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Kalpesh Patel

Abstract Drama Tragedy Classics

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Kalpesh Patel

Abstract Drama Tragedy Classics

तेरा साथ

तेरा साथ

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तेरा साथ

भिखु भाई दूध वाला हर सुबह अपनी पुरानी साइकिल पर गली में निकल पड़ता था। घंटी की टनटनाहट से मोहल्ले की नींद खुल जाती, और ताज़ा दूध की खुशबू घर-घर पहुँचती। साइकिल पुरानी थी, थकी हुई थी, लेकिन भिखु भाई का उत्साह और ईमानदारी कभी थके नहीं।

एक दिन साइकिल बीच रास्ते में टूट गई। भिखु भाई परेशान होकर बैठ गया—“अब मैं दूध कैसे पहुँचाऊँगा?” लेकिन मोहल्ले ने उसका दर्द देखा। बच्चों ने डिब्बी उठाई, औरतों ने दिलासा दिया। सबने मिलकर चंदा इकट्ठा किया और कुछ ही दिनों में भिखु भाई के पास चमचमाती नई साइकिल थी।

जब वह पहली बार उस पर बैठकर गली में आया, तो घंटी की टनटनाहट के साथ तालियाँ गूँज उठीं। बच्चों ने फूल बरसाए, औरतों ने कहा—“अब हमारी सुबह और भी उजली हो गई।”

भिखु भाई की आँखों में आँसू थे, लेकिन दिल में गर्व और कृतज्ञता। पुरानी साइकिल उसकी मेहनत की निशानी थी, और नई साइकिल मोहल्ले के प्यार की।


कवितामय समापन – तेरा साथ

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तेरा साथ रहा हर राह में,
थक गई साइकिल, पर तू न थमा।
मोहल्ले का प्यार मिला हाथ में,
नई साइकिल बनी जीवन का सपना।

मेहनत की गवाही पुरानी घंटी,
प्यार की निशानी नई चमकती कंटी।
तेरा साथ, भिखु भाई, सदा रहेगा,
हर सुबह मोहल्ला तुझसे ही खिलेगा।
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