"पीली धोती " शादी संस्मरण --1974
"पीली धोती " शादी संस्मरण --1974
आदरणीय “StoryMirror ”मंच को सादर प्रणाम के साथ एक संस्मरण समर्पित !
संदर्भ:-- यह संस्मरण केवल ‘क्या हुआ’ नहीं बताता, ‘कैसा लगा’ भी बताता है। इसलिए यह रेखाचित्र से ऊपर उठकर साहित्य बन जाता है। व्यक्तिगत घटना को कौशलता से बुनने का प्रयास किया गया है जो पूरे समाज का प्रतिनिधि आख्यान लगने लगती है।
अंत में कोई शिकायती स्वर नहीं है। एक स्वीकृति है। ‘पीली धोती’ पहनने का गौरव भी अपना, और उसे उतारने का सबक भी अपना। जीवन को उसकी समग्रता में ग्रहण करने का यह भाव ही संस्मरण को बड़ा बनाता है।
दिनाँक :---12 अप्रैल 2026
----------------------------(शादी संस्मरण — 1974)
डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल'
=====================
विवाह तो मेरा 28 जून 1974 को ही संपन्न हो चुका था। परन्तु मिथिला की कुल-परम्परा में विवाह के साथ ही गौना नहीं होता। वधू को अपने आँगन में लाने के लिए एक वर्ष, तीन वर्ष या पाँच वर्ष की प्रतीक्षा का विधान था। वह प्रतीक्षा द्विरागमन कहलाती थी।
सो, आशा को उसके मायके छोड़कर मैं लखनऊ लौट आया। विवाह हुआ, पर विदा नहीं। मैं दूल्हा था, पर अधूरा। ससुराल ने मुझे अभी सौंपा नहीं था।
विदा का शुभ मुहूर्त शरद पूर्णिमा की लक्ष्मी-पूजा, कोजागरा, से दो दिन पूर्व 27 अक्तूबर 1974 को निकला। उसी दिन मुझे वे विदा करेंगे। और उसके दो दिन बाद, 29 अक्तूबर को दुमका में कोजागरा का उत्सव होगा। वही मेरा पूर्ण गृहस्थ में प्रवेश।
मिथिला में विदा का अर्थ है दूल्हे को साज-सज्जा और उपहारों से सम्मानित करना। उन दिनों हर दूल्हे की आँखों में एक ही सपना तैरता था: कलाई पर HMT सिटीजन घड़ी, साथ में साइकिल या ट्रांजिस्टर। बाटा के नए जूते, सुंदर पोशाक, अँगूठी का चलन था। और यदि कुछ और चाहिए हो, तो दूल्हे को रूठने की मीठी भंगिमा अपनानी पड़ती थी।
27 अक्तूबर की रात आई। आँगन लीपा गया, रंगोली सजी। मेरे लिए पीढ़ा बिछा। धीरे धीरे गाँव की स्त्रियाँ जुटने लगीं। मंगल ध्वनि से आकाश भर उठा।
और तभी मुझे पीली धोती पहनाई गई। उसके साथ रंगीन कुर्ता और माथे पर मिथिला का गौरव, पाग। कलाई पर HMT सिटीजन घड़ी बाँधी गई। मैं क्षण भर को राजा हो उठा।
चुमाओन के गीत उठे:
“सुन गे सखिया आजु होई छैन रघुबर कें चुमान,
आँगन चानन नीपू कौशल्या सुनू गे सखिया”
पुरुषों ने हाथों में दूब, अक्षत और तिल लेकर दुर्वाक्षत मंत्र का उच्चार किया:
“ॐ आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्
आराष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्…”
मंत्र के बाद दही और चन्दन के तिलक से मेरा मस्तक अभिषिक्त हुआ। बड़ों ने सिर पर हाथ रखा, आशीष बरसे। स्त्रियाँ बारी बारी से चुमाओन करने लगीं। पेट्रोमैक्स की रोशनी जैसे जैसे धीमी पड़ी, वैसे वैसे चुमाओन का उल्लास भी शांत हुआ। रात गहरी हो गई।
28 अक्तूबर 1974। विदा का शुभ मुहूर्त।
पूरा गाँव उमड़ आया था। मन भीतर से भीग रहा था। मेरी आशा यहीं छूट रही थी। स्त्रियाँ फिर गाने लगीं। मुझे एक बार फिर पीली धोती पहनाई गई। वही रंगीन कुर्ता, वही मिथिला पाग।
सामान अपार था। एक आई.पी. बक्सा, एक बोरी भर मखाना, मिठाई की दो टोकरियाँ जिनमें खाजा और लड्डू ठसाठस भरे थे। मेरे साथ मेरे साले भूलन जी को भी चलना था। टमटम बुलाया गया। उसी पर सारा सामान लादकर हम मधुबनी रेलवे स्टेशन पहुँचे। आगे की यात्रा लंबी थी: मधुबनी से दरभंगा, दरभंगा से जसीडीह, और जसीडीह से दुमका।
ससुराल के बड़े-बुजुर्गों के चरण छुए। सबने कुछ न कुछ रुपये देकर आशीर्वाद दिया। गोड्लगाई में कुल 175 रुपये मिले।
पीली धोती, रंगीन कुर्ता और मिथिला पाग में सजा मैं मधुबनी से दरभंगा तक पहुँच गया। भूलन जी उम्र में मुझसे छोटे थे, पर गाँव की मेहनत ने उन्हें लोहे सा बना दिया था।
एक घंटे में दरभंगा आ गया। जसीडीह की ट्रेन में विलंब था।
दरभंगा स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर मैंने सोचा कि अब आगे की यात्रा साधारण वेश में करूँ। पीली धोती, कुर्ता और पाग उतारकर पैंट-शर्ट पहन ली। गोड्लगाई के 175 और मेरे अपने 200 रुपये, कुल मिलाकर टिकट लेकर बचे पैसे पर्स में रखे और पर्स पैंट की पिछली जेब में। एक कुली कर लिया।
मैंने भूलन जी से कहा, “मुजफ्फरपुर से हावड़ा जाने वाली ट्रेन आ रही है। इसी में चढ़ना है। तैयार रहो।”
ट्रेन आई। हम दौड़कर चढ़ने लगे। और उसी क्षण लगा कि कोई मेरी जेब हल्की कर गया। पर्स गायब। होश उड़ गया ।
टिकट उसी पर्स में थी। उतरना पड़ा। पीली धोती को प्लेटफॉर्म पर उतारने का परिणाम सामने था।
आर.पी.एफ. की सहायता मिली। किसी तरह भागलपुर पहुँचे। वह सम्पूर्ण क्रांति का दौर था। भागलपुर में आंदोलनकारी छात्रों का जत्था मिला। उन्हीं के साथ, उन्हीं के हौसले के साथ, मैं दुमका पहुँच गया।
आर.पी.एफ. और क्रांतिकारियों के संबल ने हमारी यात्रा को सफल बनाया।
वह पीली धोती आज भी स्मृति में बसी है। वह केवल वस्त्र नहीं था। वह मिथिला की मर्यादा थी, विदा का रंग था, और जीवन के एक अजीब मोड़ की साक्षी भी। उसे पहनकर मैं दूल्हा बना, और उसे उतारकर मैंने नियति का पाठ पढ़ा।
दुमका, झारखण्ड
