पिछला दरवाज़ा.
पिछला दरवाज़ा.
पिछला दरवाज़ा
लाल चटक घरचोलू, फीकी नेलपॉलिश से सजे नाखून, मेंहदी लगे हाथों में एक बैग, सिर पर ओढ़नी का पल्लू… और आँखों में अनजाने भय की गहरी परछाईं।
प्रवीणा आज दोराहे पर खड़ी थी। आज उसका विवाह था – या फिर प्रेम की बलि?
पिता विनोदभाई को उसने बचपन से देखा था – छोटा सा घर, दो छोरों को जोड़ने की मेहनत, सीमित सपने। लेकिन बेटी की शादी को उन्होंने जीवन का सबसे बड़ा अवसर मान लिया था। बेटी के हाथ पीले करने में उन्होंने कोई कमी नहीं छोड़ी।
लेकिन…
प्रवीणा का दिल कहीं और धड़क रहा था। विनोदभाई की पसंद से विपरीत, उत्तर-पूर्व की एक कोस दूर, पूर्वीश के नाम पर। कॉलेज के दिनों से शुरू हुई बातचीत अब भावनाओं की माला बन चुकी थी। गहरे प्रेम में वे सबवे या लाइब्रेरी में मिलते रहते। जीवन के सपनों का राजकुमार सा पूर्वीश, कभी स्पष्ट नहीं था, लेकिन प्रवीणा के लिए वही सच्चा था। “जीवन सामाजिक बंधनों के लिए नहीं, दिल से जीने के लिए कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं…” ऐसे इंस्टाग्राम कोट्स उसके विचारों की दिशा तय करते रहते।
पिता ने अपने मित्र के बेटे सुलभ से उसका रिश्ता तय कर दिया। प्रवीणा पिता के त्याग को देखकर विरोध नहीं कर सकी। आखिरकार शादी का दिन आ गया। मेंहदी, पीठी, विधि सब पूरी हो चुकी थी। प्रवीणा के मन में पूर्वीश के मैसेज गूंज रहे थे। शादी के कुछ घंटे पहले उसने निर्णय लिया।
एकदम शांतिपूर्वक।
सिर्फ एक बैग। थोड़े पैसे, मन की दीवार पर टंगी अनगिनत आशाएँ, और कुछ दुखों के साथ, पिछले दरवाज़े से विनोदभाई का घर छोड़कर, सपनों को साकार करने निकल पड़ी। उसने पूर्वीश के घर की राह पकड़ी।
संकरे, रेतीले कच्चे रास्ते पर चलती उसकी रिक्शा उसे झकझोर रही थी – क्या वह सही रास्ते पर है? आखिरकार वह पूर्वीश के घर पहुँचती है। जर्जर, कमजोर से घर के दरवाज़े पर खड़ी होती है। सांकल खटखटाती है। अंदर से बच्चे के रोने की आवाज़ के बीच कदमों की आहट आती है।
प्रवीणा को सपनों से जोड़ता, बड़ा सा दरवाज़ा खुलता है।
अंदर से एक महिला बाहर आती है। साफ-सुथरी, बड़ी आँखें और भावहीन चेहरा। बिना किसी भाषा का शांत भाव।
“हाँ, कौन हैं आप? किससे काम है?” वह पूछती है।
प्रवीणा एक पल के लिए शब्द खो बैठती है। फिर, धड़कते दिल को संभालकर कहती है:
“मैं... मैं पूर्वीश के लिए आई हूँ...”
महिला थोड़ा सोचकर मीठे स्वर में कहती है:
“वह नहा रहा है। ओह, आइए अंदर। मैं उसकी पत्नी माधवी हूँ।” कहकर वह प्रवीणा का बैग लेती है और उसे घर के भीतर ले जाती है। एक संकुचित मकान। दीवारों पर उखड़े हुए पलस्तर, प्रवीणा को डरा रहे थे।
...हर पल उसका भ्रम टूट रहा था। अंदर से पूर्वीश तौलिया पहनकर बाहर आता है। प्रवीणा को बैग के साथ देखकर घबरा जाता है।
“प्रवीणा... अरे तू इस वक्त सुबह-सुबह यहाँ? क्यों आ गई?”
प्रवीणा के होंठ सूख जाते हैं।
“तुमने तो कभी कहा ही नहीं... कि तुम्हारी शादी हो चुकी है...?”
पूर्वीश एक गहरी साँस लेता है।
“अरे... मैं तुझे क्या कहता? मैं तुझे आजकल बताने ही वाला था। तू अब भी मेरी एक दोस्त रह सकती है। लेकिन सच्चाई ये है... ये मेरी पत्नी है, ये मेरा बेटा तरुण है। समझ, ये मेरा असली जीवन है।”
माधवी दोनों को देख रही है। उसकी आँखों में जिज्ञासा है, लेकिन कोई शिकायत नहीं।
प्रवीणा मौन हो जाती है। आँखों से दुख नहीं बहता – वह तो भीतर ही गूंजता है।
वह भटक गई थी। और अब वह पूर्वीश के साथ सुखी होगी – इस संजोए भ्रम को पहचान रही थी। वह समझ गई – प्रेम के नाम पर जो मोह था, वह मीठा भ्रम था। उससे सही रास्ता खो गया था।
उसने कसकर एक थप्पड़ पूर्वीश के गाल पर मारा, और उस चालीनुमा घर से वापस लौट गई। सही रास्ते का पिछला दरवाज़ा अब भी खुला था। उसे अब शांति थी, वह अपनी जगह पर लौट आई थी और समय को थाम चुकी थी।
(मंडप – दोपहर बाद)
विनोदभाई, बारात के स्वागत में व्यस्त थे। किसी ने ध्यान नहीं दिया कि प्रवीणा कुछ समय के लिए गायब थी। सब संगीत संध्या के लिए तैयार हो रहे थे। सुलभ, प्रवीणा के कमरे में आकर मुस्कुराकर पूछता है:
“आप तो बड़ी जल्दी में हैं, बैग लेकर तैयार हैं:
सब ठीक है, ना?”
प्रवीणा सुलभ की सरलता देखकर मुस्कुराती है – शांत, मन से कहती है:
“अब सब ठीक है।”
“भटकना गुनाह नहीं है, लेकिन भटकते हुए सही रास्ता भूल जाना – वो गुनाह है!”
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