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Sangeeta Aggarwal

Abstract


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Sangeeta Aggarwal

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मां साथ है

मां साथ है

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"हर दुख में मां की याद आती है लगता है मां होती तो शायद इस दुख से निकाल लेती मुझे पर अफसोस मां नहीं है!" रिचा अपनी सहेली प्रीति से रोते हुए बोली।

" मन छोटा ना कर रिचा ऐसे करेगी तो जिएगी कैसे बच्चों को देख घर देख अपना सबको तेरी जरूरत है!" प्रीति ने समझाया।

" मैं जानती हूं प्रीति कि सबको मेरी जरूरत है पर मुझे भी तो किसी की जरूरत है जो मुझे संभाल सके पर ये भी सच है एक बच्चे को उसकी मां से बेहतर कोई नहीं संभाल सकता!" रिचा फिर बोली।

" हम्म ये सच है तो ये भी सच है कि मां अपने बच्चो को कभी अकेला नहीं छोड़ती मरने के बाद भी नहीं उसका साया अपने बच्चों के साथ हमेशा रहता है और वो अपने बच्चों की हिफाज़त करता है!" प्रीति ने कहा।

ये प्रीति और रिचा है बहुत अच्छी दोस्त रिचा की मां की मृत्यु अभी छह महीने पहले ही हुई है प्रीति उस वक़्त अपने पति के साथ विदेश में थी अब वापिस भारत आ वो सबसे पहले रिचा से ही मिलने आई है उसे दिलासा देने। रिचा को समझा कर प्रीति चली गई।

" ये क्या रिचा आज बस लौकी बनाई है खाने में !" रात को रिचा का पति संजय बोला।

" वो संजय सब्जी ख़तम हो रही है और आज वक़्त नहीं मिला बाज़ार जाने का प्रीति आ गई थी तो ... अभी तुम यही खा लो कल ले आऊंगी मैं!" रिचा बोली।

" नहीं खाना मुझे खाना तुम्हीं खाओ मैं बाहर खा आऊंगा !" संजय तुनक के बोला और बाहर चला गया।

रिचा को बहुत बुरा लगा क्योंकि संजय का ये हमेशा का था खाने में नुक्स निकालना और खुद बाहर खा आना बिन ये सोचे रिचा खाती भी है या नहीं... उसने बच्चो को खाना खिला सुला दिया और खुद वहीं सोफे पर बैठ गई.... बैठे बैठे उसकी आंख लग गई।

" अरे मां आप यहां कैसे ?" मां को सामने देख वो हैरान हो बोली।

" हां तो क्या बेटी से मिलने नहीं आ सकती ... देख क्या हाल बना रखा है तूने अपना !" मां बोली।

" मां मैं ठीक हूं पर तुम कैसे आई यहां!" रिचा बहुत हैरान थी।

" अरे भगवान से लड़ कर आई हूं मुझे पता है तू दुखी है और तू खाना कबसे छोड़ने लगी ये गुस्से में तुझे कितनी बार समझाया इससे अन्न देवता का अपमान होता है !" मां बोली।

" वो...मां ...वो... आपको कैसे पता पर !" रिचा ने पूछा।

" मां हूं सब जानती हूं चल अब खाना कहा मैं लाती हूं गर्म करके !" मां बोली।

मां ने रिचा को अपने हाथ से खाना खिलाया ना जाने क्यों रिचा को खाना बहुत अच्छा लगा आज शायद मां का प्यार जो मिल गया था उसमे।

" बस मां पेट भर गया !" रिचा बोली और मां की गोद में लेट गई।

" आज के बाद कभी खाना नहीं छोड़ना आदमियों को फर्क पड़े ना पड़े पर इससे तुम पर फर्क पड़ेगा बीमार हो गई तो बच्चों को कैसे पलोगी रही दामाद जी की गुस्से कि बात उनसे बात कर पर प्यार से क्योंकि अगर दोनों ही गुस्सा करोगे तो घर बिगड़ेगा और बच्चे सहमे सहमे रहेंगे !" मां ने रिचा को थपकी देते हुए समझाया।

" ठीक है मां आज के बाद आपकी बेटी कभी भूखी नहीं रहेगी और संजय से भी बात करूंगी मैं .. इतनी अच्छी सीख एक मां ही से सकती है !" रिचा बोली।

" चल अब सो जा बहुत रात हो गई है !" मां बोली।

" और मां आप ?" रिचा बोली।

" मैं हूं ना यहीं हमेशा तेरे साथ तेरे हर सुख दुख में जब जब तू मुझे याद करेगी हमेशा साथ पाएगी!" मां बोली।

अचानक उसे मिट्ठू( अपने बेटे) की आवाज़ सुनाई दी " मम्मा आप यहां क्यों लेती हो चलो कमरे में सो जाओ !" 

रिचा चौंक कर उठी और आंख मल कर इधर उधर देखने लगी ...मां कही नहीं थी तो क्या ये सपना था... पर मां का एहसास तो था वहां।

" तो क्या मां मुझे परेशान देख सच में आई थी भगवान जी से लड़!" रिचा खुद से बुदबुदाई।

" क्या बोल रहे हो मम्मा !" मिट्ठू आश्चर्य से बोला।

" कुछ नहीं बेटा आप जाओ सो जाओ मम्मा सो जाएगी रूम में जा ... ओके बच्चा!" रिचा बेटे को प्यार करती बोली।

" ओके मम्मा !" ये बोल मिट्ठू चला गया।

रिचा ने उठ कर खाना गरम किया और खाने बैठी खाने में वही स्वाद था जो सपने में था।

" कल संजय से बात करूंगी बच्चे बड़े हो रहे इस तरह का व्यवहार उनके सामने नहीं चलेगा बोल दूंगी साफ कोई गिले शिकवे हो भी तो अपने कमरे में सुलझाए उन्हें यूं तमाशा ना बनाए !" रिचा खाना खा बोली और अपने कमरे में आ गई।

कमरे में संजय गहरी नींद सोया था।

सच हैं दोस्तों मां भले हमारे साथ ना हो पर उनकी सीख अपने बच्चों की रक्षा हमेशा करती एक सुरक्षा कवच बन और बच्चे दुखी हो तो मां को पता चल जाता।


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