"सहेली साक्षी के संग ,आभा की अनोखी यात्रा "
"सहेली साक्षी के संग ,आभा की अनोखी यात्रा "
आदरणीय “StoryMirror” मंच को नमन करते इस संस्मरण को सादर समर्पित !
संदर्भ :-- आभा अपनी सहेली को इन जगहों से परिचित कराना चाहती है, जो उनके बंधन को मजबूत करता है। साथ ही, पिता और माता भी इस यात्रा का हिस्सा बनते हैं, जिससे परिवारिक जुड़ाव और भी गहरा होता है।
दिनाँक:--28 02 2026
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“सहेली साक्षी के संग, आभा की अनोखी यात्रा”
(यात्रा -संस्मरण)
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
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“बाबू जी ,मैं कलकत्ता में अपनी पुस्तक
“गोइंग बियॉन्ड इम्पॉसिबिलिटीज" के लिए वर्ष 2025-2026 के उभरते लेखक का पुरस्कार लेने के लिए पहुँची हूँ ! मेरे साथ मेरी सहेली साक्षी भी आयी है ! 17 फरवरी 2026 को बंदेभारत से दुमका पहुँचूँगी और एक घंटा रुक कर सब मिलकर मंदार हिल चल पड़ूँगी ! आप लोगों को भी चलना है !”
यह मोबाइल से बातें मेरी जेष्ठ पुत्री कर रही थी ! वो दिल्ली से कलकत्ता आयी थी ! कलकत्ता से दुमका आ रही थी ! पहले साक्षी को मंदार हिल दिखलाना चाहती थी और उसके बाद बैद्यनाथ धाम की पूजा अर्चना !
मैंने भी आभा से पुछा,--“बेटा ,ऐसी क्या बात है ? जो आए और रुके भी नहीं ?”
“ऐसी बात नहीं है ! 17 और 18 तारीख को हमलोग साथ रहेंगे और 18 तारीख को दुमका आ जाएंगे ! आपलोगने भी तो मंदार हिल नहीं देखा है ! हमलोगों का दर्शन हो जाएगा ! आप चिंता ना करें !”
मैंने अपनी सहमती दे दी !
कहीं दूर सफर में जाने के लिए दीपक ड्राईवर को ही मैं चुनता हूँ ! मारुति सुज़ुकी अर्टिगा हर हमेशा तैयार रहती है ! आभा और साक्षी 11 बजे दुमका पहुँची और 1 बजे 17 फरवरी 2026 को हमलोग मंदार हिल के लिए निकाल पड़े ! आभा अपनी माँ आशा से बहुत सारी बातें करने लगी !
मंदार हिल दुमका से 70 किलोमीटर की दूरी पर है ! तकरीबन दो घंटे लग जाते है !
मंदार हिल (या मंदार पर्वत) बिहार के बांका जिले में स्थित एक पवित्र और ऐतिहासिक ग्रेनाइट पहाड़ी है, जो लगभग 700-800 फुट ऊंची है। इसे पौराणिक समुद्र मंथन की घटना से जोड़ा जाता है, जहां देवताओं और असुरों ने वासुकी नाग की सहायता से इसे मथानी के रूप में उपयोग किया था। मकर संक्रांति पर यहां बड़ा मेला लगता है।धार्मिक संगम: पर्वत पर हिंदू (भगवान विष्णु/मधुसूदन) और जैन धर्म (12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य की निर्वाण स्थली) से जुड़े प्राचीन मंदिर हैं।पापहारिणी सरोवर: पर्वत की तलहटी में एक पवित्र तालाब है, जिसे 'पापहारिणी' कहते हैं। माना जाता है कि इसमें स्नान करने से पाप धुल जाते हैं और कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलती है।
रास्ता सुगम और चारों तरफ हरियाली ही हरियाली देखने को मिल रहा था ! को-ड्राईवर के सीट पर मैं बैठा था ! आशा ,आभा और साक्षी पीछे बैठीं थीं ! चारों तरफ जंगल और छोटी -छोटी पहाड़ियाँ आकर्षक के केंद्र बिन्दु थे ! आभा और साक्षी काफी रील भी बना रही थी ! यह रास्ते मेरे जाने पहचाने थे ! जगह -जगह के विषयों में मैं साक्षी को बताता रहता था ! हमलोग तो फिर कभी आ सकते थे पर साक्षी तो गुरुग्राम से आयी थी ! उसे झारखंड और बिहार के विषय में बताना जरूरी था !
बीच में मुख्य तौर पर हंसडीहा और नोनीहाट गुजरते हुये सड़क के दाहिने ओर मंदार हिल पहुँच गए !
गाड़ी को पार्किंग में रख भव्य मंदार हिल को निहारते रह गए ! जमीनी सतह पर एक विशाल तालाब (पापहारिणी सरोवर) और बीच में एक भव्य मंदिर !
चारों ओर पक्का चबूतरा ,सुंदर वातावरण और सामने मंदार पर्वत बड़ा ही मनोरम लग रहा था !
अनगिनत बंदरों का समूह चंचलता को दर्शाते थे ! पर सब के सब शांत थे !
अब मंदार हिल पर चढ़ना आसान हो गया है ! रोपवे से हमलोग ऊंचाइयों पर चढ़कर प्रकृतिक नज़रों का दर्शन किया !धार्मिक संगम: पर्वत पर हिंदू (भगवान विष्णु/मधुसूदन) और जैन धर्म (12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य की निर्वाण स्थली) से जुड़े प्राचीन मंदिर की भी पूजा अर्चना की !
लगभग 5 बजे शाम को हमलोग देव नगरी बैद्यनाथ धाम (बाबाधाम) के लिए प्रस्थान कर लिए ! यहाँ से देवघर 70 किलोमीटर था ! एकता इंटरनेशनल होटल में रात को रुके और 18 फरवरी 2026 सुबह मंदिर प्रांगण में पहुँच गए ! यह धर्मस्थल
झारखंड के देवघर में स्थित बैद्यनाथ धाम (बाबाधाम) को हृदय पीठ कहा जाता है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहाँ माता सती का हृदय गिरा था। यह स्थान भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ शक्तिपीठ भी है, जहाँ सती को 'जय दुर्गा' के रूप में पूजा जाता है। झारखंड के देवघर में स्थित बैद्यनाथ धाम (बाबाधाम) को हृदय पीठ कहा जाता है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहाँ माता सती का हृदय गिरा था। यह स्थान भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ शक्तिपीठ भी है, जहाँ सती को 'जय दुर्गा' के रूप में पूजा जाता है।
पंडा के सहयोग से वी आई पी पास लिया और पूजा अर्चना करके पुनः दुमका के लिए चल दिये !
सही में इतने पास रहते हुये कभी हम जा ना सके पर यह तीर्थ करने का सपना पूरा करने के पीछे संयोग और मेरा सौभाग्य था !
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका
झारखंड
