माँ की होली
माँ की होली
होली आती है तो सबसे पहले गुझिया याद आती है और उसकी तैयारी। सबसे पहले मावा - मेवा आती है। फिर बनता है कसार जिसमें पड़ती हैं मेवा,चीनी। ये भी कई तरह की बनती थीं। खोये में सूजी मिला कर , क्यों कि ये ज्यादा
टिकाऊ होती हैं और फिर रंग खेलते समय बहुतायत में लोग मिलने आते हैं तो थाल भर कर रखनी होती हैं। खालिस खोये की गुझिया चीनी में पागी हुई होती है। वह शाम के समय के लिए बनती। एक बनती चावल की गुझिया, क्यों कि वह माँ के गांव में बनती थी जिसमें केवल गोला और बड़ी इलायची डाली जाती। उसके बाद नमकीन और मीठे सेव बनते और इनसे के लिए चावल भिगो दिया जाता क्योंकि यह दो तीन दिन तक पानी में भीगता और फिर बाद में उसे खरल में कूट कर बारीक करना पड़ता। इसके चोंचले भी कम नहीं होते । मसलन यह मुंह अंधेरे बनाने चाहिए,बनाते समय कोई बोले नहीं,चीनी और भूरे का अनुपात एकदम नपा तुला होना चाहिए। अन्यथा इनके बिगड़ने की संभावना होती है। कांजी का पानी भी चार दिन पहले गाजर डाल कर तैयार करना होता वरन् यह खट्टा नहीं होता। इनके साथ ही याद आते हैं पिताजी के सहपाठी रहे उपाध्याय जी।
वे पड़ोसी भी थे जिन्हें हम चाचा जी कहते थे। उनकी और माँ की होली अनूठी थी। चाचा जी नियम से होली खेलने आते थे और माँ बाल्टी में रंग घोल कर रखती थीं। वह घूंघट करती थीं । चाचा जी आंगन में एक जगह पर खड़े हो जाते थे और माँ उन पर बाल्टी से रंग डाल देती थीं और वे अपना लाया रंग एक जगह खड़े होकर माँ पर डाल देते थे। माँ जब तक जीवित रहीं तब तक चली यह होली।
रंग के बाद शाम को चाचा जी की ओर से फगुए की थाली आती थी। जिसमें होती थीं सात तरह की मिठाई, सात तरह के फल एकदम अलग ,मसलन आम,खुवानी,आढ़ू आदि और पान का चाँदी के बर्क लगा हुआ बीड़ा। यद्यपि ये थाली माँ के लिए आती थी , लेकिन खाते हम बच्चे ही थे।
उसके बाद माँ की तरफ से न्योता जाता था । तब चाचा जी और बच्चे खाने पर आते थे। उसमें माँ खीर ,पूरी,दही बड़े,खस्ता आदि बनाकर कांसे का बड़ा थाल सजाती थीं।
सभी लोग खाना खाते थे। बहुत ही यादगार पल हुआ करते थे ये। माँ के लिए उपाध्याय जी उनके देवर थे, जिनसे शायद ही कभी कुछ बोला हो और उपाध्याय जी के लिए माँ उनकी अकेली भाभी थीं जिनके साथ वे होली खेलते थे।
