Mitali Mishra

Classics Inspirational


4.8  

Mitali Mishra

Classics Inspirational


मेरी दादी

मेरी दादी

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आज पूरे ३ साल हो गए दादी को गुजरे पर अभी भी उनकी आवाज कानों में गूंजती है, ऐसा लगता है मानो कल की ही बात हो।दादी की छवि सचमुच बहुत प्यारी सी थी। उनके बाल पके हुए थे, पर हां कहीं कहीं अब भी काला बाल बचा हुआ था जो पके हुए बालों के बीच से झांकता रहता था जिसे देखकर दादी खुश हो जाती थी क्योंकि उन्हें अपने बालों से काफी प्रेम था, उनकी आंखों पर चश्मा जिसे पहनकर वो किताबों से दोस्ती करती,

उनके दांत जो टूट चुके थे बस कुछ बचे हुए दांत थे जो उनके सुंदरता को अब तक बरकरार रखे हुए था। मैं अपनी दादी के पास ही सोया करती थी और इसका फायदा ये था कि मैं रोज उनसे कहानियां सुनती और फिर सुनते सुनते उस कहानी को मैं जीने लगती। मुझे आज भी उनकी कही एक एक कहानी याद है।

खैर, मुझे उनकी एक घटना आज भी याद है जिससे मैं काफी प्रभावित हुई, ठंड का मौसम था और इसलिए सब अपने अपने घरों में दुबके हुए थे। मैं भी अपने दादी के साथ बैठी उनसे बातें कर रही थी और अपने हाथ पैर सेक रही थी कि तभी दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी मैंने दादी से कहा कि मैं देखती हूं,

मैंने खिड़की से झांक कर देखा तो एक बूढ़ी सी औरत फटे हुए चादर में खुद को ठंड से बचाने के कोशिश में लगी थी, उसने जब मुझे देखा तो इशारे से कुछ बताने की कोशिश करने लगी इससे पहले कि मैं कुछ समझती दादी वहां आ गई उसने झट से उसे अंदर लाया और आग के समीप बिठा कर खुद रसोई में चली गई कुछ देर बाद दादी खाने का सामान और चाय लेकर आई वो औरत बिना कुछ बोले खाने लगी और दादी ने बड़े प्यार से खिलाया भी, दादी ने उसे कुछ गर्म कपड़े भी दिए वो रात वहीं रूकी क्योंकि दादी ने उसे रोक लिया।

उस दिन दादी का ये निस्वार्थ सेवा करना मेरे अन्दर एक नयी भावना को जगा दिया था।मैं हमेशा उनकी तरह दरिया दिल बनना चाहती हूँ ।यही वजह है कि उस घटना का मेरे उपर ऐसा असर हुआ कि मैंनें सोशल वर्क की पढ़ाई कर के अपना जीवन सामाजिक कार्यों में लगाया।बुजुर्गौं का प्यार सचमुच अमुल्य, अनमोल, निस्वार्थ होता है।परन्तु ये हमारी विडंबना है कि आज हम उनसे ही दूरी बना लें रहे हैं जो हमारे जीवन के नींव है,

आज के बदलते वक्त में हालात इतनी दयनिय है कि बुजुर्ग अपने ही घर में पराये से हो जाते हैं, उनकी आंखों से भविष्य का डर दिखता है। बहुत जरूरी है कि हम अपने समाज में फैल रहे इस मानसिकता को रोकें जो बुजुर्ग को बोझ समझते हैं। बुजुर्गो के प्रति प्यार , सम्मान, इज्जत को बढ़ाए।

जिंदगी की सीख उनसे ही तो सीखने को मिलती है। आज आधुनिकता के चमक में इस कदर हम खो ग‌ए है कि हमारे पास हमारे ही परिवार के लिए वक्त नहीं होता। आज जरूरत है उस सामाज की जहां आधुनिकता के साथ साथ अपने बुजुर्गों के लिए आदर, सम्मान, प्यार और इज्जत हो। और इसके लिए बहुत जरूरी है कि हम अपने मानसिकता को बदलें।


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