लॉन्ग वीकएंड
लॉन्ग वीकएंड
विगत पंद्रह वर्षों से अपने पैतृक शहर से दूर रह रहे मयंक के घर पर पिछले दो दिन से रश्मि और मयंक के बीच जिस विषय पर बहस चल रही है, वह दोनों के बीच न केवल संवेदनशील है, बल्कि दोनों की सहमति के बिना पूरा होना भी मुश्किल है।
मयंक के बड़े भाई धीरेंद्र का दो दिन पहले फोन आया था, मयंक के पैतृक घर पर, मां की बरसी को विधि विधान से मनाने की सूचना आई थी। बस उसी को लेकर आज सुबह फिर दोनों के बीच बहस का मुद्दा उठ गया था
पंद्रह दिन बाद यानी अगले महीने की दो तारीख को मयंक की मां "गायत्री देवी" की बरसी है|
पिछले साल आज ही के दिन गायत्री देवी ने संसार छोड़ा था। वैसे तो पारिवारिक व्यस्तता के चलते पूरे परिवार ने बड़े बुजुर्गों से सलाह कर सामूहिक निर्णय लेते हुए, तेरहवीं के दिन ही बरसी का कार्यक्रम भी पूरे विधि विधान से कर दिया था। दोनों भाइयों साहित पूरे घर ने यही तय किया था कि, पूरे साल किसी भी शुभ कार्य को न कर पाने की बाध्यता मैं ना बंधते हुए, बरसी की विधि भी तेरहवीं के साथ ही कर दी जाए , इसलिए बरसी का कार्यक्रम भी तेरहवीं के साथ ही पूरा कर दिया गया था। मगर अचानक आए इस फोन की वजह से, घर में प्रस्तावित कार्यक्रम में जाने या न जाने पर दोनों के बीच तीखी बहस हो रही थी, ज्यों ज्यों बरसी का दिन नजदीक आ रहा था, मयंक का मन अधीर हुए जा रहा था। मयंक का बहुत मन था वह सपरिवार मां की बरसी में पैत्रिक निवास पर होने वाली पूजा में पहुंचे, मयंक का तर्क था कि जब मां के आशिर्वाद से पूरा साल ठीक ठाक गुजर ही गया है, ऐसे में मां के निधन को एक वर्ष पूरे होने के मौके पर, उनकी आत्मा की शांति के लिए होने वाली पूजा एवम् यज्ञ अगर दुबारा हो ही रहा है तो हमें भी पूजा में पहुंचने की तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए। मगर, रश्मि का कहना था जब पूरे परिवार ने सहमति से तेरहवीं के दिन ही माता जी की बरसी कर दी थी, तो अब उसी विधान को दोबारा करने का दिखावा करने से भला क्या लाभ होगा? ओर रश्मि खीजते हुए बड़बड़ाई "उनकी आत्मा एक वर्ष तक किसी विधि विधान के लिए इंतजार थोड़े ही कर रही होगी," बस फ़िर क्या था?
मयंक गुस्से से बिफरते हुए बोला "तुम्हारे मन में तो मेरी मां के लिए इज्जत कभी थी ही नहीं, अब कम से कम मां के जाने के बाद तो यह सब बातें ना कहो, पूरा साल मां के आशिर्वाद से ही देखो कितनी सुख शांति से निकला है, ये सब जो तुम आज इस घर मे देख रही हो न, ये सब उन्हीं का आशीर्वाद है," रश्मि ने भी उसी तरह तुनकते हुए जवाब दिया," मैंने क्या गलत कहा? कोई विधि विधान के लिए आत्मा थोड़ी एक साल रुकी रहेगी ।
यह सब तो धीरेंद्र भाई साहब का किया धरा है, आखिर उन्हें क्या जरूरत थी बरसी की रस्म को दोबारा शुरू करने की? ये कोई शादी की सालगिरह थोड़े है जो हर साल मना लो। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। बस एक फोन कर देते, हमने भी तो यहां पूजा कर के पंडित जी को खाना खिलाने की सोच ही रखी थी। सबको दोबारा इकट्ठा कर खर्च करने की क्या जरूरत है? कल को फिर हमसे भी खर्च का तीसरा हिस्सा मांग लेंगे। हमारी मर्जी हो या ना हो हमें तो हिस्सा देना ही पड़ेगा ना? अगले महीने ही तो बेटे "प्रणय" की फीस भी जानी है, और बेटी "डोली" के स्कूल टूर का भी खर्च आ रहा है, उसके टूर का एडवांस भी तो अगले हफ्ते स्कूल में जमा करना है। धीरेंद्र भाई साहब का क्या है? उनका तो बेटा कमाने लगा है और बिटिया की शादी कर दी है। अब तो उन्हें सिर्फ समाज से जुड़ने और लोगों की वाह वाही लूटने का ही काम बचा है। हम तो दूर रहते हैं, हमें वहां पूछता ही कौन है? ,हमारे इतना करने के बाद भी सब रिश्तेदार तो उन्हीं को पूछते हैं न ! मां को भी बस उन्हीं के बच्चों से प्यार था, हमारे घर कभी आती भी थी तो बस मेहमान की तरह बैठी रहती थी, बच्चों को कभी लगा ही नहीं की दादी घर आई है, मैं डरी डरी रहती थी सो अलग, जाने कब मेरे घर वालों को उल्टा सीधा कहना शुरू कर दे."
"अच्छा अच्छा ठीक है, अभी चुप रहो, अभी जाने में समय है मैं भाई से पूछता हूं, उनका क्या प्लान है बरसी पर ? बरसी पर सभी रिश्तेदारों को बुला रहे हैं, या सिर्फ हमें ही बुलाया है!" कहकर मयंक ऑफिस जाने की तैयारी में लग गया।
रश्मि कुछ बड़बड़ा रही थी कि तभी, दरवाजे की घंटी बजी, रश्मि के घर पर काम करने वाली कामवाली बाई "शांता" घर मे सुबह का काम करने आई थी,
रश्मि भी, शांता को निर्देश देने के साथ साथ मयंक के ऑफिस के लिए लंच तैयार करने में जुट गई।
काम निपटाने के बाद जाने से पहले शांता , झेंपते हुए बोली "मेमसाब अगले महीने मैं, एक हफ्ते के लिए गांव जाऊंगी इसलिए उस एक हफ्ते के लिए आप किसी और ' सहायिका ' का इंतजाम कर लीजिएगा"
रश्मि ने आंखें बड़ी और गोल करते हुए शांता की तरफ देखते हुए, बड़े आश्चर्य से पूछा" एक हफ्ते के लिए गांव किस लिए?"
शांता ने मुस्कुराते हो कहा "मैडम जी हमारे गांव में , हर साल, चैत्र माह की पूर्णिमा को कुलदेवी की पूजा के लिए का एक हफ्ते का मेला लगता है। आज हम जो भी हैं कुलदेवी के आशीर्वाद से ही है, वहां तो हमें हर हाल में जाना ही रहता है"
रश्मि को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसे मालूम था जहां वो रहती है वहां दूसरी कामवाली मिलना कितना मुश्किल है!, ऐसे में रश्मि को ही पूरे हफ्ते घर का पूरा काम करना है!
शांता कहती जा रही थी "मैडम जी, मेरी बड़ी बेटी बचपन में जब बहुत बीमार हो गई थी, तब हमने मन्नत मांगी थी, उसके बाद ही हमारी बेटी ठीक हुई। अब बताइए जिसके आशीर्वाद से हमारे घर में रौनक है। भला हम उस कुलदेवी का एहसान उउतार सकते हैं क्या?"
वह तो ठीक है शांता ये पूर्णिमा का मेला कब है?" रश्मि ने पूछा
मेंला तो अगले महीने की दो तारीख से शुरू होगा मेमसाब जी, लेकिन कुलदेवी की पूजा की तैयारी करनी है इसलिए हम लोग एक तारीख को ही चले जाएंगे ।
मन ही मन चिंतित रश्मि ने थोड़ी सख्ती दिखाते हुए कहा" पूरे एक हफ्ते के लिए जा रही हो तो तनख्वाह कटेगी" हां मैडम मैं जानती हूं, एक अकेली आप ही थोड़े है, मैं ओर तीन घरों में भी काम करती हूं, तीनों ने यही कहा है। मगर जिस भगवान ने सब कुछ दिया है उसके लिए एक हफ्ते की तनख्वाह भी कटेगी तो चलेगा, काम तो पूरी साल ही करते है, जिस भगवान ने सब कुछ दिया है उसके लिये भी तो कुछ फर्ज बनता है न मेमसाब?"
निरुत्तर रश्मि के पास अब उसे रोकने का और कोई बहाना भी तो नहीं था ।
शाम को खाने की मेज पर बैठा मयंक अपने मोबाइल में, ऑफिस की ईमेल पढ़ते हुए चुपचाप खाना खा ही रहा था, कि रश्मि उसके पास आई और मुस्कुराते हुई बोली "सुनते हो, मैंने दिन भर बहुत सोचा मैं सोचती हूं " हम सब लोग अगले महीने, एक दो दिन नहीं बल्कि पूरे एक हफ्ते के लिए, पैतृक गांव चलेंगे, सासु मां की बरसी भी हो जाएगी, सब लोगों से मिलना भी हो जाएगा, और हां, परिवार सहित एक लॉन्ग वीकेंड की छुट्टियों का मजा भी आएगा और रही बात खर्चे की तो डोली का टूर कैंसल कर देंगे उसी खर्च में गांव हो आयेंगे।"
