Nisha Singh

Inspirational


3.6  

Nisha Singh

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पोस्ट ऑफ़िस वाले दादाजी

पोस्ट ऑफ़िस वाले दादाजी

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लो आज फिर से लेट हो गई। 10:30 बजे की क्लास है और 9 तो यहीं बज गये। जल्दी से नहा धो कर बिना नाश्ता किये मैं अपने कॉलेज की तरफ़ चल पड़ी। गली के कोने पर बने सफ़ेद रंग के मकान तक पहुँचते ही मेरे कदम खुद ब खुद रुक गये। घर के दरवाज़े के पास जा कर मैंने 2-4 संस्कृत के श्लोक सुने और फिर अपने रास्ते आगे बढ़ गई। ये मेरा रोज़ का काम है। चाहे कितनी भी देर क्यों ना हो रही हो मैं कुछ श्लोक सुन कर ज़रूर जाती हूँ। मतलब कभी समझ नहीं आता है पर एक अलग ही शांति का एहसास होता है इन श्लोकों को सुनकर।

बी.टेक. थर्ड यीअर की स्टुडेंट हूँ। नाम है वैदेही। और जिस मकान के पास जा कर मैं श्लोक सुन रही थी वो मकान है हमारे मोहल्ले के एक दादाजी का। नाम तो आजतक नहीं पता बस इतना पता है कि वो एक पोस्ट ऑफ़िस में काम करते थे। इसी वजह से सब उन्हें पोस्ट ऑफ़िस वाले दादाजी कहते है। और मैं भी। ये दादाजी मोहल्ले के बाकी बुड्ढों मेरा मतलब बुज़ुर्गों से काफ़ी अलग हैं। ना किसी को रोकते टोकते हैं, ना किसी की बेमेतलब चुगली करते हैं, ना दूसरों की ज़िंदगी में बेमतलब दखल देते हैं और सबसे अच्छी बात हमारी जेनेरेशन को कभी नहीं कोसते। हमेशा खुश मिज़ाज़ रहने वाले दादाजी ज्यादातर बरामदे में बैठे कुछ ना कुछ पढ़ते हुए ही मिलते हैं।

“नमस्ते दादाजी” कहते हुए मैं सामने पड़ी चेयर पर बैठ गई।

आज मम्मी ने मूंग दाल का हलवा बनाया था। दादाजी को बहुत पसंद है। वही देने आई थी। पर दादाजी अभी भी किसी मोटी सी बड़ी सी किताब को पढ़ने मे व्यस्त थे।

“दादाजी...” मैंने फ़िर टोका। मुझे लगा कि दादाजी किताब में खो गये हैं और उन्होंने इस बात पर ध्यान ही नहीं दे पाया कि मैं उनके सामने बैठी हूँ।

मेरी बात के जवाब में उन्होंने आशीर्वाद देने के लहज़े मे हाथ उठा कर रुकने का इशारा कर दिया।

“हाँ बेटी अब बोलो...” किताब एक तरफ रखते हुए दादाजी ने कहा।

“क्या दादाजी आप तो हमेशा पढ़ते ही रहते हैं।” हलवे का टिफिन देते हुए मैंने कहा।

“अच्छा...” दादाजी ने हंसते हुए कहा।

“दादाजी एक बात बताइये, आप सुबह सुबह क्या पढ़ते है?”

“रामायण... क्यूँ?”

“सुन के बहुत अच्छा लगता है।”

“तो तुम भी पढ़ा करो।”

“मैं क्या करूंगी पढ़ के? वैसे भी मैं ये देवी देवताओं की बातों को लेकर बहुत कंफ़्यूज़ रहती हूँ।”

“और वो कैसे?”

“अब देखिये ना दादाजी... रावण शिवजी का कितना बड़ा भक्त था लेकिन फिर भी शिवजी ने हनुमान बन कर भगवान राम की मदद की। ये क्या बात हुई?”

“हम्म... तुम ये तो जानती हो कि रावण बहुत बड़ा शिव भक्त था पर तुम ये नहीं जानतीं कि उसने शिवजी के एक अंश की अवेहलना भी की थी।”

“कैसे?”

“रावण ने भगवान शिव को 10 बार शीश अर्पण कर उनकी पूजा की लेकिन शिवजी तो 11 रूपों में रहते है। 11वें अंश को उसने छोड़ दिया। उसी 11वें रूप ने आगे चल कर हनुमान का रूप लिया।“

“अच्छा... एक बात बताइये भगवान शिव को बंदर बनने की क्या सूझी? इंसान बन के भी तो प्रभु श्री राम की सेवा कर सकते थे।”

“कर तो सकते थे लेकिन फिर अपने भक्त का मान कैसे रख पाते?”

“कौन से भक्त का मान?”

“नंदी महाराज का। एक बार रावण और नंदी महाराज की लड़ाई हो गई थी। वो शिवजी से मिलना चाहता था और नंदी महाराज पहरे पर थे। रावण से हुई उस लड़ाई में रावण ने नंदी महाराज का वानर कह कर अपमान किया था। इस पर नंदी महराज ने उसे शाप दिया कि एक वानर ही उसके विनाश का कारण बनेगा। बस अपने भक्त के लिए भोले शंकर वानर बन गये।”

“तो फिर अशोक वाटिका उजाड़ने की क्या ज़रूरत थी?”

“ये उनकी चाल थी। लंका का किला बहुत मज़बूत बना था। जीतने के लिये किले का नष्ट होना बहुत ज़रूरी था। उनकी इस हरकत से राक्षस चिढ़ गये। और उनकी पूंछ मे आग लगा दी फिर तो जो हुआ सब जानते ही हैं।”

“ये सब टी.वी में तो नहीं दिखाया। आपको कैसे पता चला?”

“पढ़ के... मैं रोज़ रामायण पढ़ता हूँ।” दादाजी ने हंसते हुए जवाब दिया।

इंटरनेट से बढ़ती करीबी ने हमें किताबों से दूर कर दिया। किताबें क्या दूर हुईं बहुत कुछ दूर हो गया। किताबें पढ़ने के फायदे तो नेट पर कई बार पढ़े पर अमल में कभी नहीं ला पाई। कहते सुनते ही रहते हैं कि किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। पर इनसे दोस्ती कर कितने पाते हैं? फेसबुक और व्हाट्स एप्प से फ़ुर्सत मिले तब ना...


सुबह के 8 बजे हैं। ठंडी हवा के झोंके मन को भी ठंडक पहुचा रहे हैं। आज सिर्फ़ श्लोक ही नहीं उनके अर्थ भी सुनाई दे रहे हैं। मन पूरी तरह से शांत है। कहीं जाने की जल्दी नहीं है। आज मैं दादाजी के सामने बैठी रामायण सुन रही हूँ। रामायण के बीच में कभी कभी अपने हाथ पर लिखे उस किताब के नाम को देख लेती हूँ जो मुझे कॉलेज लाइब्रेरी से आज निकाल कर लानी है।

  



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