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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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नेकी

नेकी

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किसी का आग में यूं घी डालना एक साल से देखे जा रही हूं। अब सहन नहीं होता। बस बहुत हुआ। यह कहकर ममता गुस्से से झल्ला उठी। हो भी कैसे? ममता के दो पड़ोसियों की छोटी-सी किसी बात पर तकरार हो गई थी जिसका शर्माइन पूरा-पूरा फायदा उठाती रही और जले पर नमक छिड़कने का काम करती रही। मित्रता तो कभी करा न सकी हां लेकिन दुश्मनी की खाई जरूर बढ़ाती चली गई । और ममता यह सब भली-भांति देख, समझ रही थी। अत: आज उसने निश्चय लिया कि दोनों पड़ोसियों को एक साथ बैठाकर एक साल से चली आ रही उनकी खटपट को सुलझाकर शर्माइन की करतूतों पर से पर्दा हटा कर रहेगी। और हुआ भी कुछ ऐसा ही।

 दोनों पड़ोसियों की आंखों से काला चश्मा तो उतरा ही, साथ -ही कलई खुलने पर शर्माइन अपराध बोध के भाव को छिटकते हुए सधे कदमों से ममता के घर से बाहर आ गई।


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