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Hansa Shukla

Classics

4.9  

Hansa Shukla

Classics

माँ-बेटी

माँ-बेटी

2 mins
520


बेटी किचन में नाश्ता बना रही थी माँ ने कहा श्रेया तुम नाश्ता कर लो बचे परांठे मैं बना देती हूँ। श्रेया नाराज होते हुए बोली क्या मम्मी आप अचानक क्यों बोलती है मेरा हाथ जल गया,मैं कर लुँगी नाश्ता मेरी चिंता मत करिए प्लीज,माँ रुआंसा होकर ठीक है कहकर किचन से निकल गई।श्रेया का गुस्सा देखकर बर्नआल लेकर आई लेकिन लगा देती हूँ कहने का हिम्मत नही जुटा पाई।दो निवाला मुश्किल से मुंह मे गया कि आँख से निकलते आँसू के कारण सब धुँधला दिखने लगा,श्रेया की आवाज आई मम्मी मैं ऑफिस जा रही हूँ,एक बार फिर माँ ने पूछा नाश्ता किया या नही बेटी,श्रेया ने बेरुखी से जवाब दिया आपने कर लिया ना मैं नाश्ता करू या ना करू आपको क्या?जलने का गुस्सा माँ के प्रेम पर भारी पड़ रहा था।                           

कुछ दिन बाद माँ शाम को किचन में सब्जी बना रही थी श्रेया ऑफिस से चहकते हुये आई और दरवाजे से ही माँ को बताने लगी मम्मा आज ऑफिस में किसी क्रिटिकल परिस्थिति में सभी एम्प्लॉयी को अपना सलाह देना था मेरे सलाह को बॉस ने बेस्ट कहा ,मजा आ गया मम्मी !माँ मैं बहुत खुश हूँ वह ऑफिस की बात बताते जा रही थी,श्रेया के अचानक बोलने से माँ का हथेली का पिछला हिस्सा कड़ाही से जल गया अपने दर्द को छुपाते हये माँ ने जली हुई जगह में ठंडा पानी डालते हुये बेटी से कहा अरे वाह मेरी लाडो तेरी सलाह तो होते ही इतने अच्छे है.. और बता ऑफिस में क्या-क्या हुआ और सब तेरी सलाह पर क्या बोले,मैं तेरे लिए चाय बनाकर लाती हूँ।                      

श्रेया नमकीन लेने किचन में आई तो देखी माँ की हथेली जल गई है और उसमें फफोले आ गये है वह दुखी होकर बोली माँ ये कैसे हुआ चलिए दवा लगा देती हूँ।माँ ने प्यार कहा से तू चाय पी ले मैं घी लगा हूँ तेरी बात सुन रही थी तो ध्यान नही रहा और हाथ कड़ाही में रखा गया।                            

श्रेया सारा माजरा समझ गई उसे अपने पर बहुत गुस्सा आ रहा था क्यों वह अंदर माँ के पास आकर बात नही बतायी दरवाजे से बोलते हुए आने के कारण माँ जल गई,उसे पता था माँ कभी उसे दोष नही देंगी  उसे वह दिन याद आ  गया जब माँ उसे नाश्ता करने बोली और उसका ध्यान ना होने से उसने पूरा दोष माँ को दे दिया था और माँ से कितने बेरुखी से पेश आई थी उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू निकल रहे थे। माँ के पास जाकर उसे लेकर आई और उनके हथेली में दवा लगाने लगी ,माँ के आँख में खुशी के आँसू थे कि बेटी उसके दर्द को महसूस कर रही है।श्रेया मन ही मन सोच रही थी सच मे माँ कितनी महान है जो कभी नाराज नही होती,हमारी खुशी में उनकी खुशी और हमारे दुख में हमसे ज्यादा दुखी होती है माँ। श्रेया चाय लेकर आई माँ-बेटी चाय पी रहे थे दोनो के चेहरे पर मुस्कुराहट थी।



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