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Diwa Shanker Saraswat

Romance Classics

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Diwa Shanker Saraswat

Romance Classics

पुनर्मिलन भाग २४

पुनर्मिलन भाग २४

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 वृंदावन से बहुत दूर वर्तमान दिल्ली क्षेत्र जो खांडव नामक घने वनों का समुदाय था, न जाने कितने भयंकर जीव उस वन में शरण पा रहे थे। अथवा सत्य कुछ और गहन था। वन के दुर्गम स्थलों में आपराधिक प्रवृत्ति के लोग निवास करते थे। समाज के लिये घातक वे पिशाच, दानव और सर्पों के नाम से जाने जाते थे। जहाँ कोई भी मनुष्य प्रवेश के बाद बाहर निकल ही नहीं पाता था । वे अपनी संपत्ति लुटबाने के साथ साथ अपने प्राण भी गंवा देते थे। ऐसे आतताइयों की शरण स्थली रहा वह वन एक दिन नष्ट कर दिया गया। जिस वन की तरफ जाने का साहस भी कोई नहीं कर सकता था, उस वन को अग्नि देव को अर्पित कर दिया गया। उस वन से बाहर निकलने की चेष्टा कर रहे उन आतताइयों का समूल संहार कर दिया गया। ऐसे असंभव को संभव बनाने बाला और भला कौन हो सकता है। बचपन से ही अनेकों असंभव को संभव बनाते रहे, असुरों को ही नहीं अपितु देवराज इंद्र को भी पराजित करने बाले, स्वयं ईश्वर के अवतार रहे श्री कृष्ण के अतिरिक्त भला ऐसा कौन पराक्रमी है जो ऐसा कर सकता है। हालांकि अब श्री कृष्ण के कार्य का तरीका कुछ बदल चुका था। बचपन से ही अपने सखाओं को विशेष मान देते आये अब श्री कृष्ण ने अपनी उपलब्धियों का पूरा मान अपने सखा अर्जुन को देना आरंभ कर दिया था। खुद सब करने के बाद भी श्री कृष्ण का यह प्रदर्शन करना कि उन्होंने कुछ भी नहीं किया है, सब कुछ अर्जुन ने ही तो किया है, यह श्री कृष्ण की विनम्रता नहीं अपितु उससे बहुत आगे उनकी भक्तबत्सलता थी।

 कुछ मनुष्य गलत हो सकते हैं। कोई भी जाति, धर्म या किसी मान्यता के समर्थक सभी लोग गलत नहीं हो सकते। असुर कुल में भक्त प्रह्लाद का भी जन्म हुआ था। रावण के अनुज विभीषण भगवान श्री राम के परम भक्त थे। संहार के समय पूरी सावधानी रखी गयी कि केवल समाज के घातक लोगों का ही संहार किया जाये। उस समय रावण पत्नी मंदोदरी के पिता मय दानव को भी श्री कृष्ण और अर्जुन ने दुष्टों की कैद से आजाद कराया।

 कालांतर में पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, महामंत्री विदुर के परामर्श से पांडवों ने उसी वनीय क्षेत्र में अपनी राजधानी इंद्रप्रस्थ बना ली। कोरवों और पांडवों के मध्य टकराव रोकने के लिये पांडवों ने उस घनघोर वन्य क्षेत्र को ही एक भव्य नगर में बदल दिया जहाँ आज भारत देश की राजधानी है।

 इंद्रप्रस्थ का निर्माण और उसमें श्री कृष्ण का सहयोग हमारी कथा का मुख्य विषय नहीं है। कथा का विषय तो उन्हीं ब्रजबालाओं का पवित्र प्रेम है जिसकी एक छोटी सी धार इसी इंद्रप्रस्थ नगर की कहानी से निकलती है।

 वह सुबह कुछ अलग ही सुहानी थी। जब श्री कृष्ण अपने मित्र अर्जुन के कहने पर उनके साथ इंद्रप्रस्थ के निकट से बहतीं यमुना नदी के किनारे भ्रमण के लिये चले। यमुना को देखते ही उन्हें ब्रज की स्मृति आ गयी। यों तो श्री कृष्ण और गोपियों का नित्य मानस मिलन होता था। फिर भी विरह तो विरह है। प्रेमी के मानस से अपनी जगह छोड़ता नहीं है।

 अर्जुन प्राकृतिक सौंदर्य में खुद को भूले थे तो श्री कृष्ण उन स्मृतियों में। यही यमुना थीं जिनके किनारे वह अपनी प्रेमिकाओं से मिलते थे। वहां अलग अलग तरह की लीलाएं करते थे। कभी रास के द्वारा एक दूसरे के अंतःकरण में उतरते थे। कभी मान लीला करते थे। फागुन का महीना जबकि शीत लहर कम होती, यमुना का तट हमारी होली का साक्ष्य बनता। सचमुच वह दिव्य प्रेम का समय था। कहने को उस समय मैं मात्र एक गोप था, गायों की देखभाल करता था, फिर भी उस समय मैं प्रेम का धनी था। आज जबकि द्वारिका की सत्ता मेरी इच्छा का अनुसरण करती है, कितनी ही सुंदर और गुणवती राजकुमारियां मेरी पत्नी हैं,फिर भी आज मैं खुद को एकदम अकिंचन अनुभव करता हूं। ऐसा नहीं कि जो राजकुमारियां मेरी पत्नी बनी हैं, वे मुझसे प्रेम नहीं करतीं। अथवा मैं उनसे प्रेम नहीं करता। मेरी सबसे बड़ी रानी रुक्मिणी ने तो मुझे खुद पत्र लिखकर अपना प्रेम प्रदर्शित किया था। जामबंती, सत्यभामा, मित्रवृंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा, इनमें से सभी तो मुझसे अपार प्रेम करती हैं। उनके आंतरिक प्रेम को पहचान ही मैंने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया है। फिर भी लगता है कि अब मैं उस पवित्र और निस्वार्थ प्रेम से बहुत दूर हूँ जहाँ प्रेम का अर्थ केवल देना और देना ही था। सचमुच आज नरेश होकर भी कृष्ण अकिंचन ही तो है।

 अर्जुन विभिन्न तरह की हास्य वार्तालाप कर रहे थे। श्री कृष्ण भी उनका प्रतिउत्तर दे रहे थे। फिर भी श्री कृष्ण के वार्तालाप में वह रसिकता न थी। यमुना तट का पवित्र वातावरण उन्हें वृंदावन की स्मृति करा रहा था। प्रयास कर भी वह खुद को संयमित नहीं कर पा रहे थे। कर्तव्यों का एक विशाल पथ सामने था। अवतार का उद्देश्य पूर्ण करना शेष था। जानते थे कि एक बार भी उस प्रेम जगत में प्रवेश के बाद उनका वापस आना संभव न होगा। इसीलिये ब्रज से आगमन के बाद एक दिन के लिये भी वहां घूमने भी नहीं गये। जबकि बड़े भाई बलराम जी वहां जाकर वापस भी आ चुके थे। आज यमुना के तट पर उन्हें वृंदावन पुकारता सा लगता। शोकदग्ध राधा तथा अन्य गोपियां मिलन की आश में बिलपती जान पड़तीं। खुद को रोक पाना असंभव सा लग रहा था। विश्व को सहारा देते आये को कहीं सहारा नहीं मिल रहा था। उसी समय कोई था जो श्री कृष्ण को सहारा देने के लिये आगे बढ रहा था। श्री कृष्ण और गोपियों की प्रेम लीलाओं का एक साक्षी का श्री कृष्ण के जीवन में आगमन होने का अवसर आ पहुंचा।

क्रमशः अगले भाग में 


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