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Kalpesh Patel

Abstract Classics

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Kalpesh Patel

Abstract Classics

आज का अभिमन्यु.

आज का अभिमन्यु.

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आज का अभिमन्यु.

कोड की स्क्रीन पर चमकते अक्षरों के बीच वह बैठा था—आज का अभिमन्यु।
रात के दो बजे थे।
शहर सो चुका था, पर उसकी आँखों में नींद नहीं, सिर्फ़ नीली रोशनी की परछाइयाँ थीं।
उसके सामने कोई रणभूमि नहीं थी,
न शंखनाद, न रथ, न कवच।
सिर्फ़ एक लैपटॉप, कॉफी का आधा खाली मग,
और स्क्रीन पर घूमता हुआ वह अंतहीन चक्रव्यूह—
लूप के भीतर लूप,
फंक्शन के भीतर फंक्शन,
और हर मोड़ पर एक नया बग।
वह भीतर घुस चुका था।
उसे सिखाया गया था—
“कोड लिखना सीखो, दुनिया बदल दोगे।”
पर किसी ने यह नहीं सिखाया
कि चक्रव्यूह से बाहर कैसे निकला जाता है।
हर एरर मैसेज एक तीर था—
“Syntax Error.”
“Null Pointer Exception.”
“Access Denied.”
डेडलाइन उसके सिर पर लटकी तलवार थी।
टीम चैट में मैनेजर का संदेश चमका—
“Update?”
उसने गहरी साँस ली।
कीबोर्ड पर उँगलियाँ फिर से चलने लगीं।
वह पंक्तियों के बीच अर्थ खोजता रहा,
जैसे अंधेरे में दीपक ढूँढता कोई साधक।
उसे याद आया—
पुराने समय का अभिमन्यु भी
अधूरी शिक्षा के साथ युद्ध में उतरा था।
वह भी जानता था प्रवेश का मार्ग,
पर निकास का नहीं।
आज का अभिमन्यु भी
ट्यूटोरियल्स और ऑनलाइन कोर्स की दुनिया से
प्रवेश करना सीख आया था।
पर असली युद्ध—
प्रोडक्शन सर्वर का,
क्लाइंट की उम्मीदों का,
और असफलता के भय का—
वह अकेले लड़ रहा था।
बाहर सुबह की पहली किरण फूटी।
पर उसकी स्क्रीन पर अब भी अँधेरा था।
अचानक—
एक विचार बिजली की तरह कौंधा।
उसने एक लाइन बदली,
एक लॉजिक पलटा,
एक अनदेखी शर्त जोड़ी।
स्क्रीन कुछ क्षणों के लिए स्थिर हुई…
फिर शब्द उभरे—
“Build Successful.”
उसकी आँखों में थकान थी,
पर होंठों पर हल्की मुस्कान।
वह समझ गया—
अभिमन्यु सिर्फ़ शहीद होने की कथा नहीं,
संघर्ष की परंपरा भी है।
हाँ, कभी-कभी
“Fatal Error” ही अंतिम सत्य बन जाता है।
पर कई बार
उसी स्क्रीन पर
एक नई सुबह भी लिखी जा सकती है।
आज का अभिमन्यु
कोड की पंक्तियों में कैद नहीं,
उन्हीं पंक्तियों से अपना मार्ग तराशता है।

"चक्रव्यूह बदला है, पर अभिमन्यु अब भी अकेला है—
फर्क बस इतना है, अब वह अपने लिए निकास भी खुद लिखता है।"





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