रात के हमसफ़र
रात के हमसफ़र
रात के हमसफ़र
अहमदाबाद की सिविल हॉस्पिटल में रूबिन वार्ड बॉय था।
दिनभर वह मरीजों के बीच रहता — कोई दर्द से कराहता, कोई परिजन आँसुओं में डूबे खड़े रहते, तो कोई मशीनों की बीप-बीप के बीच ज़िंदगी से जूझता।
भीड़ थी, आवाज़ें थीं… फिर भी रूबिन को भीतर से एक अजीब अकेलापन घेर लेता।
ख़ासकर रात की ड्यूटी में।
मध्यरात्रि के बाद वार्ड में अजीब सन्नाटा छा जाता। लंबी गलियों में ट्यूब लाइट की फीकी रोशनी, दीवारों पर पड़ती परछाइयाँ और मशीनों की धीमी आवाज़ें… यह सब कभी-कभी रूबिन के मन में अनजानी भय की लहरें उठा देता।
एक रात जब वह ड्यूटी रजिस्टर लिख रहा था, उसकी नज़र बिस्तर नंबर 21 पर गई।
उस बिस्तर पर पड़ा मरीज दो दिन पहले ही मर चुका था।
लेकिन आज…
रूबिन को लगा कोई वहाँ बैठा है।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
बिस्तर खाली था।
“शायद मेरी कल्पना होगी…” उसने मन ही मन कहा।
लेकिन जब वह वापस रजिस्टर के पास आया, उसकी आँखें फैल गईं।
रजिस्टर में एक नई लाइन लिखी थी —
“बिस्तर नंबर 21 – मौजूद।”
उस दिन के बाद अजीब घटनाएँ होने लगीं।
कभी खाली बिस्तर के पास परछाई दिखती, कभी कोई धीमी आवाज़ उसका नाम पुकारती।
एक रात वह ICU के शीशे के सामने खड़ा था।
अंदर डॉक्टर किसी मरीज के पास थे।
मशीन तेज़ी से बीप कर रही थी।
रूबिन शीशे के पास गया और देखा।
बिस्तर पर पड़ा मरीज…
चेहरा जाना-पहचाना लग रहा था।
वह और करीब गया।
और अचानक उसके शरीर से जैसे सारा खून उतर गया।
वह मरीज… रूबिन खुद था।
उस पल भूली हुई यादें लौट आईं —
एक भयानक सड़क हादसा…
एम्बुलेंस की कर्कश आवाज़…
और फिर लंबा अंधकार।
सच धीरे-धीरे साफ़ होने लगा।
रूबिन असल में अस्पताल में काम नहीं करता था।
वह तो लंबे समय से कोमा में था।
जो अस्पताल, जो वार्ड, जो मरीज और जो आवाज़ें वह देख रहा था…
वह सब बाहर की दुनिया नहीं थी।
यह तो उसके अपने दिमाग़ के भीतर बना हुआ एक संसार था।
वह खुद ही मरीज था…
लेकिन मन उस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पा रहा था।
इसलिए मन ने उसे वार्ड बॉय बना दिया —
ऐसा इंसान, जो दूसरों के दर्द में रहकर अपना दर्द भूल जाए।
रूबिन ICU के शीशे के सामने खड़ा रहा।
शीशे में दो दुनिया दिख रही थीं —
एक बाहर की…
और एक उसके मन की।
अचानक डॉक्टर बोले:
“पेशेंट के ब्रेन सिग्नल्स बढ़ रहे हैं… शायद वह जाग जाए।”
उसी क्षण रूबिन को लगा कि पूरा वार्ड धीरे-धीरे धुंधला हो रहा है।
बिस्तर, गलियारे, मरीज… सब ओझल होने लगे।
और तब उसे समझ आया —
अकेलापन खाली जगह नहीं है।
अकेलापन तो आईना है।
उस आईने में इंसान दूसरों को नहीं देखता…
अपने मन का असली चेहरा देख लेता है।
ICU में मशीन की आवाज़ तेज़ हुई।
रूबिन की उँगली हल्की सी हिली।
डॉक्टर ने धीरे से कहा —
“वह लौट रहा है।”
और रूबिन की बंद आँखों के भीतर…
रात के हमसफ़र का आईना टूटकर उजाला बन गया।
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