"सहेली साक्षी के संग ,आभा की अनोखी यात्रा " यात्रा -संस्मरण पार्ट -2 "
"सहेली साक्षी के संग ,आभा की अनोखी यात्रा " यात्रा -संस्मरण पार्ट -2 "
आदरणीय “StoryMirror” मंच को प्रणाम के साथ एक यात्रा संस्मरण सादर समर्पित !
संदर्भ :-----यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक स्थल का दर्शन नहीं है, बल्कि इसमें प्राकृतिक सौंदर्य (मसानजोर डैम) और एक शहरी पड़ाव (रामपुरहाट) का भी सही मिश्रण है। कुल मिलाकर, यह एक ऐसी यात्रा थी जो आध्यात्मिक, मनोरंजक और भावनात्मक—तीनों स्तरों पर संतोषजनक थी।
दिनाँक:-----30 मार्च 2026
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"सहेली साक्षी के संग, आभा की अनोखी यात्रा"
(यात्रा -संस्मरण -तारापीठ और मसानजोर डैम- पार्ट 2)
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
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17 फरवरी 2026 को पहले मंदार पर्वत , 18 फरवरी 2026 को बाबा बैद्यनाथ धाम और उसी दिन बाबा बासुकीनाथ की पुजा अर्चना करने के बाद हमलोगों की यात्रा समाप्त नहीं हुयी ! मेरी पुत्री आभा के साथ साक्षी उसकी सहेली गुरुग्राम से साथ साथ आई थी ! दुमका के तीनों दर्शनीय स्थान को देखने के बाद लौटते समय आभा ने पूछा ,
---“बाबू जी, क्यों न तारापीठ भी हो आयें? साक्षी तो शायद ही फिर आने वाली है!”
आशा और मैंने कहा ,--“चलो चलते हैं ! दुमका से 85 किलोमीटर दूर है ! पुजा तो आज नहीं कर सकेंगे ! कल पुजा सुबह -सुबह करेंगे ! एक काम कीजिये, एक सुंदर होटल में दो रूम बूक कर लीजिये !” इतना कहना था कि आभा ने ऑनलाइन तारापीठ में “संभावना” होटल बूक कर दिया !
आभा पिछले साल अपनी दूसरी सहेली के साथ तारापीठ का दर्शन कर चुकी थी ! इतना करीब रहते हुये भी हम दोनों कभी भी तारापीठ का दर्शन नहीं कर सके थे ! आज यह अवसर मिल रहा था ! चलो देख आयें तारापीठ ! तारापीठ (Tara pith) पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित एक प्रमुख हिंदू शक्तिपीठ और प्रसिद्ध तांत्रिक साधना केंद्र है। यहाँ माँ तारा की पूजा होती है, जिनका मंदिर द्वारका नदी के किनारे स्थित है। मान्यता है कि यहाँ माता सती के नेत्र गिरे थे, इसलिए इसे 'तारापीठ' कहा जाता है। यह मंदिर अपने तांत्रिक इतिहास, श्मशान घाट और बली प्रथा के लिए भी जाना जाता है।
दुमका शहर फिर से गुजरना था ! ड्रायवर दीपक के बदले में ड्रायवर अजय को बुलाया गया क्योंकि दीपक की माँ अधिक बीमार हो गई थी ! अजय भी कुशल चालक था ! दुमका जिला के बाद बंगाल ही आ जाता है! तारापीठ जाने के लिए दुमका से दो रास्ते हैं ! एक रेल्वे लाइन साथ चलती हुई रामपुरहाट पहुँचते हैं ! रामपुरहाट के बाद तकरीबन तारापीठ 9 किलोमीटर है ! अजय को मैंने समझाया ,
--“शिकारीपाड़ा होते हुये जायेंगे और लौटते समय दूसरे रास्ते से मासांजोर डैम को भी देखते आयेंगे!”
दुमका से निकलते ही हम लोग घने जंगलों से गुजरने लगे ! सड़क के दोनों तरफ पेड़ ही पेड़ थे और छोटी-छोटी पहाड़ियाँ थीं ! प्राकृतिक दृश्यों का अनुमान तो हमें था, पर साक्षी के लिए बड़ा ही अद्भुत था ! वह जगह-जगह रुककर फोटो खींच रही थी ! कभी वीडियो बना रही थी तो कभी आभा के साथ रील बना रही थी ! उन लोगों के साथ हम भी आनंद उठा रहे थे ! देखते- देखते कब हमलोग रामपुरहाट की दूरी तय हो गयी अनुभव ही ना हो पाया !
रामपुरहाट से तारापीठ भी बहुत शीघ्र पहुँच गए ! मंदिर के एक किलोमीटर पहले ही नेशनल हाईवे में “संभावना होटल” था ! हमलोगों के स्वागत में “संभावना होटल” के लोग सारे खड़े थे! विशाल पार्किंग और सुंदर लॉन पहले ही आकर्षक लगे ! स्वागत कक्ष फूलों और गुलदस्ताओं से मनोरम लग रहा था ! दो लड़कियाँ सुंदर एक जैसी परिधानों में हाथों में थाल लिए खड़ी थीं ! दोनों आगे बढ़कर प्रणाम किया ! सुंदर रंगीन शॉल गले में डाला ! चारों को कोल्ड ड्रिंक दिया और फोटो हम लोगों को भी उन लोगों ने लिया !
दूसरे दिन सुबह 6 बजे तारापीठ मंदिर के लिए चल पड़े ! 10 मिनट्स के अंदर हम लोग मंदिर के निकट पहुँच गए ! कुछ दूर पैदल चलने के बाद हम चारों तारापीठ मंदिर पहुँच गए ! पुजा सामाग्री लेकर एक पंडा से पूछा ,
--” लाइन बहुत लंबी है ! हमलोग जल्दी पुजा करना चाहते हैं! ”
“कोई बात नहीं ,पुजा हो जाएगी ! 300 रुपये का पास मिलता है ! आप चारों ले लें ! और बाँकी मुझ पर छोड़ दें !”
पूजा करने के बाद वापस “संभावना होटल” लौटे और भोजन करने के बाद हमलोग मसांजोर के रास्ते दुमका की ओर चल पड़े !
मसानजोर डैम (Massanjore Dam), जिसे 'कनाडा बांध' (Canada Dam) भी कहा जाता है, झारखंड के दुमका जिले में मयूराक्षी नदी पर स्थित एक प्रमुख पर्यटन और पिकनिक स्थल है। कनाडा के सहयोग से निर्मित यह बांध अपनी प्राकृतिक सुंदरता, पहाड़ियों और हरी-भरी वादियों के लिए जाना जाता है, जो सैलानियों को बहुत आकर्षित करता है। साक्षी को सबसे अधिक आनंद आया ! दुमका के करीब होने के नाते आभा ,आशा और मैंने तो कई बार इसे देखा था ! कुछ क्षण के बाद हम लोगों ने दुमका के लिए प्रस्थान किया!
यात्रा पूरी हुई ! साक्षी खुश थी ! उसके सपने पूरे हुये ! आभा भी प्रसन्न थी ! और हम अपने को गाइड समझकर धन्य हो गए !
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका ,झारखंड
