“गाँव की याद” (संस्मरण)
“गाँव की याद” (संस्मरण)
शहर में रहते हुये अपने गाँव की याद बहुत आती थी ! जब से होश संभाला अपने गाँव की धुँधली तस्वीर आँखों के सामने नाचने लगती थी ! बाबा ,माँ और परिवार के बड़े लोग जब कभी भी अपने गाँव की चर्चा करने लगते थे तो मैं भी उनलोगों के पास बैठ जाता था और वहाँ की बातें सुनता रहता था ! इतना तो मुझे पता हो गया था कि अब गाँव में मेरे बड़े काका ,काकी और दो भाई रहते हैं ! सुना था मैंने गाँव जाने में एक रात और एक दिन लग जाता था !दुमका से बस पकड़ कर जसीडीह जंक्शन जाना पड़ता था ! फिर ट्रेन पकड़ कर बरौनी जंक्शन ,बरौनी से दरभंगा दूसरी ट्रेन ,दरभंगा से मधुबनी तीसरी ट्रेन और फिर मधुबनी से 30 किलोमीटर कच्ची सड़क और अंत में हमारा गाँव गनौली ! इन झमेलों को देखते हुये मेरे बाबा कभी भी मुझे नहीं ले गए ! वे लोग सामाजिक अनुष्ठानों और यज्ञ परोजन में गाँव जाते थे !मैं उन दिनों बहुत रोता था और रोते -रोते अपने बाबा को कहता था ,---” बाबा ,मैं भी गनौली जाऊँगा ! आप सिर्फ राम को ही अपने साथ ले जाते हैं और मुझे दुमका में ही छोड़ जाते हैं ! ”“ ठीक है लक्ष्मण अगली बार तुम्हें ले जाऊंगा”—बाबा ने सांत्वना के साथ- साथ चार आने भी दे देते थे और मैं खुश हो जाता था !समय बीतता चला गया ! पर मुझे यह अवसर मिला ही नहीं कि अपने पैतृक गाँव का दर्शन कर सकूँ ! कॉलेज के बाद 1972 में मेरी सर्विस लग गई ! बस अपने गाँव की चाहत में मैंने बाबा को कहा ,---” बाबा मैं शादी करूंगा तो मिथिलाञ्चल में ही करूंगा !”1974 में मेरी शादी शिवीपट्टी मधुबनी में हुई ! और मधुबनी जिला में ही मेरा गाँव गनौली है ! 1975 में मैंने निश्चय किया कि मैं अपने मौलिक ग्राम का दर्शन अवश्य करूंगा ! मेरे मन में ख्याल आया कि मैं तो 23 सालों के बाद पहली दफ़े गनौली जा रहा हूँ ! मुझे तो कोई देखा नहीं है ना पहचानता है ! और तो और घर का लोकेशन भी मुझे मालूम नहीं था ! पर लगन थी !चाहत थी अपने गाँव देखने की !एक अच्छी सी साइकिल का जुगाड़ किया और सुबह सुबह चल पड़े मधुबनी ! मधुबनी आठ किलोमीटर था ! मधुबनी से मैं अपनी छोटी बहन के ससुराल पिलखवाड़ पहुँच गया ! वहाँ एक रात मैं रुक भी गया ! बातों ही बातों में मैंने गाँव वालों से पूछ लिया ,--" यहाँ से गनौली मैं कैसे जा सकता हूँ ?”लोगों ने बताया ,--” यहाँ से दो तीन गाँव के बाद आपको एक कमला-बलान नदी मिलेगी ! उसे पार करना होगा ! पानी बहुत कम होगा ! उसके बाद तीन चार गाँव और आएंगे ! फिर आप गनौली पहुँच जाएंगे !”पता लग गया यह मुसकिल भरा सफर है ! पर मैंने निश्चय कर लिया था ! और देखिये संयोग उन्हीं में से एक बिलट ने कहा ,--" लक्ष्मण बाबू ! आप घबडाइए मत ! मैं आपके साथ चलूँगा ! गनौली मेरा मामा गाँव है ! इसी बहाने मैं भी मामा गाँव हो आऊँगा !”यह सुंदर संयोग था ! सुबह -सुबह हम दोनों अपनी -अपनी साइकिल पर सवार हो कर चल दिये ! बलाट और राघोपुर दो गाँव टपने के बाद एक नदी मिल गयी ! इस नदी को कमला के अलावा बलान और सोनी नदियों का भी संगम (त्रिवेणी संगम) माना जाता है ! पर संयोग तो देखिये ! यह नदी बिलकुल ही सूखी पडी थी ! थोड़ा – थोड़ा पानी बह रहा था ! बिलट और मैंने अपने-अपने कंधों पर साइकिल उठा ली और नदी पार कर ली !बिलट राश्ते के सारे गाँवों को जानते थे ! राश्ते में जो- जो गाँव आते थे ,उनका नाम मुझे बताते जाते थे ! सारे गाँव एक जैसे ही लगते थे ! चारों तरफ हरियाली ही हरियाली ! लोगों से राहों में बातें भी होती थीं ! अपनापन लगता था !11 बजे अपने गाँव की धरती पर मैंने अपना पैर रखा ! पहले अपने गाँव की धरती को झुककर प्रणाम किया ! अपना परिचय और काका का जब लोगों को नाम बताया तो सबने कहा ,--" सीधे पुस्तकालय के पास चले जाइए! उसी के बगल में श्री देवकृष्ण झा जी का घर है !”बिलट दिशा निर्देश देकर अपने मामा के घर चले गए ! और मैं पैतृक घर पहुँच गया ! सब लोग नाम से परिचित थे ! मुझे भी किसी ने आज तक नहीं देखा था ! बड़ी खुशी हुयी मुझे देखकर ! अगल- बगल लोगों को भी मेरा परिचय उनलोगों ने दिया ! दिनभर काकी , दोनों भाइयों और भाभियों से बातें होती गयीं ! दिनभर मैंने गाँव की गलियों को भी देखा ,खेत खलिहान को भी देखा और आम के बगीचे का भी निरीक्षण किया !रात के खाने के बाद छोटे भाई ने मुझसे पूछा ,---” भाईजी , गाँव के पाठशाला में रामलीला हो रही है ! क्या आप देखने चलेंगे ?”“हाँ ...... हाँ क्यों नहीं ?” मैंने अपनी स्वीकृति दे दी ! अपनी -अपनी बोरी लेकर पहुँच गए रामलीला देखने! जमीन पर सबलोग बैठे हुये थे! पास के एक दो लोगों से मेरा परिचय हुआ !रामलीला के कलाकार अगल बगल गाँवों के ही थे ! आज सुंदरकांड होने बाला था ! सरस्वती वंदना से रामलीला प्रारम्भ हुयी ! बीच में मध्यांतर हुआ करता था ! उस समय गाँव के स्थानीय लोग मध्यांतर में अपना गायन ,चुटकुला और अपनी कलाओं का प्रदर्शन करते थे ! मेरे छोटे भाई ने मुझसे पूछा ,--” भाई जी आप भी अपना कोई प्रोग्राम देना चाहते हैं? .... कहिए तो आपका नाम भी दे दूँ ?”गाने -बजाने का शौक तो मुझे पहले से ही था ! मेरी भी इच्छा हो रही थी !“ ठीक है , मेरा नाम दे दो मैं भी एक गीत गाऊँगा !”मध्यांतर में मेरे नाम की उद्घोषणा हुई और मैं स्टेज पर पहुँच अपना परिचय दिया,----” मैं इस पावन धरती को प्रणाम करता हूँ और सभी ग्रामवासियों को मेरा अभिनंदन! मैं इसी गाँव का रहने वाला हूँ पर आजकल दुमका में मैं रह रहा हूँ ! पहली बार अपने गाँव आया हूँ !”एक गीत मैथिली में “चंद्रमा उतरल गगन सं, चाँदनी कें सजाऊ यो” मैंने गया ! लोगों को अच्छा लगा ! तालियों की गड़गड़ाहट से मेरा स्वागत हुआ ! और अगले दिन गाँव के लोग मुझसे मिलने भी आ गए और मुझे आशीर्वाद दिया !गाँव की याद को लेकर मैं बिलट के साथ लौट गया ! पर आज तक इस यात्रा को मैं अपने यादों के पन्नों में सँजोये रखा हूँ !==========================डॉ लक्ष्मण झा परिमलदुमका ३० जनवरी २०२६
