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SANGEETA SINGH

Classics

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SANGEETA SINGH

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पंडितराज लवंगी एक प्रेम कथा

पंडितराज लवंगी एक प्रेम कथा

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बात 1628 से 1641 के बीच की है,जब हिंदुस्तान पर मुगलों का साम्राज्य था ,और उस समय दिल्ली तख्त पर बादशाह शाहजहां आसीन थे।उनके शासनकाल में पंडितराज जगन्नाथ शास्त्री और लवंगी की प्रेम कहानी फली फूली और अपने अंजाम तक पहुंची।"नयाचे गजालीं नवा बाजिराजिं न वितेषु चितम मदियम् कदाअपि ।

इयम सुस्तनि मस्त कन्यस्तकुम्भा लवंगी कुरंगी दृगगंगी करोतु ।।"

ये क्या? पूरा दरबार स्तब्ध था,ये क्या मांग दिया इस अदने से राजकवि ने। शहंशाह शाहजहां खामोश रहे ,उन्होंने वचन जो दिया था कुछ भी मांगने का ,इसने तो उनकी दिल अजीज मुंहबोली बेटी ही मांग ली,बहुत जगह कुछ लोगों ने गौहरआरा को ही लवंगी बताया है,जो मुमताज और शाहजहां की 14 वीं औलाद थी।दरबार में हलचल थी,शमशीरें खिंची हुई थी।शहंशाह ने सभी को शांत किया और विवाह के लिए हामी भर दी।पंडित जगन्नाथ शास्त्री नाम था उस युवक का।

16 वीं सदी का अंत ,सत्रहवीं सदी का पूर्वार्द्ध था ,दक्षिण में गोदावरी के छोटे से राज्य मे राज्यसभा में इनका सम्मान था,साहित्य और दर्शन के प्रकांड विद्वान ।राजा चंद्रदेव के राज्य के गौरव थे उनका अभिमान थे ,उन्हें शास्त्रार्थ में कोई भी हरा नहीं पाया था,इसलिए उनकी विद्वता के चर्चे पूरे भारतवर्ष में हों रहे थे।खबर मुगल दरबार तक पहुंची,मुगलों को लगता था कि हर सुंदर वस्तु पर उनका एकाधिकार हो।इसीलिए भारतवर्ष के हर विधा में पारंगत विद्वानों जिन्हें रत्न पुकारा जाता था, अकबर से लेकर अन्य मुगल बादशाहों के दरबार की शोभा बढ़ाते थे।

पंडित जी की विद्वता सुन शाहजहां ने अपने कुछ विद्वान मौलवियों को पंडित जी से शास्त्रार्थ के लिए भेजा ।राजा चंद्रदेव का दरबार सजा था ,मुगल सल्तनत के नुमाइंदे का प्रवेश ।बादशाह शाहजहां के दरबार के रत्न आपके राज्य के विद्वानों को चुनौती देते हैं कि वे उन्हें हरा कर दिखाएं।राजा ने कहा हमें चुनौती स्वीकार है।

अगले दिन गोदावरी तट पर शास्त्रार्थ शुरू हुआ , पंडित जी के सामने कुछ शाहजहां के दरबार के चाटुकार 40 मौलवियों का दल ।


शर्त थी कि अगर पंडित जी पराजित हो गए तो उन्हें अपनी शिखा काट कर उन मौलवियों के कदमों में डालना होगा,पलट कर पंडित जी ने यह शर्त रखी कि अगर वे जीत गए तो मौलवियों को अपनी दाढ़ी कटवानी पड़ेगी।शास्त्रार्थ शुरू हुआ ,कौन टिक सकता था ,पंडित जी के सामने ।बुरी तरह से शिकस्त मिली उन मौलवियों को ,और उन्हें अपनी दाढ़ी कटवानी पड़ी, शर्मिंदगी के साथ दिल्ली की ओर उन्होंने कूच किया।

दो सप्ताह मुश्किल से बीते होंगे की मुगल दरबार से एक बार फिर प्रतिनिधिमंडल राज्यसभा में उपस्थित हुआ ,इस बार बादशाह का फरमान लेकर।बादशाह ने लिखा था _"राजन आपसे यह निवेदन किया जाता है कि आपके दरबार के अनमोल रत्न,कवि,साहित्य शिरोमणि, वेद वेदांत के ज्ञाता पंडित जगन्नाथ शास्त्री को कृपया कर दिल्ली दरबार भेज दें ।बादशाह को ऐसे रत्न की अपने दरबार में आवश्यकता है।"

राजा निवेदन अस्वीकार न कर सके ,वैसे भी उनमें इतना सामर्थ्य भी नहीं था कि वो बादशाह के किसी आदेश या आग्रह को नकार सकें।भरे मन से राजा चंद्रदेव ने पंडित जी को विदा किया।दिल्ली दरबार ,अद्भुत !! जहां शाहजहां अपने तख्ते ताऊस पर आसीन होते थे।शाहजहां के काल में कला संस्कृति को बहुत प्रश्रय मिलता था।शाहजहां ने पंडित जगन्नाथ शास्त्री तैलंग को राजकवि घोषित कर दिया ,और उन्हें पंडितराज नाम दिया।पंडितराज ने कई साहित्यिक रचनाएं,काव्यात्मक संग्रह,प्रशस्ति लिखी।जिसमें

रसगंगाधर,भामिनिविलास,काव्यप्रकाश टीका प्रमुख हैं।


शाहजहां अपनी पत्नी मुमताज महल से बहुत प्यार करता था ,अन्य दो पत्नियां होने के बावजूद भी उसका लगाव मुमताज महल से अंत तक रहा।फ्रांसीसी यात्री बर्नियर के मुताबिक उसकी 14 संतानों में से 7 जीवित थे।जिसमें से वो दाराशिकोह को दिल्ली तख्त का वारिस समझता था ,और उसके बहुत निकट था।


दाराशिकोह को संस्कृत की शिक्षा देने का कार्य शाहजहां ने पंडितराज को सौंपा । दाराशिकोह ने भगवतगीता और योगवशिष्ठ का संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया था।

दाराशिकोह को शिक्षा देने हरम के पास ही एक सुंदर अध्ययन कक्ष सुसज्जित था।जब पंडितराज जाते थे तो साथ में एक 18 वर्षीय यवन कन्या भी बैठती थी ।वह पंडितराज पर आकर्षित थी, छुप छुप कर उन्हें निहारा करती।बीच बीच में बेगम साहिबा, शाहजहां की पुत्री जहांआरा बेगम आती और तल्लीनता से दारा को पढ़ते देखतीं और चली जाती।

मुगलकाल में हरम में ही शहजादे,शहजादियां पलते उनकी शिक्षा दीक्षा होती ,साजिशें भी यहीं से परवान चढ़ती। हरम में शहजादियों और बेगमों पर नजर रखने का जिम्मा ज्यादातर किन्नरों पर होता था।

मुमताज की मृत्यु के बाद जहांआरा ही हरम का काम देखती ।उसके पास राज्य के ज्यादा से ज्यादा अधिकार प्राप्त थे इतना तक की शाही मुहर भी उसके पास था।

लेकिन मुगल शहजादियों के पास विवाह का अधिकार नहीं था ,उनकी जिंदगी में सारे ऐशो आराम थे लेकिन वो प्यार किसी से नहीं कर सकती थी।हरम में पर पुरुषों का प्रवेश वर्जित था।यूरोपियन यात्री ने अपने यात्रा वृतांत में लिखा था कि बेगमें इतनी कामातुर होतीं कि किसी न किसी बहाने पुरुषों का सान्निध्य पाना चाहती , इसी लिए वो ज्यादातर बीमारी का बहाना करतीं।पर्दे के ओट में उन्हें बिठाया जाता तो हकीम के हाथ का स्पर्श करने को लालयित रहती ।बड़ी शहजादी जहांआरा को भी प्यार हुआ था ,लेकिन उससे प्यार करने वाले का हश्र अपने प्राण देकर खत्म हुआ।लवंगी नाम था उस यवन कन्या का ,जिसके नयन पंडितराज को घायल कर रहे थे।संगमरमरी बदन की स्वामिनी ,सुनहरे केश,मृगनयनी के जैसी आंखें ,शरीर के कटाव ऐसे जैसे किसी मूर्तिकार ने छेनी हथौड़ी से अंग अंग को तराशा हो ।

उसने पहली बार हरम में इतना गठीला ,सुंदर ,नौजवान पुरुष देखा था वह पूरी तरह से पंडित जी के आकर्षण में बंध गई थी।पंडित जी भी उसके आकर्षण से अछूते नहीं रहे। अब आंखों आंखों में इशारे होने लगे।उमंगे जवां थी, 18 की लवंगी और 25 के पंडित राज।रुतबा, जाति सबसे अलग केवल एक आत्मा ने दूसरी आत्मा को शरीर के माध्यम से आकर्षित किया था यही है प्रेम।पहली बार लवंगी ने पंडित जी से मीरा के भजन को सुनाने की फरमाइश की।और भजन सुनते सुनते वो उसमें डूब गई ,उसने पास आकर कहा ,तुम मेरे कृष्ण और मैं तुम्हारी मीरा हूं।पढ़ाने के बहाने पंडितराज के हरम में आने जाने पर कोई रोक टोक नहीं थी ,कभी कभी दारा को आकस्मिक किसी युद्ध मोर्चे पर जाना होता था ,तो पंडित और लवंगी के मिलन का सुंदर संयोग बन जाता।


कब तक हम यूं ही छुप छुप कर मिलेंगे पंडित जी, न आपका धर्म ,समाज कभी भी हमें स्वीकार नहीं करेगा और न ही हमारा समाज ही इस रिश्ते को स्वीकार करेगा _ लवंगी की आंखों में वेदना थी, बिछोह का डर भी था।


मैं जाति धर्म को नहीं मानता ,मैने तुमसे नहीं तुम्हारी रूह से प्यार किया है,जोश में पंडित जी ने कहा।लवंगी का विश्वास समय समय पर हिचकोले खाता लेकिन पंडित जी का आश्वासन पा ,फिर से आशा का दीप जल जाता।धीरे धीरे पंडित राज का रुतबा दरबार में बढ़ रहा था। लवंगी के प्यार की खबर जहांआरा को थी ,उसने उसे समझाया भी लेकिन फिर जिद के आगे झुक गई,लेकिन उसने किसी प्रकार की मदद करने को इनकार कर दिया।जहांआरा को प्यार की तड़प का अहसास था,इसीलिए वह चुप रही।मुमताज की मृत्यु के बाद बादशाह का ज्यादातर ध्यान जहांआरा ही रखती थी ,बादशाह भी अपनी इसी बेटी पर भरोसा करता था।

एक दिन राजदरबार में काव्यात्मक माहौल था ,संस्कृत के छंद, श्लोक सुनाए जा रहे थे ,बादशाह रस विभोर थे ,हरिनारायण मिश्र,और वंशीधर मिश्र के सामने पंडित राज के अलंकृत काव्य का सभी अमृत पी रहे थे ।अचानक किसी छंद को सुन बादशाह उठ खड़े हुए और उन्होंने पंडित राज की ओर मुखातिब हो कर कहा _"मांगो क्या मांगते हो ,तुम मुंह मांगी इनाम के हकदार दो,आज माबदौलत तुम्हें वचन देते हैं कि हम अपने वचन से पीछे नहीं हटेंगे।"


पंडित राज बड़े अदब से उठे और धीमे से उन्होंने कहा_"जहांपनाह गुस्ताखी माफ,आप का दिया मेरे पास हर कुछ मौजूद है ।"

"फिर भी ....? जिसकी तुम्हें कामना हो" _बादशाह ने कहा।

पंडित जी ने नजर उपर उठाई , उस समय झरोखे इस प्रकार बनवाए जाते थे जिसमें केवल जनानाखाने की महिलाएं सबको देख सकती थीं,सारे सांस्कृतिक समारोह ,नृत्य ,वादन का आनंद उठा सकती थीं परंतु उन्हें कोई पुरुष नहीं देख सकता था,पंडित जी को यकीन था कि उनकी प्रेयसी अवश्य ही इन झरोखों के पीछे से उन्हें देख रही होगी।

उन्होंने फिर इस तरह से अपनी प्रेयसी को शाहजहां से मांगा

नयाचे गजालिं नवा बाजिराजिं न वित्तेषु चित्तं मदीयं कदाऽपि।

इयं सुस्तनी मस्त कन्यस्तकुम्भा लवंगी कुरंगीदृगंगी करोतु।।

अर्थात हे राजन मुझे हाथियों की कतार नहीं चाहिए ,मुझे स्वर्ण से भरे कलश भी नहीं चाहिए , मैं तो मृगनयनी लवंगी को अंगीकार करना चाहता हूं।बादशाह वचन दे चुके थे इसलिए उन्होंने लवंगी का हाथ पंडितराज के हाथों में दे दिया।


विवाह के दिन लाल किले को शानदार ढंग से सजाया गया।दोनों का विवाह संपन्न हुआ।दोनों आनंदपूर्वक राज्य में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। पंडितराज नित नई रचनाओं का सृजन कर रहे थे।दाराशिकोह को दिल्ली सल्तनत अपने आगामी बादशाह के रूप में देख रहा था। पंडितराज और दारा की मित्रता और नजदीकी सर्व विदित थी।

सन 1657 शाहजहां वृद्ध हो चुके थे उनकी तबियत खराब हो गई ,लग रहा था कि अब वे ज्यादा दिनों के मेहमान नहीं हैं।सत्ता संघर्ष शुरू हो गया।1658 आधी रात का समय लाल किले पर औरंगजेब ने हमला कर दिया,जबरदस्त कोलाहल से पूरा किला गूंज उठा ,चारों ओर भगदड़ का माहौल था। तभी एक गुप्तचर मशाल लेकर पंडित जी के कक्ष की ओर बढ़ता है और सूचना देता है कि बादशाह को गिरफ्तार कर लिया गया है ,आप शहजादे दाराशिकोह के विश्वस्त हैं संभवतः आपको भी बंदी बनाया जा सकता है ,आप यहां से कहीं दूर निकल जाइए,यमुना में आपके लिए नाव का प्रबंध है ।


जीवन भी कैसे छल करता है ,सबकुछ ठीक ठाक से चल रहा था कि आखिर औरंगजेब रूपी आंधी ने उनके जीवन की दशा और दिशा ही बदल दी।

दोनों को दिल्ली छोड़ना पड़ा।रात के अंधियारे में वे निकल पड़े ,अगले मंजिल की ओर पता नहीं अब उम्र के तीसरे पड़ाव पर क्या देखना है,पंडित जी यही सोचते सोचते मथुरा पहुंच गए।कुछ दिन मथुरा ,वृंदावन में रहने के बाद उनका मन नहीं लगा,वहां भक्तिरस प्रवाहित था परंतु विद्वता और पांडित्य की कद्र नहीं थी।पंडित जी निराश हो गए।


उन्हें पता था कि काशी विद्वानों की नगरी है,विद्वता की बयार गंगा की धारा में बहती है। जहां के कण कण में विश्वनाथ का वास है ,वहीं उनकी रोजी रोटी का इंतजाम होगा।

चल दिए काशी , लवंगी के साथ।


बनारस सभ्यता से भी पुराना शहर ,कहते हैं कि इस नगरी को भगवान शिव ने अपने त्रिशूल पर बसाया है ,यहां के पानी में भी बनारसी ठसक है।बनारस जल्दी किसी बाहरी को कहां अपनाता है ,इसी वजह से यहां किसी और सभ्यता का रंग नहीं चढ़ा।वरना अरबों की तलवार जहां जहां गई वहां वहां की जड़ों को नष्ट कर दिया।

फारस,मिश्र ,यूनान सभी मटियामेट हो गए ।ये बनारस ही है जो हजारों वर्षों के आक्रांताओं के प्रहार सह कर भी अपनी मस्ती में चूर रहा।


बनारस ने सिरे से दोनों को नकार दिया ।एक धर्म भ्रष्ट ब्राह्मण जिसने यवन कन्या से विवाह किया उसे काशी के विद्वत समाज कैसे स्वीकार करता।उस समय काशी में अप्पय दीक्षित और पंडित भट्टोजी दीक्षित की विद्वता दूर दूर तक फैली थी।काशी के विद्वान मंडली में इनका स्थान सूर्य के समान था।एक दिन पंडित जी लवंगी के साथ गंगा घाट पर चादर ओढ़े लेटे थे ।वहीं से अप्पय दीक्षित गंगा स्नान से लौट रहे थे।एक पकी शिखा चादर के बाहर से दिखाई दे रही थी तो अप्पय दीक्षित ने टिप्पणी की।जब पंडित जी ने अपनी चादर हटाई तो उन्होंने बात बदल दिया,और कुटिल मुस्कान के साथ वहां से चले गए।

पंडितराज ने भी ठान लिया कि ,मैं बनारस में ही रह कर अपनी विद्वता का लोहा मनवाऊंगा।


पंडित जी ने भट्टोजी दीक्षित द्वारा रचित काव्य प्रौढ़ मनोरमा का खण्डन करते हुए प्रौढ़ मनोरमा कुर्चमर्दनम नामक ग्रंथ लिखा ,पूरे बनारस में धूम मच गई चारों ओर उनकी ही चर्चा होने लगी।उन्होंने अप्पय दीक्षित द्वारा रचित चित्रमीमांसा का खंडन करते हुए चित्रमीमांसाखंडन लिखी।चहुं ओर उनकी विद्वता का डंका बजने लगा ,परंतु काशी के विद्वानों ने फिर भी नहीं अपनाया,वे अभी भी उन्हें धर्म भ्रष्ट मानते रहे।


अब पंडित राज के सब्र का बांध टूट चुका था ,उन्होंने कहा _लवंगी गोदावरी चलोगी? वो अपनी मिट्टी है जरूर अपनाएगी।लवंगी ने कहा _"गोदावरी क्यों ,बनारस क्यों नहीं !बनारस को हमें अपनाना होगा।"

"लेकिन अब मैं किससे कहूं , मैं पूरी तरह से थक गया हूं"_पंडित जी ने कहा।


"क्यों जग के पापों को धोने वाली माता गंगा को क्यों नहीं कहते"_लवंगी की आंखों में पंडित जी के लिए विश्वास झलक रहा था।लवंगी की बातों से पंडित जी की आंखों में पुनः एक चमक लौट आई।उन्होंने चमकती आंखों से इशारे से कहा_"प्रिये तुम तैयार हो?"

लवंगी ने कहा _"मैं तो आपके हर फैसले ,हर स्थिति में साथ हूं।"


अगले दिन पंडितराज ने काशी के विद्वानों को खुली चुनौती दी कि ,_"आप लोगों को मैं चुनौती देता हूं कि अगर मैं सच्चा ब्राह्मण हूं तो तल में बह रही मां गंगा को उपर की सीढ़ियों तक न बुलाया तो आपलोग मेरी शिखा काट गंगा में प्रवाहित कर देंना।"पूरी काशी में खलबली मच गई।अगले दिन काशी का हुजूम दशाश्वमेध घाट पर उमड़ गया।

पंडित जी ,लवंगी के साथ सबसे ऊंची सीढ़ी पर जा बैठे,और गंगलहरी का पाठ करना शुरू किया।जो गंगा 52 सीढ़ियों से नीचे बह रहीं थीं,देखते देखते एक एक सीढ़ी ऊपर चढ़ने लगीं।


चारों ओर लोग आश्चर्य से देख रहे थे।गंगा 51 सीढ़ियों तक पहुंच चुकी थी ,दोनों प्रेम के पंक्षियों ने एक दूसरे की आंखों में देखा।पंडित जी लवंगी से कुछ कहते उससे पहले लवंगी ने कहा"_क्यों अविश्वास है पंडित जी,प्रेम किया है मैने।"और देखते देखते गंगा उन दोनों को अपनी गोद में ले नीचे उतर गईं।जिस बनारस के विद्वत मंडल ने पंडित जी को स्थान नहीं दिया उसे गंगा ने अपनी गोद में लेकर अपना बना लिया।गंगा ने उनकी पवित्रता की गवाही खुद आ कर दिया।गंगालहरी पंडितराज की अप्रतिम कृति है ,इसके 52 श्लोकों में गंगा की स्तुति अलग अलग भक्ति भाव से किया गया है।उदाहरण के तौर पर एक श्लोक में इस तरह के भाव हैं गंगा के प्रति_


"जग तारिणी ,पापियों के पाप धोने वाली गंगा तू नहीं थकती । तू अकेली ही पापियों पर विजय पाती है।"

समाप्त।



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