"ऐसी मित्रता से भगवान बचाए "
"ऐसी मित्रता से भगवान बचाए "
आदरणीय “ StoryMirror ” मंच को नमन के साथ एक लघु संस्मरण सादर समर्पित !
संदर्भ :--- यह कहानी डिजिटल दुनिया में रिश्तों की जटिलता, गोपनीयता के महत्व, और लोगों की अनुचित अपेक्षाओं पर एक मार्मिक टिप्पणी है। यह सिखाती है कि सोशल मीडिया पर भी हमें अपनी सीमाओं और दूसरों की सीमाओं का सम्मान करना चाहिए।
दिनाँक :--21 मार्च 2026
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“ऐसी मित्रता से भगवान बचाए”
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
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जैसे ही मैंने सुबह -सुबह लैपटाप खोला ,मेरे टाइमलाइन पर बड़े -बड़े लाल आवरण के बीच सफ़ेद अक्षरों में लिखा पाया ,-“आप अपना मोबाइल नंबर भेजिये!”
मैं आश्चर्यचकित रह गया ! बड़ा अटपटा लग रहा था ! भला टाइमलाइन पर इस तरह कोई लिखता है ? और सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह घातक भी सिद्ध हो सकता है ! चलो आपने लिख दिया, कोई बात नहीं ! इसको तो मेसेंजर पर भी आप लिख सकते थे और कॉल भी कर सकते थे ! और तो और आपके लिखने के अंदाज़ को देखकर लगता था कि आप आदेश दे रहे हैं ! बड़े हों या छोटे, विनम्रता और शिष्टाचार को कभी नहीं भूलना चाहिए !
खैर , ये उमाकांत बाबू थे ! ये मेरे फेसबुक से जुड़े थे ! अनुमानतः ये भी सेवानिवृत कहीं रह रहे होंगे ! फेसबुक में तो डिजिटल मित्र भरे पड़े रहते हैं ! कुछ जाने-पहचाने लोग होते हैं और अधिकांशतः एक दूसरे को जानते भी नहीं हैं ! रहते कुछ और हैं और प्रोफ़ाइल में कुछ और लिखा रहता है ! पारदर्शिता के अभाव में मित्रता अधूरी रहती है ! वैसे, मैं अपनी लेखनी के अंत में अपना पता लिखता हूँ !
चलो कोई बात नहीं ! मैंने अपना मोबाइल नंबर उनके मेसेंजर पर भेज दिया ! थोड़ी देर में मोबाइल की घंटी बजने लगी ! मैंने उठाकर “हैलो” किया ! दूसरी ओर से आवाज़ आयी,---
”डॉक्टर साहिब ?” –
“जी!”
“मैं उमाकांत बाबू बोल रहा हूँ !”
“प्रणाम”
उन्होंने मुझे आशीष दिया ! मैंने स्वीकार किया ! शिष्टता तो यह होती है कि जब हम लोग एक दूसरे को जब जानते नहीं ना पहचानते हैं तो प्रणाम का जवाब प्रणाम ही होता है ! फिर उन्होंने कहना प्रारम्भ किया ,-----
" आप तो दुमका में रहते हैं ?”
“जी !”
“आपके शहर में ग्रांट स्टेट है?”
“जी, है !”
उमाकांत बाबू ने कहा ,"वहाँ लाल पोखरा के पास सुधीर बाबू रहते हैं ! वे ठेकेदारी करते हैं ! उनके बेटे से मेरी लड़की की शादी लग रही है ! लड़का का नाम रंजन कुमार है ! वह हैदराबाद में सॉफ्टवेर इंजीनियर है ! आप उन लोगों के विषय में पता लगाकर मुझे सूचित करें और उन लोगों को आभास न हो ! बाँकी डिटेल्स मैं आपको व्हाट्सऐप पर भेज दूँगा !”
पहले काफी अटपटा सा लगा ! उन्हें यह अनुमान तक नहीं था कि मेरी उम्र क्या है ? आखिर भला अकेले इस कार्य का सम्पादन कैसे करेंगे ? मैं तो बस उन्हें फेसबुक के पन्नों में ही जानता था ! घर में सिर्फ मैं और मेरी पत्नी आशा रहतीं हैं ! दैनिक कार्य के बाद अपना क्लीनिक भी संभालता हूँ ! अपनी साहित्यिक गतिविधि ! समाचारों को पढ़ना और कुछ फिल्म को भी देखना मेरी आदत है !
देखें , उनके व्हाट्सऐप पर क्या आता है ? दूसरे दिन फिर वही बातें व्हात्सप्प पर आ गयी ,--
" लाल पोखरा के पास सुधीर बाबू रहते हैं ! वे ठेकेदारी करते हैं ! उनके बेटे से मेरी लड़की की शादी लग रही है ! लड़का का नाम रंजन कुमार है ! वह हैदराबाद में सॉफ्टवेर इंजीनियर है ! आप उन लोगों के विषय में पता लगाकर मुझे सूचित करें और उन लोगों को आभास न हो !”
कोई मोबाइल नंबर नहीं और ना घर का पता व्हाट्सऐप में दिया गया था ! फिर भी ग्रांट स्टेट में एक दो के मोबाइल नंबर थे ! उन लोगों को डायल करके पूछा ,पर कोई सटीक उत्तर मुझे नहीं मिला ! इतने बड़े ग्रांट स्टेट में सुधीर बाबू को ढूँढें तो ढूंढें कहाँ ?
एक रविवार को मैं स्वयं ढूँढने निकल पड़ा ! अपनी बाइक से लगातार दो घंटे हर गली, हर मुहल्ले में घूमता रहा ! पर मुझे पता नहीं लगा ! मेरे सारे बदन में दर्द हो गया ! घर लौटा तो आशा ने पूछा ,--
“इतना दिन निकल आया है और आप अभी तक कहाँ थे ?
मैंने कहा ,“खामखा फेसबुक की मित्रता में परेशान हो रहा था!”
सबसे पहले उन्हें अपने फेसबुक से ब्लॉक किया और उनके मोबाइल नंबर को भी ब्लॉक किया !
ऐसी मित्रता से भगवान बचाएँ!
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका
