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Kalpesh Patel

Abstract Classics Inspirational

4  

Kalpesh Patel

Abstract Classics Inspirational

समय का सौदागर

समय का सौदागर

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समय का सौदागर – रंग और पलों की बारात

लाहौर की पुरानी गलियों में, जहाँ मसालों की ख़ुशबू और इत्र की महक हवा में घुली रहती थी, वहीं एक संकरी सी गली में मुस्तुफ़ा की दुकान थी। बाहर से देखने पर यह घड़ियों की छोटी सी दुकान लगती थी, लेकिन भीतर कदम रखते ही लगता था जैसे समय ठहर गया हो। दीवारों पर पुरानी घड़ियाँ टंगी थीं—कुछ लकड़ी की, कुछ पीतल की, और कुछ इतनी नाज़ुक कि लगता था जैसे किसी राजमहल से आई हों। हर घड़ी की टिक-टिक अलग थी, मानो हर एक अपने मालिक की कहानी सुना रही हो।
मुस्तुफ़ा, जिसे लोग समय का सौदागर कहते थे, उसी दुकान का मालिक था। उसकी आँखों में एक अजीब चमक थी—जैसे वह सिर्फ़ घड़ियाँ नहीं, बल्कि लोगों के पल और यादें भी संभालकर रखता हो। लाहौर के उस भीड़-भरे बाज़ार में उसकी दुकान एक रहस्य थी। कुछ लोग कहते थे कि उसकी घड़ियाँ बीते हुए पलों के दरवाज़े खोल देती हैं, तो कुछ कहते थे कि वह भविष्य की हल्की सी झलक भी दिखा सकता है।
इसी बाज़ार की भीड़ में एक दिन मरियम पहुँची।
मरियम एक चित्रकार थी। उसकी तूलिका रंगों में भावनाएँ कैद कर लेती थी, लेकिन पिछले कुछ सालों से उसके चित्रों में रंग होते हुए भी जीवन नहीं था। उसकी मुस्कान कहीं खो गई थी—शायद उस दिन, जब उसकी ज़िंदगी के सबसे प्यारे रंग अचानक फीके पड़ गए थे।
वह धीरे-धीरे चलते हुए मुस्तुफ़ा की दुकान तक पहुँची। भीतर आते ही उसे लगा जैसे हवा भी धीमी हो गई हो।
मरियम ने धीमे स्वर में पूछा—
“क्या आपके पास ऐसा समय है, जिसमें मैं अपनी खोई हुई मुस्कान ढूँढ सकूँ?”
मुस्तुफ़ा ने कुछ पल उसे देखा, जैसे उसकी आँखों के भीतर छिपी कहानी पढ़ रहा हो। फिर वह मुस्कराया और दीवार से एक पुरानी घड़ी उतारकर उसकी ओर बढ़ा दी।
“यह घड़ी,” उसने कहा, “तुम्हें उस पल तक ले जाएगी जब तुम्हारी तूलिका पहली बार रंगों से नाची थी।”
मरियम ने काँपते हाथों से घड़ी को छुआ।
अचानक उसकी आँखों के सामने एक दृश्य चमक उठा—
एक छोटी सी बच्ची, अपने घर के आँगन में बैठी, काग़ज़ पर रंग बिखेर रही थी। उसके कपड़ों पर भी रंग लगे थे, और उसके चेहरे पर भी। वह हँस रही थी—इतनी खुलकर, जैसे दुनिया में कोई दुख ही न हो।
मरियम की आँखों से आँसू बह निकले।
“यह… मैं हूँ,” उसने फुसफुसाकर कहा।
मुस्तुफ़ा ने शांत स्वर में कहा—
“मुस्कान कहीं खोती नहीं, मरियम। वह बस यादों की धूल में छिप जाती है।”
मरियम ने घड़ी को सीने से लगा लिया। उस पल उसे समझ आया कि वह अपनी मुस्कान कहीं बाहर नहीं ढूँढ रही थी—वह तो हमेशा उसके भीतर ही थी।
उस दिन के बाद मरियम ने फिर से चित्र बनाना शुरू किया। लेकिन अब उसके रंग अलग थे। हर चित्र में समय के छोटे-छोटे पल चमकते थे—बचपन की हँसी, बारिश की बूंदें, माँ की आवाज़, और जीवन की छोटी खुशियाँ।
कुछ महीनों बाद लाहौर की एक कला प्रदर्शनी में मरियम की नई पेंटिंग्स लगीं। उस श्रृंखला का नाम था—
“रंग और पलों की बारात”
लोग उन चित्रों को देखते और मुस्करा उठते, जैसे उन्हें भी अपने भूले हुए पल याद आ गए हों।
एक शाम मरियम फिर उसी गली में लौटी। वह मुस्तुफ़ा को धन्यवाद कहना चाहती थी।
लेकिन जब वह वहाँ पहुँची, तो उसे आश्चर्य हुआ—
वहाँ कोई दुकान ही नहीं थी।
पास के दुकानदार ने कहा—
“यहाँ तो बरसों से कोई घड़ी की दुकान नहीं है।”
मरियम कुछ पल चुप रही। फिर उसने अपनी कलाई की घड़ी देखी—वही पुरानी घड़ी, जो मुस्तुफ़ा ने उसे दी थी।
उसकी टिक-टिक अब भी चल रही थी।
मरियम हल्के से मुस्कराई।
शायद मुस्तुफ़ा सच में घड़ियाँ नहीं बेचता था—
वह लोगों को समय की कीमत याद दिलाता था।
और तब उसे समझ आया कि जीवन दरअसल क्या है—
रंगों और पलों की एक अनंत बारात,
जो हर दिन हमारे दरवाज़े से गुज़रती रहती है। ✨



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