बुज़ुर्गों की तन्हाई
बुज़ुर्गों की तन्हाई
बुज़ुर्गों की तन्हाई
लेखक: कल्पेश पटेल
पुराने मोहल्ले के छोटे‑से घर में रहते थे दादाजी — श्रीमान हरिशंकर त्रिवेदी। उम्र 82 वर्ष, सफेद बाल, धीमी चाल, और आँखों में गहरी खामोशी। बेटा विदेश में, पोते अपने काम में, और पड़ोसी मोबाइल में व्यस्त। दादाजी का दिन तुलसी को पानी देने और रेडियो पर पुराने गीत सुनने में बीतता।
एक दिन मोहल्ले का बच्चा किशन आँगन में आया। उसने मासूमियत से पूछा:
“दादाजी, आप अकेले क्यों रहते हैं?”
दादाजी मुस्कुराए:
“बेटा, अकेलापन कोई सज़ा नहीं… ये तो आईना है जिसमें हम अपनी पूरी ज़िंदगी देख सकते हैं।”
किशन रोज़ आने लगा। कभी कहानी सुनता, कभी शतरंज खेलता। धीरे‑धीरे दादाजी की आँखों में चमक लौट आई।
एक शाम, जब सूरज ढल रहा था और तुलसी के पास दीपक जल रहा था, दादाजी ने देखा — किशन की मुस्कान, उसकी आँखों की चमक, उसकी मासूमियत में उन्हें सचमुच श्रीकृष्ण का रूप दिखाई दिया।
दादाजी की आँखें नम हो गईं। उन्होंने मन ही मन कहा:
“आज मेरी तन्हाई समाप्त हो गई। यह बच्चा मेरे लिए भगवान का आशीर्वाद है। जीवन अब सचमुच धन्य हो गया।”
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💫 संदेश
बुज़ुर्गों की तन्हाई तब मिटती है जब उन्हें किसी में अपनापन और दिव्यता का दर्शन होता है।
कभी‑कभी एक मासूम बच्चा ही उनके लिए भगवान का रूप बन जाता है।
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