अपराध बोध
अपराध बोध
मंत्रालय में कार्यरत प्रत्युष ने इस वीकेंड पर सपरिवार प्रसिद्ध मंदिर के दर्शन के साथ है कहीं घूमने का प्लान बनाया। सब तरह की तैयारी पूरी कर उसने अपने वरिष्ठ अधिकारी को निवेदन कर वी आई पी पास भी प्राप्त कर लिए। प्रत्यूष खुश था कि उसका न केवल समय बचेगा बल्कि ईश्वर के दर्शन भी सुलभता से हो जाएंगे।
छोटा बच्चा राहुल साथ में है, लंबी लाइन में लगने से बचत हो जाएगी वरना राहुल बहुत परेशान करता।
प्रत्यूष सीधे मंदिर ही पहुंचा.
थोड़ी पूछताछ के बाद वह सीधे वीआईपी गेट पहुंचा और अपना वीआईपी पास दिखाकर तेज कदमों से भगवान के दर्शन के लिए खाली पड़ी लाइन में चल पड़ा। वहीं साथ में लगी लंबी लाइन की भीड़ देख, मगर मन ही मन खुश भी हुआ कि चलो वीआईपी पास की वजह से इस भीड़ भरी लंबी लाइन से बच गया। अब उसे बस थोड़ी दूरी तक ही इस भीड़ के साथ चलना है।
मगर उसने देखा, भारी भीड़ भरी लाइन में, अनेको महिलाएं ओर पुरुष जो इतनी दूर से लाइन में लगे चले आ रहे थे उनमें से कुछ लोग छोटे बच्चों को गोद में लिए थे तो कुछ उससे भी छोटे बच्चों को हाथ में पकड़े थे मगर सब एक साथ खुशी और जोश के साथ भगवान की जय जयकार के नारे लगा रहे थे तो वहीं
छोटा बालक लिए एक महिला की आंखे उसे ऐसे घूर रही थी जैसे उनके हिस्से का सुख और समय प्रत्यूष ने छीन लिया हो । उसकी आंखों में दिखी घृणा से मुंह फेरते हुए प्रत्यूष ने भगवान के दर्शन पर अपना ध्यान एकत्र करने की सोच, अपनी आंखे बंद कर श्रद्धा से भगवान के समक्ष सिर झुकाया मगर उसकी बंद आंखों में ईश्वर नहीं बल्कि घृणा से भरी वो आंखे दिख रही थी। जिसने एक अपराध बोध उसके मन में गहरे तक बसा दिया था।
संजय आरजू "बड़ौतवी "
