“मेरे योग गुरु – 1957” (स्मृतियाँ)
“मेरे योग गुरु – 1957” (स्मृतियाँ)
आदरणीय “StoryMirror "मंच को सादर प्रणाम और यह लघु संस्मरण आप लोगों को समर्पित !
संदर्भ:----यह संस्मरण केवल एक व्यक्ति की स्मृति नहीं, बल्कि मैथिल संस्कृति, ग्राम्य जीवन और गुरु-शिष्य परंपरा का सजीव चित्र है।यह रचना 'माइक्रो-हिस्ट्री' है – एक व्यक्ति की स्मृति के माध्यम से पूरे समाज, काल और मूल्यबोध का इतिहास। इसमें न कोई उपदेश है, न दार्शनिकता का बोझ। केवल सहज अनुभूति है जो पाठक को भी अपने गाँव, अपने किसी 'महारुद्र झा' की याद दिला देती है।इसलिए यह केवल संस्मरण नहीं, सांस्कृतिक दस्तावेज़ है जो बताता है कि गुरु मिलने के लिए हिमालय नहीं जाना पड़ता। कभी-कभी वह घर के कोने में बनी व्यायामशाला में भी मिल जाता है।
दिनाँक:--- 22 अप्रैल 2026
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“मेरे योग गुरु – 1957” (स्मृतियाँ)
डॉ लक्ष्मण झा 'परिमल'
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सामान्य कथानक प्रायः सबके जीवन में घूमते रहते हैं। मनुष्य का जन्म किसी एक स्थान पर होता है और उसका लालन-पालन किसी अन्य स्थान पर होता है। आजीविका तथा संतानों की शिक्षा उन्हें भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में निवास करने को विवश कर देती है। किसी व्यक्ति का अंतिम स्थायित्व जीवन की परिस्थितियों पर ही निर्भर करता है। लोग अंततः कर्मस्थली का ही चयन करते हैं। वे उस भूखंड के अभिन्न अंग बन जाते हैं। परंतु वे अपनी पितृभूमि को कभी विस्मृत नहीं कर पाते। ग्राम, गृह और स्वजन स्मृतिपटल से कभी लुप्त नहीं होते। जब हम एकांत में बैठते हैं, तो ग्रामवासियों का स्नेह एवं वात्सल्य स्मरण हो आता है। नगर ग्राम के समान नहीं होता, जहाँ भाँति-भाँति के लोग मिलते हैं। किंतु ग्रामों में संबंधों और भावनाओं की अद्भुत एकता होती है। हम आदर के सूत्र से बँधे रहते हैं। हम उन्हें काकी, काका, भैया, भौजी, मामा, मामी इत्यादि संबोधनों से पुकारते हैं। नगर की अपेक्षा ग्राम में हमारे संबंध कहीं अधिक प्रगाढ़ होते हैं।
हमारा ग्राम है – गनौली, प्रखंड – अंधरा ठाढ़ी, जिला – मधुबनी, बिहार। मेरे पिताश्री ने अपना अधिकांश बाल्यकाल अपने ननिहाल ग्राम में व्यतीत किया। ग्राम परमानपुर, प्रखंड – विष्णुपुर नाथनगर, भागलपुर, अत्यंत लघु ग्राम था। मैथिल ब्राह्मणों की यह परंपरा रही है कि वे अपनी भगिनी एवं उनकी कन्या को ननिहाल में ही पुनर्वासित करते हैं। अतः मेरी माता तथा मेरे पिता को वहाँ गृह एवं कृषि योग्य भूमि प्रदान की गई।
मेरे पिता ने सन् 1925 में दुमका में प्राथमिक शिक्षक के रूप में कार्य आरम्भ किया। मेरा जन्म दुमका में 23 दिसंबर 1951 को हुआ। जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, मेरा स्नेह अपनी पितृभूमि गनौली की अपेक्षा परमानपुर से अधिक हो गया। मैं सोचने लगा कि यही मेरा ग्राम है, जैसे सबका होता है। मेरे पिता मुझे सदा वहाँ ले जाया करते थे। दुमका से वह 110 किलोमीटर दूर था। स्मरण है कि मैंने परमानपुर को प्रथम बार सन् 1957 में देखा था। मेरे पिता मुझे सर्वत्र ले गए और सबका परिचय कराया। मैंने ज्येष्ठजनों के चरणों में मस्तक झुकाकर उनका आशीर्वाद लिया। मेरे काका-काकी अपने पुत्र-पुत्रियों सहित वहीं निवास करते थे।
पंडित महारुद्र झा मेरे पिता से आयु में लघु थे। वे मल्लविद्या में पारंगत थे। अनेकों मित्र एवं संबंधी आम्रवाटिका में कुश्ती का अभ्यास किया करते थे। किंतु कालांतर में वह सब कुश्ती की कथा मात्र रह गई। उन सबने मल्लक्रीड़ा त्याग दिया। अब उस अखाड़े का उपयोग युवा पीढ़ी करती है। मुझे कुश्ती का कोई ज्ञान नहीं था। पंडित महारुद्र झा ने अपने गृह के एक कोने में व्यायामशाला स्थापित की थी। वयोवृद्ध होते हुए भी वे प्रातः तीन बजे कठोर व्यायाम करते थे। उनके तीन पुत्र थे – कृष्ण, शोभा और विजय। एक-एक करके वे व्यायाम करते और अखाड़े में जाते। प्रत्येक के पास एक-एक गाय थी। व्यायाम के उपरांत वे पृथक-पृथक अपनी गायों को दुहते और पर्याप्त दुग्धपान करते। मेरे मन में भी यह कला सीखने की अभिलाषा जगी, किंतु मेरे पास लंगोट नहीं थी। मैंने अपने काका से अपनी इच्छा व्यक्त की – “काका! मैं यह विद्या सीखना चाहता हूँ।”
“कोई समस्या नहीं, प्रातःकाल शीघ्र उठो, नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्यायामशाला में शारीरिक अभ्यास हेतु सम्मिलित हो जाओ।” – पंडित महारुद्र झा ने मुझे अनुमति प्रदान की। वे अत्यंत दयालु एवं अनुशासनप्रिय पुरुष थे। उन्होंने आगे निर्देश दिया, “लक्ष्मण! व्यायाम के पश्चात तुम मेरे पुत्रों के साथ यहीं दुग्धपान करोगे। तुम्हें यहीं सब कुछ प्राप्त होगा। अपने माता-पिता से कह देना कि तुम मेरी देखरेख में यहीं रहोगे।” भैरव अनेक वर्षों से यह कर रहा था। वह इस क्षेत्र में मुझसे ज्येष्ठ था। मैंने उससे बहुत कुछ सीखा। सन् 1957 में 'योग' न तो ज्ञात था और न ही प्रचलित था, परंतु पंडित महारुद्र झा ही मेरे वास्तविक योग गुरु थे। मैं उन्हें सादर नमन करता हूँ।
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डॉ लक्ष्मण झा 'परिमल'
दुमका
झारखंड
