मूर्ख से प्रकाण्ड विद्वान तक
मूर्ख से प्रकाण्ड विद्वान तक
विवाह के पहले ही दिन जब वास्तविकता का पता चलता है कि पति मंदबुद्धि है घर से निकाल द्वार बंद कर लेती है। ऐसा नहीं था कि उसे अपनी पत्नी धर्म के कर्तव्य का ज्ञान नहीं था। एक राजा की सर्वसमर्थ बेटी युवक को घर में ही छोड़कर वापस राजमहल जा सकती थी पर उसने ऐसा नहीं किया। युवक सुन्दर सौष्ठव अक्खड़ था बस एक शिक्षक के अभाव में निखर नहीं सका था। शायद अनाथ होने के कारण वाग्देवी से साक्षात्कार ही नहीं हुआ हो। ध्यान लगन व शिक्षा का अभाव था।
पत्नी के तिरस्कृत किए जाने से उसके मन में जो क्षोभ, ग्लानि की ज्वाला पैदा हुई कि एक चुनौतीपूर्ण लक्ष्य बन गया। लोहा गर्म था चोट तेज थी। सारी ऊर्जा ताकत एक उद्देश्य की दिशा में बह अपनी लगन व मेहनत से सफलतम कवि विद्वान बना गई। यदि राजकुमारी छोड़ कर चली जाती तब वह एक प्रेरक शिक्षक की बात कहां होती ??
मालव देश के राजा की राजपुत्री अत्यंत बुद्धिमान और रूपवती थी। राजकुमारी को अपनी विद्वता का भी कुछ अहंकार था। राजकुमारी ने संकल्प किया था वह उसी युवक से विवाह करेगी जो उसे शास्त्रार्थ में पराजित कर देगा।
दूर-दूर से आए विद्वान हार गए तब उन विद्वानों के मन में अति दुख व लज्जा का हीन भाव आ जाने से सभी ने राजकुमारी से बदला लेने के लिए मिलकर एक चाल चली और एक मूर्ख युवक की खोज में निकल पड़े।
तभी एक जंगल में उन्हें एक पेड़ की शाखा में बैठा एक युवक नजर आया वह उसी शाखा को काट रहा था जिस डाल में वह स्वयं बैठा था। वह समझ गये इससे मूर्ख मिलने से रहा जिसे व्यवहारिक ज्ञान भी नहीं। उसे सिखा पढ़ाकर अच्छे भोजन का लालच देकर वृक्ष से नीचे उतारा।
फिर अपने साथ जाने को व वहां पहुंच मौन में उत्तर देने को राजी कर लिया कि यदि तुम कुछ ना बोले तो तुम्हारा विवाह एक सुंदर राजकुमारी से करवा देंगे। उन्हें अच्छे कपड़ों से सुसज्जित कर विद्वद मंडली अपने साथ एक विद्वान के रूप में शास्त्रार्थ के लिए राजमहल ले गई।
विद्वानों ने वहां युवक का परिचय अपने गुरु के रूप में देते हुए कहा, "यह प्रकांड विद्वान है पर मौन साधना में रत होने के कारण संकेतों में शास्त्रार्थ करेंगे उसकी व्याख्या हम कर देंगे।" राजकुमारी ने सहर्ष सहमति दे कर शास्त्रार्थ शुरू किया।
पहले प्रश्न में राजकुमारी ने अंगुलि उठाई उसका अर्थ था, ईश्वर एक है और वह कालिदास ने समझा कि यह मेरी एक आंख फोड़ना चाहती है उसने दो उंगली उठा दी कि मैं तुम्हारी दोनों आंखें फोड़ दूंगा। पंडितों ने समझाया "ईश्वर एक है" उन्होंने कहा यह बात ठीक है पर पुरुष और प्रकृति, परमात्मा और आत्मा दो-दो शाश्वत हैं।
राजकुमारी बहुत प्रभावित हुई उसने दूसरे प्रश्न में हथेली उठाई पांचों उंगलियां ऊपर की ओर उठी थी अर्थ था आप जिस प्रकृति जगत जीव या माया के रूप में द्वैतवाद को स्थापित कर रहे हैं उसकी रचना पंचतत्व से होती है। यह पंचतत्व है पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि, वायु यह सभी तत्व भिन्न और अलग हैं इन से सृष्टि कैसे हो सकती है ??
युवक ने समझा यह मुझे थप्पड़ मारना चाहती है थप्पड़ के जवाब में मुक्का दिखा दिया। विद्वानों ने व्याख्या की जब तक पंचतत्व अलग-अलग रहेंगे सृष्टि नहीं होगी। पंचतत्व करतल की पंचांगुली है। सृष्टि तो मुष्टिवत है ।मुट्ठी में सभी मिल एकाकार हो जाते हैं तब सृष्टि हो जाती है । यह सुनकर सभा मंडप में तालियां बजने लगी सभी बहुत प्रभावित हुए।
अंत में राजकुमारी ने अपनी हार मान युवक से विवाह कर लिया यह राजकुमारी और कोई नहीं राजपुत्री विद्योत्तमा व युवक कालिदास ही थे।
उनकी मूर्खता को ही समझ घर से निकाल विद्योत्तमा बोली पहले विद्वान बनो फिर वापस आओ। उसने अपने को भी नहीं कोसा, न पंडितों को, न भाग्य का रोना रोया पति को शिक्षित करने का ठान पीछे से स्वयं उनकी निगरानी करने का बीड़ा उठाया यही एक शिक्षक के रूप में कर्तव्य था।
अरे ये मेरी पत्नी और मेरा तिरस्कार अब तो इससे अधिक विद्वान बन कर दिखाऊंगा।
फिर क्या था अपनी पत्नी से अपमानित तिरस्कृत होने के बाद कालिदास ने भी विद्या प्राप्ति का संकल्प ले, प्रण किया कि अब सच्चे पंडित बन कर ही पत्नी के पास वापस आएंगे और घर छोड़ दिया।
इन व्यंग्य वाणों ने इतना आहत किया कि इसके बाद वे मां काली की उपासना कर, सरस्वती का आशीर्वाद ले प्रकांड पंडित बन कर ही अपने घर आये तथा अपनी विद्वता सिद्ध करते हुए पत्नी को आवाज दी, "अनावृत कपाटं द्वारं देहि सुन्दरी (बंद दरवाजा खोलो सुंदरी) विद्योत्तमा ने चकित होकर कहा, "अस्ति कश्चित वाग्विशेषः"। कोई विद्वान लगता है। वह वाणी से समझ चुकी थी ।
तब कालिदास ने अस्ति शब्द से अस्त्युत्तरस्यां कुमारसंभव, कश्चित् शब्द से कश्चितकांता मेघदूत, व वाग्विशेषः से रघुवंश जैसे सुप्रसिद्ध ग्रंथों की रचना कर विश्व में अपनी प्रकांड विद्वता सिद्ध की।
इस प्रकार पत्नी से तिरस्कृत होने के बाद लक्ष्य को थाम महान कवि बन गए आज उनकी गणना देश-विदेश के श्रेष्ठ कवियों में होती है।
अभिज्ञानशाकुंतलम् उनकी विश्व प्रसिद्ध रचना है अभी तक उनका जैसा संस्कृत का प्रकांड विद्वान हुआ ही नहीं है।
शिक्षक कोई भी हो सकता है पति, पत्नी मां भाई, बहन। सब का शिक्षा देने का ढंग शिष्य की विशेषतानुरूप हो सकता है।
मैंने ऐतिहासिक विषय इसी से चुना सर्व विदित होने के कारण सहज, सरल व ग्राह्य हों, साक्षिता के साथ।
