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Shailaja Bhattad

Abstract Children Stories Inspirational

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Shailaja Bhattad

Abstract Children Stories Inspirational

प्रकृति की पीड़ा

प्रकृति की पीड़ा

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"बस बहुत हुआ; अब और नहीं। पवन देव शीघ्र आइए; जैसे ही इंसान जंगल में प्रवेश करें; तेज आंधियाँ चलाइए; ताकि इन शातिरों के मंसूबे नाकाम हो जाए; इनका अंदर आना तो दूर, दूर से ही घबराकर भाग जाएँ।" वृक्षों ने मनुष्यों को अपने साथ उन्हें काटने के औजार लाते देख, बेचैनी से पवन देव को आवाज दी। "मैं आज तो आंधी चला दूँगा; लेकिन क्या इसके बाद आपको लगता है? ये चुप बैठेंगे।" "हाँ, सही कहा। चुप तो नहीं बैठेंगे; बहुत शातिर हैं ये, एक के बाद एक कई हथकंडे अपनाएँगे; ताकि जंगलों का नामोनिशान मिटा दे; लेकिन हमने भी कोई चूड़ियाँ नहीं पहन रखी है। ईट का जवाब पत्थर से देंगे।" बूढ़े बरगद ने व्यग्रता से कहा।
 "कैसे?" "सुनिए मेरी बात ध्यान से, आज औजार लाए हैं, बार-बार लाएँगे आप बार-बार आँधी लाइए।"
 "ठीक है ऐसा ही होगा; लेकिन अगर आग लाए तो?" "बहुत सही बात पकड़ी है आपने; मैं इस पर ही आ रहा था।" बूढ़ा बरगद बोला।
 "आप समुद्र देव, बादलों व सूर्य देव को ऐसी परिस्थिती के लिए तैयार रहने के लिए निवेदन कीजिए; ताकि वे वर्षा रानी को अविलंब भेज सके।" "अवश्य, मैं अतिशीघ्र जाकर यह सूचना सब तक पहुँचाता हूँ।" पवन देव ने आश्वस्त किया।
 "इंसानों को भी पता चलना चाहिए; प्रकृति ने उन्हें बनाया है उन्होंने प्रकृति को नहीं।" सभी वृक्षों ने एक स्वर में कहा।
 "इसीलिए आज भी हम अपनी रक्षा इन्हीं मनुष्यों से इनको नुकसान पहुँचाए बिना ही कर रहे हैं; क्योंकि हम सृजनकर्ता हैंI" पवन देव ने कहा।
 "सही कहा; लेकिन ये मान बैठे हैं; कि इनकी उन्नति हमें नुकसान पहुँचाए बिना हो ही नहीं सकती है; इसीलिए अब इनका यह भ्रम तोड़ने का समय आ गया है।"
"अतिशीघ्र।" पवन देव ने आत्मविश्वास से कहा।


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