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Sanjay Aswal

Abstract

4.7  

Sanjay Aswal

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फिर आना गांव -२

फिर आना गांव -२

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दूर से हमारा गांव उसकी स्यारी (खेत,खलियान) हरे मखमल सी दिख रहे थे,मानों स्वयं ईश्वर ने अपने हाथों से मखमल ओढा दिया हो। गांव पहुंचने पर ऊपर सड़क किनारे मैंने गाड़ी खड़ी कर उस पर कवर चढ़ाया सारा सामान निकाल बच्चों और धर्म पत्नी जी के साथ पगडंडियों से नीचे उंधार (उतराई) की ओर चल पड़े। रास्ते में छोटे छोटे पेड़ पौधे जंगली फूलों की महक से ताजगी महसूस होने लगी,दूर चिड़ियों कि चहचहाट से मन मंत्र मुग्ध हो गया। मैंने कुछ इलमोड(खट्टी मीठी जड़े) तुंगा(पहाड़ी ब्रश) तोड़ कर रख लिया,कल इनका स्वाद लिया जाएगा। धीरे धीरे गांव की ओर बढ़ते कदम एक अलग ही दुनियां का अहसास करा रहे थे। घरों से निकलते चूल्हे के धुंए की खुशबू को मैं साफ महसूस कर रहा था। गांव में हमारा घर आखिरी छोर पर था, हमें पूरे गांव से होकर गुजरना होता है, सबसे मिलते मिलाते रामा रामी करते बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हम अपने घर की ओर बढ़े।

जहां मेरी मां और बच्चों की दादी बड़ी बेसब्री से अपने पोतों की पलक फावड़े बिछा कर इंतजार कर रही थी। जैसे ही हम अपने घर पहुंचे, मेरी मां ने हम सब को हल्दी चांवल का टीका लगाया और हम सब की भुक्की(माथे पर चूमना) पी और अंदर आने को कहा।

फिर हम सब घर के अंदर प्रवेश कर गए। बच्चे ख़ुशी से दादी के गले लिपट गए, दादी पोते सब खुश थे,आखिर बच्चे पहली बार अपने गांव आए अपने पुश्तैनी घर में। दादी भी बहुत खुश थी। मैंने मां के चेहरे मे इतनी चमक पहली बार महसूस की। सारा सामान बैग व्यवस्थित करने के बाद धर्मपत्नी जी ने किचन संभाल लिया और अपनी सास जी की मदद करने लगी। मैं हाथ मुंह धो कर बरामदे में ही बैठ गया, अपने घर को देखे आज मुझे आठ साल हो गए थे,सब कुछ वैसे का वैसे ही था, वही लाल मिट्टी का रंगों रोगन, वही ताख जिसमे मां अपना जूड़ा और दाथी (पत्तियां काटने का छोटा हथियार) रखती थी,सब कुछ पहले जैसा ही था कुछ नहीं बदला सिवाय समय के। कुछ देर बाद पिताजी का आगमन हुआ वो खेत में गए थे। पांव छू कर मैंने पिताजी को गले लगा दिया ,ऐसा अहसास हुआ जैसे मैं फिर से वही बच्चा हो गया हूं जिसे पिताजी अपने साथ खेतों में ले जाते,सच अद्भुत था ये समय।

अब मां, धर्मपत्नी जी चाय, पकोड़े, अरसे(पहाड़ी मिठाई) ले कर बाहर बरामदे मे आ गई, कुछ रिश्तेदार भी भेंट(मिलने) करने पहुंच गए,काफी खुशनुमा माहौल हो गया था। एक दूसरे से कुशल क्षेम रामा रामी हुई फिर चाय का दौर चला। काफी समय तक लोगों से मिलना मिलाना चलता रहा।

उधर दादी और धर्म पत्नी जी रात के खाने की तैयारी में जुट गए। पिताजी अपने हुक्का तैयार करने लगे,बच्चे कोठा(पांच छह घरों को मिलाकर बना छोटा मोहल्ला) के भीतर दूसरे बच्चों के साथ घूलमिल रहे थे।

आज मिलने मिलाने मे समय कब गुजरा पता ही नहीं चला और रात हो गई। रात को दादी ने हम सबके लिए तिमले की सब्जी, लाल भात, गौथ की दाल, मंडुवे की रोटी घी के साथ परोसी, हमने खूब खाया, सच ऐसा लगा जैसे बरसों की भूख अब शांत हुई हो,खाना उत्तम से भी उत्तम था।

खाने के बाद हम सब चूल्हे के पास ही बैठ गए,पास की ताई जी, भाभी भी आ गई थी।

 बच्चे दादी से चिपके पड़े थे, आज उनको दादी से बहुत सारी कहानियां जो सुननी थी। उधर पिताजी का हुक्का भूड भुड कर रहा था। हम काफी देर तक चूल्हे के पास बैठे गप्पे मारते रहे, अब धीरे धीरे नींद भी आने लगी थी तो सभी सोने के लिए चले दिए।

अगली सुबह जब उठे तो मौसम ने अंगड़ाई ले रखी थी, मानों हल्की बूंदाबांदी से हमारा स्वागत कर रही हो। दूर पहाड़ों पर कोहरे की चादर बिछी हुई प्रतीत हो रही थी, और हल्की हल्की धुंध छाने लगी। बहुत ठंडा हो गया पर बच्चे समय से जग गए और घूमने के लिए तैयार हो गए। मैं जैसे तैसे नहा कर निकला, फटाफट नाश्ता किया और बच्चों और धर्म पत्नी जी के साथ छन्नी   ( गौशाला)में चला गया ,वहां हमारी दो गाय और एक बाछी(बेबी गाय)थी,धर्मपत्नी जी ने उन्हे भूसा डाला और रात का पींडू (रात का बचा हुआ खाना और पानी) दिया और फिर हम सब अपने बगीचे में चले गए। पिताजी ने बहुत मेहनत से ये बगीचा तैयार किया था, उन्होंने इसमें नीबू,अमरूद, लीची, कठल,केला और आम के पेड़ लगाए थे। हमने खूब अमरूद खाए और घंटों वहीं बैठे रहे,बच्चे गाय के बछड़ी के साथ खेलते रहे,सच बहुत सुकून था यहां।

गांव का शांत जीवन, यहां की फिज़ा, मिट्टी की खुशबू की बात ही कुछ और है। जिंदगी भर की सारी थकान गायब हो गई गांव आकर।

क्रमशः


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