर के लोग मुँह देखते हुए पुछते हैं ,------
"कहिए ओझा जी, कैसा बना है?...... छोटी बहू ने बनाया है!"
पहले कुछ क्षण के लिए मौन हो गया ! अंततः दबे स्वर में बोलना पड़ता है, --"ठीक है!"
कुछ और कहूँगा तो बहू को बुरा लग सकता है! लेकिन अच्छा यदि व्यंजन होगा तो खाने वाले अवश्य कहेंगे , "आह! क्या अद्भुत भोजन बना है! सुंदर, अति सुंदर!"
इतना ही नहीं, खाना खाने वाला पूछता है, "आज भोजन किसने बनाया है?"सुरेखा मेरी छोटी साली हैं ! उनके छोटे बेटे का विवाह 20 अप्रैल 2026 को था! वे सब सुंदरपुर भिट्टी, मधुबनी में रहते हैं! दुमका से 19 अप्रैल 2026 को मैं वहाँ पहुँच गया! बारात 20 तारीख को बलवा, नौहट्टा, सहरसा गई! 21 तारीख सुबह होने पर भिट्टी आ गया! दुल्हन के गौने का दिन 23 तारीख था! दुल्हन उसी दिन आएगी! चतुर्थी पूजन और भरफोरी यहीं मनाई जाएगी!मिथिला (मैथिली) संस्कृति में विवाह के बाद के रस्मों में चतुर्थी पावनी (जिसे स्थानीय भाषा में 'चौथरी' या 'चतुर्थी' कहा जाता है) अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह रस्म विवाह की पूर्णता का प्रतीक है और मिथिलांचल की अनूठी परंपरा है। मिथिला में यह मान्यता है कि चतुर्थी की पूजा और सिन्दूरदान के बिना विवाह अधूरा माना जाता है। यह रस्म विवाह के चौथे दिन संपन्न होती है, जो वैवाहिक जीवन की आधिकारिक शुरुआत का प्रतीक है।मिथिला की संस्कृति और परंपरा में भरफोरी मुख्य रूप से विवाह अनुष्ठान से जुड़ी एक पारंपरिक रस्म है, जो विवाह के समय होने वाले 'कोहबर' अथवा 'समदाउन' गीतों के साथ संपन्न की जाती है।हम कहीं भी रहें ! मैं अपनी रूटीन से बंधा रहता हूँ !23 अप्रैल की सुबह तैयार होकर व्यायाम किया! भोर में जलपान बना! मेरी साली सुरेखा ने जलपान परोसा ! और कहा,----"ओझा जी, देखिए आज सुमन की बहू ने जलपान बनाया है!" जलपान बहुत पवित्र/शुद्ध था! उसमें कोई विशेष व्यंजन तो नहीं था, परन्तु पूरी, सब्जी और लाल गुलाबजामुन का स्वाद अनुपम था! पूरी में मोयन प्रचुर मात्रा में थी! फूली-फूली पूरी और चटपटी सब्जी में नमक की मात्रा बिल्कुल सही लगी! मैं तृप्त हो गया! जलपान के बाद मैं अपने कमरे में आ गया!मेरा मन हुआ कि बहू को अच्छे जलपान के लिए कुछ इनाम दिया जाए! अपना ब्रीफकेस खोलकर अपना पर्स निकाला! तभी शिवीपट्टी वाली मेरी सरहज श्रीमती गौरी देवी मेरे कमरे में आईं! मैंने अपना विचार व्यक्त किया,----"आज बहू सपना ने विलक्षण जलपान बनाया था! एक रत्ती भी नमक ज्यादा नहीं था!"श्रीमती गौरी देवी ने तपाक से बोलीं,---"सब्जी तो मैंने ही बनाई है! हाँ, पूरी सपना ने बनाई है!"थोड़ी देर बाद स्वयं मेरी पत्नी आशा आईं! उनसे मैंने पूछा,------"एक बात मुझे बताइए कि आज जलपान किसने बनाया था?"
"मैंने बड़ी बहू सीमा को देखा, वो आटा गूंथ रही थी!"—आशा ने जवाब दिया !निष्कर्ष पर मैं पूरी तरह पहुँच गया कि कोई एक व्यक्ति जलपान का सूत्रधार नहीं है! सबके प्रयत्न और लगन से ही जलपान विलक्षण बना! मैंने अपना ब्रीफकेस बंद किया और पारितोषिक के रूप में सबको धन्यवाद ज्ञापन ही कर सका !=======================डॉ लक्ष्मण झा परिमलदुमकाझारखंड29 अप्रैल 2026
