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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Inspirational

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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Inspirational

"मिथिला की मिठास "

"मिथिला की मिठास "

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आदरणीय “StoryMirror ”मंच को यह संस्मरण सादर समर्पित !

संदर्भ :-- दुमका जैसे विविधतापूर्ण शहर में पले-बढ़े होकर मिथिला का आकर्षण तो बनना ही है । और जब मौका मिला, तो वहाँ की भाषा, संस्कृति, और लोगों को इतने करीब से जाना कि दिल की मुराद पूरी हो गई !

दिनाँक :----10 02 2026 

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“मिथिला की मिठास”

डॉ लक्ष्मण झा परिमल

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संयोग की बात है कि मेरे पिता जी की शादी ग्राम : पिलखवाड़, जिला मधुबनी ,बिहार में हुई थी ! मेरी बड़ी बहन की  भी शादी उसी गाँव में हुई ! कुछ वर्षों के बाद मेरे बड़े भाई की भी वही शादी हुई और फिर मेरी छोटी बहन भी वहीं व्याही गई ! इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि मिथिला का यह गाँव प्रसिद्ध है ! सब लोग इसे जानते हैं !

याद है 1958 में मेरी बड़ी बहन की शादी हुई थी ! उस समय मैं सात साल का था ! दुमका में मेरा जन्म 1951 में हुआ था ! दुमका में कई भाषाएँ बोली जातीं हैं ! लोग हिन्दी के साथ- साथ बांग्ला बोलते हैं क्योंकि किसी समय में दुमका बंगाल में ही पड़ता था ! बहुत लोग भोजपुरी भी बोलते हैं ! आदिवासी लोग संथाली बोलते हैं ! यहाँ अंगिका भी बोली जाती है और पहाड़ में रहने वाले पहाड़ी जनजाति पहाड़िया भाषा का इस्तमाल करते हैं ! पर हमलोग तो अपने घर में मैथिली ही बोला करते हैं  !

उन दिनों बचपन में उपरोक्त भाषाओं का असर हो गया था ! विभिन्न भाषाओं के शब्द मेरे कानों में गूँजते थे और अपनी भाषा मैथिली  के साथ -साथ अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग अचानक हो जाया करता  था ! मेरे जीजा जी, जब भी बातें करते थे, मुझे काफी प्रिय लगते थे ! वे तो मिथिला की मिट्टी से जुड़े थे ! वहाँ के लोग जब मेरे घर आते थे तो उनकी भाषा में एक अलग ही मिठास होती थी ! मैं ध्यान पूर्वक सुनता था !

लाख कोशिशों के बावजूद भी मुझे अवसर ही नहीं मिलता था कि मैं अपने मिथिलांचल का दर्शन कर सकूँ ! मुझे मौका ही नहीं मिलता था ! आखिर दुमका से मधुबनी जाने में रात दिन लग जाते थे ! घर में मैं सबसे छोटा था ! जब भी मैं रोने लगता तो सब कहते ,--

” ठीक है, अगली बार तुम्हें मामा गाँव ले जाएंगे!”

इस तरह दो आने, चार आने देकर मुझे टाल दिया जाता था !

मार्च 1959 में जीजा जी की बहन की शादी थी ! वे मधुबनी से दुमका आए थे ! उन्होंने मेरे पिता जी को निमंत्रण दिया परंतु मेरे पिता जी असमर्थता व्यक्त करते हुये कहा ,-

“ मैं तो नहीं जा पाऊँगा ! आप मेरे राम और लक्ष्मण दोनों पुत्रों को ले जाइए ! ये दोनों पुत्र जाएंगे तो इनका मिथिला दर्शन हो जाएगा और ये दोनों कभी गए भी  नहीं हैं”

मैं खुशी से झूम उठा ! वर्षों से मेरी  चाहत थी ! गाँव देखना ,ट्रेन में सफर करना और वहाँ की स्थानीय भाषा को सीखना मेरा उद्देश था ! मुझे अपनी मैथिली भाषा बहुत प्रिय लगती थी !

हालांकि सफर में 24 घंटे लग गए ! मधुबनी उतर कर पैदल खेतों की पगडंडियों पर चलते- चलते आधे घंटे में गाँव पिलखवाड़ पहुँच गए !

वहाँ बुजुर्गों की बातें सुनता था ! महिलाएं आपस में बातें करतीं थीं उनके लहजों पर ध्यान देता था ! अधिकतर मेरे वहाँ कुछ ही दिनों में  बहुत सारे दोस्त बन गए थे ! उनके साथ खूब खेलता था ! कभी लंगड़ी कबड्डी ,हेदल गूढ,केंचा , डॉल पात और छुपम छुपाई खेला करते थे ! रोज सुबह खेतों के तरफ निकाल जाता था ! बीच खेत में चापा नल था ! अक्सर में वहाँ रुकता था और दातुन करता था ! पर मेरे रुकने का मक़सद सिर्फ वहाँ के लोगों की बातें सुनना !

भाषा की पकड़ तो अच्छी हो गई, पर वह लहजा वो मिठास और वो ओठ और जीभ को घूमाने की कला में उतने निपुण ना हो सके ! परंतु आज भी मैं मिथिलांचल जाता हूँ तो वहाँ के बच्चों के बीच अधिक बैठता हूँ , उनकी गति विधियों पर ध्यान देता हूँ और उनकी बातें ध्यान से सुनता हूँ ! सच पूछिए तो बच्चे ही हमारे शिक्षक होते हैं !

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डॉ लक्ष्मण झा परिमल


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