" धुँधलाते रिश्ते "
" धुँधलाते रिश्ते "
कुछ नए रिश्ते बनते हैं ! उन रिश्तों के बिना जीवन सूना – सूना लगने लगता है ! यादों के झरोखों से उन बीते लम्हों को याद करते हैं ! अभी तक उनका प्यार ,अपनापन ,स्नेह ,सत्कार और आदर की धुँधली तस्वीर आँखों के सामने आती जाती रहती है और मैं सोचता हूँ काश ! वो दिन फिर आ जाय !
मेरी पोस्टिंग मार्च 1978 में सैनिक चिकित्सालय झाँसी (यू पी ) में हो गयी ! मुझे नौ महीने के लिए यहाँ प्रशिक्षण करना था ! यह प्रशिक्षण तकनीकी था ! कुल हमलोग आठ प्रशिक्षणार्थी थे ! देश के विभिन्य सैनिक चिकित्सालय से आए थे ! हम सब प्रारम्भ से ही मित्र थे ! पर जब कोई प्रशिक्षण होता था तो हमलोगों का पुनर्मिलन हो जाता था !
हमलोग सिंगल पर्सनल लाइन, जिसे सैनिक आवास कहते हैं , वही रहते थे ! हमलोगों का वहीं सटा एक मेस होता था ! और सैनिक आवास के बगल में लंबा -चौड़ा पी टी ग्राउंड था ! सारा अस्पताल दो किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ था ! सुरक्षा के दृष्टिकोण से अस्पताल दीवारों से चारों तरफ घिरा हुआ था !
काफी अच्छा लग रहा था ! बहुत से नए -नए लोगों से मिलते रहे ! सबों से परिचय होने लगा ! पी टी एक साथ करते थे ! ब्रेकफ़ास्ट एक साथ होता था ! हमलोग करीब चार सौ सैनिक वहाँ रहते थे ! 7 30 में सब के सब अपनी -अपनी ड्यूटि के लिए एक साथ निकलते थे ! शाम को गेम होता था ! शाम के खाने के बाद बहुत से लोग एडुकेशन हाल में पहुँच कर समाचार पत्र पढ़ते थे !
एडुकेशन हाल इनचार्ज आर्मी एडुकेशन कॉर्पस के नवीन चौबे जी थे उनको लोग मास्टर जी कहा करते थे ! उनसे भी परिचय हो गया ! दोस्त सब बनते चले गए ! एक दिन मास्टर साहिब ने मुझे कहा ,
-----“झा जी , केंट के केन्द्रीय विद्यालय में उप -प्राचार्य शांतिधर झा जी हैं ! मैं उनसे शिक्षा संबंधी बातों के लिए यदा -कदा मिलता रहता हूँ ! बहुत योग्य और मिलनसार हैं !”
झा जी का नाम सुनते मेरी जिज्ञासा बड़ गई ! मैंने पूछा ,-- “कहाँ रहते हैं ?”
“ ये पीछे वाली गेट जो पीरबाबा जाने के लिए है ! ये सारे ऑफिसर क्वार्टर हैं ! उन्हीं क्वार्टर में वे भी रहते हैं ! साथ ही साथ केन्द्रीय विद्यालय भी वहीं पर है ! आप उनसे रविवार को मिल सकते हैं !”
अब मेरे दिल में बात बैठ गई ! मिलने की चाहत जग गई ! उन्हें मैं जानता नहीं था ! बस घर से दूर रहकर यदि कोई करीब के लोग परदेश में मिल जाते हैं तो समय अच्छा बीत जाता है ! रविवार का दिन था ! हॉस्पिटल के वेट कैंटीन से मैंने मिल्क केक लिया ! अच्छे तरह से पैक करबाया और वापस लौटते हुये सैनिक आवास के बगल के गेट से निकल कर बारी -बारी से ऑफिसर क्वार्टर को देखने लगा ! बाएँ दाहिने दोनों तरफ मेरी निगाहें थीं ! अंत में उनका आवास मिल गया !
बड़ा शानदार ऑफिसर क्वार्टर था ! और उसके सामने क्वार्टर का सुंदर गार्डेन ! पहले मैंने नेम प्लेट पढ़ा -उसमें लिखा था “ श्री शांतिधर झा ,उप-प्राचार्य केन्द्रीय विद्यालय ,झाँसी केंट” !मैंने डोर बेल को दबाया ! अंदर में बहुत सारे बच्चों की बोलने की आवाज़ आ रही थी ! कुछ ही क्षण में एक व्यक्ति धोती और कुर्ता पहने बाहर निकले ! माथे पर चन्दन और सिंदूर का एक तिलक भी किया था ! शायद पूजा करके निकले थे ! मुझे समझने में थोड़ा भी देर नहीं हुआ कि ये ही श्री शांतिधर झा ,उप-प्राचार्य हैं !
मैंने उन्हें पैर छूकर प्रणाम किया ! उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और बैठने को कहा ! मैंने अपना परिचय दिया ,--
“मेरा नाम लक्ष्मण झा है ! मैं इसी सैनिक अस्पताल में प्रशिक्षण के लिए आया हूँ ! मैं फिलहाल दुमका में रहता हूँ !”
हमारी बातें अपनी मातृभाषा मैथिली में हो रही थी !
“ अच्छी बात है ! मूलतः आप रहने वाले कहाँ के हैं ?”
फिर मैंने कहा ,-----” मूलतः मैं ग्राम: गनौली, प्रखण्ड: अन्हरा ज़िला: मधुबनी बिहार !
प्रिन्सिपल साहिब कुछ चौंके और मुझसे पूछा,--” गनौली किनके घर ?”
मैंने अपने चाचा का नाम और चचेरे भाइयों का नाम कहा ! वे आश्चर्यचकित हुये ! प्रिन्सिपल साहिब की शादी मेरे ही गाँव में और मेरे संबंधी रामचंद्रा बाबू के बहन से हुयी थी !
दरअसल मैं अधिकांशतः दुमका रहता हूँ ! कभी कभी काज उद्यम में गनौली जाता हूँ !
फिर उन्होंने अपनी पत्नी को आवाज़ लगाई ,--“ ममता ! इधर आइए ..... इधर आइए ,देखिये आपके गाँव के आपके भाई आए हैं !”
उनकी पत्नी आयीं ! मैंने उनका चरण स्पर्श करके प्रणाम किया ! बच्चे भी एक- एक करके सामने आने लगे ! अमिता ,सुनीता,विनीता,सरिता,सारिका और गोद में प्रिया छह छोटी -लड़कियाँ आकर सभी ने बारी -बारी से मेरा चरण स्पर्श किया ! मेरा उनलोगों ने जमकर आतिथ्य किया ! अपने घर से दूर रहने के बावजूद भी अकेलापन छूमंतर हो गया !
हमलोग बहनोई को उनके टाइटल से सम्बोधन करते हैं ! प्रिन्सिपल साहिब को “ओझा जी” कहने लगे ! बहन को हमलोग “दीदी”कहते हैं ! और छह भंजियाँ मुझे मामा कहने लगे ! मानो मैं उनके परिवार का हिस्सा बन गया ! मुझे यह पता भी नहीं लगा कि मेरे नौ महीने कैसे बीत गए ? मेरी पोस्टिंग सैनिक चिकित्सालय गया ,बिहार हो गयी ! विदा होने के समय आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे ! कलेजा मुँह को आ रहा था ! सब लोग रोने लगे !
गया आने के बाद उनलोगों की याद आती रही ! चिट्ठियाँ आतीं रहीं ! कुछ वर्षों के बाद चिट्ठियाँ बंद हो गई ! कुछ सालों के बाद पता लगा प्रिन्सिपल साहिब सेवानिवृत होकर कहीं राजस्थान में अपनी बेटी के साथ रहने लगे ! एक दो बार गाँव जाकर भी पता किया पर लोगों ने कहा “वह अब अपनी बेटी के साथ रहते हैं ! उनकी पत्नी का देहांत हो गया है ! लड़कियों की शादी सब की हो गयी होगी और अपनी -अपनी ससुराल चलीं गईं होंगी ! इतने अंतराल के बाद तो दुनियाँ ही बदल जाती हैं ! अब सिर्फ उनकी यादें रह गईं है और उनके “धुँधलाते रिश्ते”…………………..!
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका २७। जनवरी २०२६
