"इडली दोसा "
"इडली दोसा "
आदरणीय "StoryMirror "मंच को नमन के साथ आज एक लघु संस्मरण सादर समर्पित !
संदर्भ :-----आर्मी जॉइन करने के बाद इस लाजवाब व्यंजन से परिचय, फिर घर पर बनाने का रोमांच - सब कुछ बहुत ही प्यारा और रिलेट करने वाला है! यह एक छोटी, प्यारी और मार्मिक कहानी है जो खाने के प्रति प्रेम, रिश्तों की बारीकियों और हमारे रोज़मर्रा के जीवन में छिपी छोटी-छोटी खुशियों को उजागर करती है !
दिनाँक :--10 मार्च 2026
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"इडली- दोसा"
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
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दक्षिण भारतीय व्यंजन खासकर इडली और दोसा मुझे बहुत अच्छे लगते हैं ! मैं आज तक कहीं किसी होटल में जाऊँ, तो मेरी प्रथम प्राथमिकता इडली दोसा की रहती है ! जब भी वैटर ऑर्डर लेने आता है तो मैं यही पूछता हूँ ,----" आपके पास साउथ डिस में क्या- क्या है?" अगर ये दोनों मिल गए तो बल्ले -बल्ले और ना मिला तो फिर मजबूरी जो कराये !दरअसल इडली दोसा का नाम मैंने आर्मी जॉइन करने के बाद जाना ! 1972 में कमांड अस्पताल लखनऊ में प्रशिक्षण के दौरान आर्मी कैंटीन के पास ही मद्रासी वेट कैंटीन था ! ब्रेक में वहीं इडली-डोसा का सेवन करने लगा ! ट्रैनिग के बाद मेरी आशा और तीन मेरे बच्चे मेरे साथ -साथ रहने लगे ! मेरिड एकोमोडेसन (परवारिक निवास)में सब प्रान्तों के लोग रहते थे ! उनके साथ रहकर सबके प्रान्तों के व्यंजन (भोजन) के स्वादों का पता लग गया ,पर मेरी सुई साउथ डिस पर ही रुकी रहती थी !1980 में सैनिक चिकित्सालय किरकी पुणे में परिवार के साथ था ! केरल के चन्द्रशेखरण कुरूप जाते- जाते मुझे चावल पीसने वाला पत्थर दे गया ! मैंने किरकी बाजार से अलमुनियाम का इडली वर्तन खरीदा ! आशा ने अपनी पड़ोसनी से इडली, दोसा, चटनी और सांभर बनाने की विधि सीख ली ! अब तो मुझे कहीं जाना नहीं था ! घर में ही आनंद !शनिवार को निर्णय हुआ कि रविवार को इडली बनेगी ! मेरे भाग्य जग गए ! एक घानी में 16 इडली उतरतीं थीं ! आशा ने आकार पूछा ,--" इडली ,चटनी और सांभर के सिवा और कुछ दूसरा चीज नहीं बनेगा !"मैंने कहा,--- "मंजूर है !"आशा ने सफ़ेद उरद दाल ,उसना चावल और मूँगफली को शनिवार शाम को भिगोने दे दिया ! रविवार को पत्थर पर पीसा गया ! पूरी तत्परता और लगन के साथ आशा ने इडली बनायी साथ साथ प्लेन दोसा भी ! जम कर खाया ! बहुत स्वादिष्ट बना था ! आशा मेरी भंगिमा निहार रही थी ! मैं मौन था ! अपनी आकृति ऐसी बना ली जैसे यह अच्छा नहीं बना हैं ! तारीफ भी मैंने नहीं की ! खाया भी कम ! सोचा शाम को और खाऊँगा !शाम को जब अस्पताल से आया ! मुझे भूख लगी थी ! मैंने आशा को कहा ,--" लाइये इडली दोसा ! इसी समय आस पड़ोस की महिलाएं आने लगीं और सब महिलाएं इडली दोसा के लिए आशा को धन्यवाद देती चलीं गईं ! शायद सारी इडली और सारा दोसा आशा ने आस पास के पड़ोसिनों को बाँट दिया था ! परिणाम स्वरूप .....मैं पछताता रह गया कि दिन में तारीफ मैंने क्यों ना की ?
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका
