“मिथिला में पारंपरिक ढोल पीपही बाजा विलुप्त हो रहा है”
“मिथिला में पारंपरिक ढोल पीपही बाजा विलुप्त हो रहा है”
आदरणीय “StoryMirror ” मंच को प्रणाम के साथ एक लघु संस्मरण सादर समर्पित !
निष्कर्ष: यह संस्मरण 'विकास' की कीमत पर उठाए सवाल है। क्या हम तेज आवाज के बदले मधुर स्वर खो रहे हैं? सामूहिकता के बदले व्यक्तिवाद? सम्मान के बदले उपेक्षा? ढोल-पीपही सिर्फ बाजा नहीं था, वह मिथिला की आत्मा का नाद था। उसके विलुप्त होने का अर्थ है, एक सभ्यता का मौन हो जाना।
दिनाँक:-05 मई 2026
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“मिथिला में पारंपरिक ढोल पीपही बाजा विलुप्त हो रहा है”
(मिथिला संस्मरण)
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
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मुझे याद है, 70 के दशक यानी 1970 ई. तक विवाह, चतुर्थी, भरफोरी, मधुश्रावनी, कोजगरा, द्विरागमन, मुंडन, यज्ञोपवीत, जन्मोत्सव, पूजा-पाठ आदि मंगल कार्यों में मैथिली लोकगीत की परिपाटी थी! गाँव की महिलाएँ और उनके साथ नवयुवतियाँ प्रत्येक कार्य के लिए उपयुक्त गीतों का संग्रह रखकर उस अवसर पर मंगल गान करती थीं!
शांत परिवेश में संगीत, गीत-नाद होते थे! 1974 में मेरा विवाह हुआ! न तो बारात के साथ कोई गाजे-बाजे थे और न ही मेरे ससुराल में कोई गाजे-बाजे! मेरा स्वागत महिलाओं ने गीत-नाद से किया! गाँव में मोसोमात (विधवा) ललिता माय थीं! लोकगीत में पारंगत, विलक्षण स्वर, और लगता था कि साक्षात् सरस्वती इनके कंठ में बैठी हैं!
मैथिली लोकगीत में मुख्य रूप से निम्नलिखित विधाओं के गीत गाए जाते हैं: सोहर, विवाह गीत, मड़वा, हल्दी, लगन, सिंदूरदान, विदाई, समदाउन, बटगमनी, चुमाओन, गोसाउनिक गीत, भजन-कीर्तन, नचारी, डहकन। और अनेक विधाओं से महिलाएँ भरी रहती थीं! डहकन गाली गीत होता है! विवाह के बाद मुझे सुनने का अवसर मिला! गाली कोई और दे तो महाभारत हो जाए, परंतु यह गाली अटपटी-ऊटपटांग होते हुए भी ससुराल में मुझे अच्छी लगती थी! भोर में पराती गीत, पूजा के समय भगवती गीत, भोजन के समय डहकन गाली-गीत और साँझ में साँझ गीत महिलाएँ गाती थीं! मधुर स्वर, कर्णप्रिय लय, मैथिली साहित्य की सांस्कृतिक धरोहर इन गीतों में मिलती थी! मांगलिक कार्य जैसे जन्मोत्सव, मुंडन, यज्ञोपवीत, पूजा इत्यादि में गीत-नाद के साथ कहीं-कहीं ढोल पीपही बाजा बजता था! गाँव के लोग बजाते थे! इन मधुर मैथिली धुनों में मैथिली गीतों के पारंपरिक लोकगीत समाहित थे! गाँव के लोग और अतिथि-कुटुंब ढोल पीपही बजाने वालों को न्योछावर देते थे! चावल, दाल, आलू, प्याज, धोती, कुर्ता और गमछा दिए जाते थे! पारिश्रमिक मिलता था! सामाजिक सौहार्द का परिदृश्य देखा जा सकता था!
अब परिवर्तन के युग में सब विलीन हो रहा है! संगीत और गीत का स्थान डी.जे. ने ले लिया है! कान के पर्दे और हृदय की धड़कन तेज हो जाती हैं! डी.जे. की आवाज पर कुछ बात नहीं कर सकते! गीत-नाद अब यूट्यूब से सुनिए! 20 अप्रैल 2026 को मुझे भिट्टी मधुबनी से बारात जाने का सौभाग्य मिला! 19 तारीख को भिट्टी पहुँचा! चार दिन से डी.जे. चारों दिशाओं में फैला था! चल रहे थे रंग-बिरंगे गाने! कोई उधर से आया तो अपना पसंद का गीत लगा दिया, कोई आवाज बढ़ाने के लिए कनेठी देते हुए चला गया! दो और पड़ोस में विवाह थे! समझिए डी.जे. प्रतियोगिता हो गई! ध्वनि प्रदूषण के बीच 29 अप्रैल 2026 के दिन थोड़ी देर के लिए पारंपरिक ढोल पीपही बाजा बजाते तीन लोगों को देखा, परंतु वह कराह रहे थे और भरे नैनों से रो रहे थे! सच में “मिथिला में पारंपरिक ढोल पीपही बाजा विलुप्त हो रहा है!”
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका
झारखंड
